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श्रीलंकाः संसदीय समिति की जांच रिपोर्ट को दबाने के लिए राजपक्षे ने किया सत्रावसान? इलाज के लिए सिंगापुर गए 

Thu, 16 Dec 2021 07:43 PM IST
अभिषेक दीक्षित डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, कोलंबो
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, कोलंबो Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Thu, 16 Dec 2021 07:43 PM IST
सार

विशेषज्ञ इस सवाल में उलझे हुए हैं कि संसद की निगरानी समितियों ने हाल में जो जांच की थी, उसकी अब क्या हैसियत है। संसद की सार्वजनिक उद्यम समिति, लोक लेखा समिति, और लोक वित्त समिति ने कई मामलों ने जांच की थी।

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Sri Lanka: Rajapaksa prorogued to suppress the inquiry report of the parliamentary committee? went to singapore for treatment Latest News Update
गोटाबाया राजपक्षे - फोटो : twitter

विस्तार

श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबया राजपक्षे ने जिस अफरातफरी में संसद के सत्र का सत्रावसान करते हुए तीन प्रमुख संसदीय समितियों को भंग कर दिया, उसको लेकर उनकी सरकार की आलोचना लगातार जारी है। राजपक्षे इसी हफ्ते अचानक संसद का सत्रावसान कर राजपक्षे सिंगापुर चले गए। बताया जाता है कि वहां वे अपने इलाज के लिए गए हैं।

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इस बीच यहां विशेषज्ञ इस सवाल में उलझे हुए हैं कि संसद की निगरानी समितियों ने हाल में जो जांच की थी, उसकी अब क्या हैसियत है। संसद की सार्वजनिक उद्यम समिति, लोक लेखा समिति, और लोक वित्त समिति ने कई मामलों ने जांच की थी। बल्कि यहां मीडिया के एक हिस्से ने यह सवाल भी उठाया है कि क्या इन्हीं जांचों को दबाने के मकसद से राजपक्षे ने अचानक सत्रावसान किया। बताया जाता है कि खास कर सार्वजनिक उद्यम समिति की एक जांच से राष्ट्रपति असहज थे। इस समिति के अध्यक्ष चरिता हेरात थे।
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मीडिया टिप्पणियों में पूछा गया है कि क्या जब अगले 18 जनवरी को संसद का नया सत्र शुरू होगा, तब हेरात को इस समिति से हटा दिया जाएगा। सत्ताधारी श्रीलंका पोडुजना पेरामुना (एसएलपीपी) पार्टी के अध्यक्ष ने कहा है कि संसद का नया सत्र शुरू होने पर संसदीय समितियों की रचना में बदलाव हो सकता है। सार्वजनिक उद्यम समिति ने अपनी जांच से यह सनसनीखेज खुलासा किया था कि मलाबे स्थित श्रीलंका इंस्टीट्यूट ऑप टेक्नोलॉजी के संचालन में भारी गड़बड़ियां हुईं। ये कमेटी इसके अलावा भी कई चर्चित मामलों की जांच कर रही थी। उनमें श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड, लिट्रो गैस, और लिट्रो टर्मिनल में हुई कथित गड़बड़ियों से जुड़े मामले भी शामिल हैं।
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एसएलपीपी के अध्यक्ष जीएल पीरिस ने कहा कि सत्रावसान के साथ संसदीय समितियां भी भंग कर दी गई हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि ऐसा श्रीलंका में पहली बार नहीं हुआ है। बल्कि पहले के राष्ट्रपति भी संविधान से मिले अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए इसी तरह संसद का सत्रावसान करते रहे हैं। जीएल पीरिस ने दावा किया कि राष्ट्रपति राजपक्षे संसद से बचने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। उन्होंने ध्यान दिलाया कि राष्ट्रपति ने संसद के अगले सत्र की शुरुआत की तारीख सिर्फ एक हफ्ता आगे खिसकाई है।

पूर्व सार्वजनिक उद्यम समिति के प्रमुख चरिता हेरात ने इस सारे विवाद पर कोई टिप्पणी करने से अब तक इनकार किया है। लेकिन पूर्व लोक लेखा समिति के प्रमुख तिस्सा वितरणा ने कहा कि उनके नेतृत्व में समिति ने सरकार का राजस्व बढ़ाने की ठोस कोशिशें कीं। उसने कस्टम, देशी राजस्व, और उत्पाद शुल्क को सरल बनाया। उन्होंने कहा कि राजस्व संग्रह में मौजूद गड़बड़ियों को दूर करने के बजाय संसद का ही सत्रावसान कर दिया गया, जिससे न सिर्फ लोक लेखा समिति, बल्कि दूसरी समितियां भी जो महत्त्वपूर्ण काम कर रही थीं, वे बीच में ही ठहर गईं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ने ऐसा कदम क्यों उठाया, इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है।


उधर विपक्षी समागी जना बलाबेगया पार्टी की नेता रोहिणी कवितारत्ने ने कहा है कि सरकार इतनी बदहाल है कि दो महीने के लिए संसद का सत्रावसान करके वह खुद को बचा नहीं सकती। उन्होंने मांग की है कि सरकार देश के सामने यह स्पष्ट करे कि उसने संसद का सत्रावसान क्यों किया।

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