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खुलासा: युद्ध में सबसे बड़ा विजेता डॉलर; वैश्विक अनिश्चितता में निवेशकों की पहली पसंद, 2% से ज्यादा मजबूत

Sat, 04 Apr 2026 07:44 AM IST
Pavan अमर उजाला नेटवर्क, न्यूयॉर्क/लंदन/नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, न्यूयॉर्क/लंदन/नई दिल्ली Published by: Pavan Updated Sat, 04 Apr 2026 07:44 AM IST
सार

 Dollar is Biggest Winner in War: बाजार विशेषज्ञों और अधिकृत संस्थाओं के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि संकट के समय निवेशकों का रुख पारंपरिक सेफ हेवन यानी सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर मुड़ता है और डॉलर इस सूची में सबसे ऊपर है।

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The dollar is the biggest winner in the war; investors' first choice amid global uncertainty, gaining over 2%
युद्ध में सबसे बड़ा विजेता डॉलर - फोटो : FreePik

विस्तार

अमेरिका, इस्राइल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने जहां वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता और जोखिम बढ़ाया है, वहीं इसका सबसे बड़ा लाभ अमेरिकी डॉलर को मिलता दिख रहा है। प्रमुख अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकेतकों जैसे डॉलर इंडेक्स (डीएक्सवाई), यूरो, पाउंड, येन, युआन और भारतीय रुपए की चाल के विश्लेषण से संकेत मिलता है कि युद्ध शुरू होने के बाद डॉलर में लगभग 2% से अधिक की मजबूती दर्ज की गई है, जबकि अन्य प्रमुख मुद्राएं कमजोर हुई हैं।
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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार के डेटा जैसे इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज के डॉलर इंडेक्स और ब्लूमबर्ग,रॉयटर्स के फॉरेक्स ट्रैकर्स के अनुसार हालिया सप्ताहों में डॉलर इंडेक्स में करीब 2–2.5% तक की बढ़त देखी गई है। इसी अवधि में यूरो में लगभग 2–3% की गिरावट, ब्रिटिश पाउंड में करीब 1.5–2% की कमजोरी, जापानी येन में लगभग 1–2% की गिरावट और चीनी युआन में भी सीमित लेकिन स्पष्ट दबाव दर्ज किया गया है। भारतीय रुपया भी डॉलर के मुकाबले लगभग 2–2.5% तक कमजोर हुआ है।
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हालांकि, विभिन्न प्लेटफॉर्म पर प्रतिशत में मामूली अंतर संभव है, लेकिन व्यापक ट्रेंड एक ही दिशा में हैं डॉलर मजबूत और बाकी मुद्राएं दबाव में।विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे सबसे बड़ा कारण रिस्क-ऑफ सेंटिमेंट है। जब भी वैश्विक स्तर पर युद्ध या भू-राजनीतिक संकट गहराता है, निवेशक जोखिम भरे बाजारों जैसे उभरती अर्थव्यवस्थाएं और शेयर बाजार से पैसा निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड और डॉलर-आधारित परिसंपत्तियों में निवेश करते हैं। फेडरल रिजर्व की अपेक्षाकृत सख्त मौद्रिक नीति और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती भी डॉलर को अतिरिक्त समर्थन देती है।


तेल और व्यापार का असर भी अहम
ईरान और पश्चिम एशिया से जुड़े तनाव का सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर पड़ता है। चूंकि कच्चे तेल का वैश्विक व्यापार मुख्यतः डॉलर में होता है, इसलिए तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के दौरान डॉलर की मांग और बढ़ जाती है। इसके अलावा, युद्ध के कारण वैश्विक सप्लाई चेन में अनिश्चितता बढ़ने से भी कंपनियां और सरकारें डॉलर होल्डिंग बढ़ाती हैं, जिससे इसकी कीमत मजबूत होती है।

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उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव
डॉलर की मजबूती का सबसे अधिक असर भारत जैसे उभरते बाजारों पर पड़ता है। रुपया कमजोर होने से आयात महंगा होता है, खासकर कच्चा तेल, जिससे महंगाई पर दबाव बढ़ता है। आरबीआई जैसे केंद्रीय बैंक आमतौर पर ऐसे समय में हस्तक्षेप कर मुद्रा को अत्यधिक गिरावट से बचाने की कोशिश करते हैं।

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