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ब्रिटेन में बहस: बीबीसी की नीति सामाजिक न्याय है या नस्लभेद?

Tue, 22 Jun 2021 06:58 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 22 Jun 2021 06:58 PM IST
सार

ट्रेनी (प्रशिक्षु) नौकरियों के लिए निकाले गए इश्तेहार में कहा गया कि ये पद सिर्फ ब्लैक, एशियाई और नस्लीय विभिन्नता वाले समुदायों से आने वाले उम्मीदवारों के लिए हैं। ये पद बीबीसी के ग्लासगो स्थित साइंस यूनिट में प्रोडक्शन मैनेजमेंट असिस्टेंट के लिए हैं...

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The BBC has been accused of racial discrimination
बीबीसी - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (बीबीसी) ने अपने यहां नियुक्तियों के लिए एक ऐसा इश्तेहार निकाला है, जिसमें श्वेत समुदाय के अलावा बाकी समुदाय के उम्मीदवारों से अर्जियां मांगी गईं। इस पर इंग्लैंड में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। बीबीसी पर रंगभेदी नीति पर चलने के आरोप लगाए गए हैं।

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ट्रेनी (प्रशिक्षु) नौकरियों के लिए निकाले गए इश्तेहार में कहा गया कि ये पद सिर्फ ब्लैक, एशियाई और नस्लीय विभिन्नता वाले समुदायों से आने वाले उम्मीदवारों के लिए हैं। ये पद बीबीसी के ग्लासगो स्थित साइंस यूनिट में प्रोडक्शन मैनेजमेंट असिस्टेंट के लिए हैं। उन पदों पर एक साल के लिए नियुक्ति होगी। चुने गए उम्मीदवारों को 17,810 पाउंड की सालाना सैलरी मिलेगी।
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इस ऑनलाइन इश्तेहार में कहा गया कि ये पद ‘सकारात्मक कदम योजना’ के तहत हैं। इस योजना के तहत उन समुदायों के लोगों को प्राथमिकता दी जाती है, जिनकी नुमाइंदगी कम है। नस्लीय अल्पसंख्यक, विकलांग और कमजोर सामाजिक-आर्थिक तबकों के लोगों को उनमें शामिल किया जाता है। हाल ही में बीबीसी के ब्रिस्टॉल स्थित नैचुरल हिस्ट्री यूनिट में एक ट्रेनी रिसर्चर के पद को भी इसी योजना के तहत भरने का विज्ञापन जारी हुआ था। उसको लेकर भी श्वेत संगठनों की तरफ से विवाद खड़ा किया गया था।
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बीबीसी के अधिकारी ने यहां के अखबार डेली मेल से कहा कि बीबीसी का ये कदम समता कानून (इक्वैलिटी एक्ट) के प्रावधानों के अनुरूप है। अधिकारी ने कहा कि बीबीसी एक समावेशी संगठन है, जो अपने श्रोताओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए संकल्पबद्ध है। गौरतलब है कि इस साल बीबीसी ने अपनी ‘बहुलता एवं समावेशन योजना’ (डायवर्सिटी एंड इन्क्लूजन प्लान) का एलान किया था। उसमें कहा गया था कि आगे उसकी नियुक्तियों में 50 फीसदी जगह महिलाओं, 20 फीसदी अल्पसंख्यकों और 12 प्रतिशत स्थान विकलांगों के लिए आरक्षित रखा जाएगा।

बीबीसी ने कहा है कि वह अपने स्टाफ को इसी योजना के मुताबिक स्वरूप प्रदान करना चाहता है। अगले पांच वर्ष में वह ये लक्ष्य हासिल करना चाहता है। इसके लिए एंट्री लेवल पर कदम उठाए जाएंगे। बताया जाता है कि बीबीसी के ऊंचे पद पर अभी 18 फीसदी अल्पसंख्यक समुदाय के कर्मचारी हैं।

लेकिन ताजा इश्तहार के बाद सोशल मीडिया पर श्वेत समुदाय के लोगों का गुस्सा देखा गया। वहां बीबीसी के नजरिए को ‘संस्थागत नस्लभेद’ बताया गया है। कई सोशल मीडिया पोस्ट्स में कहा गया है कि ऐसे कदमों से ये धारणा गहराती है कि नौकरी व्यक्ति के मैरिट के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी त्वचा के रंग के आधार पर दी गई। कुछ लोगों ने कहा है कि बीबीसी सकारात्मक कदम के बजाय सकारात्मक भेदभाव के रास्ते पर चल रहा है। यह उसका नस्लभेदी नजरिया है। यूरोपीय संसद के पूर्व सदस्य एंड्रू केर ने तो धमकी दी है कि अगर बीबीसी ने नस्लवाद और भेदभाव का तुष्टिकरण करने की नीति नहीं छोड़ी, तो वे बीबीसी का बजट बंद करने की मांग का समर्थन करेंगे।


ब्रिटेन के समता कानून- 2010 के मुताबिक सकारात्मक भेदभाव गैर-कानूनी है, लेकिन सकारात्मक कदम की इसमें मंजूरी दी गई है। पर्यवेक्षकों के मुताबिक इन दोनों में फर्क यह है कि स्थायी नौकरियों में ऐसी नीति लागू नहीं हो सकती, लेकिन ट्रेनी, इंटर्नशिप आदि जैसे कामों में नीतिगत रूप से सिर्फ अल्पसंख्यक समुदायों की नियुक्ति की जा सकती है।

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