Sri Lanka Crisis: श्रीलंका में अब सरकार विरोधी प्रदर्शनों में उतरे बौद्ध भिक्षु, प्रदर्शनकारियों ने कब्जाया राष्ट्रपति राजपक्षे का आवास
बौद्ध भिक्षुओं के आंदोलन को राष्ट्रपति राजपक्षे के लिए तगड़ा झटका माना जा रहा है। नवंबर 2019 में हुए चुनाव में भिक्षुओं ने उन्हें अपना पुरजोर समर्थन दिया था। दो करोड़ 20 लाख आबादी वाले श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंहली समुदाय बौद्ध धर्म को मानता है। इसलिए भिक्षुओं का समर्थन महत्वपूर्ण समझा जाता है...
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श्रीलंका के प्रभावशाली बौद्ध भिक्षुओं ने राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे के इस्तीफे पर जोर डालने के लिए नए सिरे से आंदोलन शुरू कर दिया है। शनिवार को प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति राजपक्षे के सरकारी आवास पर कब्जा कर लिया। हालांकि राष्ट्रपति गोटबया ने राजपक्षे प्रदर्शनकारियों के पहुंचने से पहले ही आवास छोड़ दिया था। शनिवार को राष्ट्रपति के सरकारी आवास के करीब गॉल फेस पर विशाल जन प्रदर्शन आयोजित किया गया था। प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए सोशल मीडिया पर जोरदार मुहिम चलाई जा रही थी और देश भर के लोगों से इसमें पहुंचने की अपील की गई।
सरकार ने की रोकने की कोशिश
इस प्रदर्शन को रोकने के लिए राजपक्षे सरकार की न्यायपालिका की आड़ लेने की कोशिश कामयाब नहीं हो सकी है। पुलिस ने एक अदालत में अर्जी देकर इस प्रदर्शन पर रोक लगाने की गुजारिश की थी। लेकिन गुरुवार को अदालत ने वो याचिका ठुकरा दी। इससे विरोध प्रदर्शन का रास्ता खुल गया है। अब शनिवार को कोलंबो में आम जन जीवन के अस्त-व्यस्त हो जाने का अनुमान लगाया गया है।
इस बीच बौद्ध भिक्षुओं ने अपना अभियान शुरू कर दिया है। गुरुवार को वे वट्टाला नाम की जगह से 12 किलोमीटर पैदल चलते हुए कोलंबो फोर्ट पहुंचे। बीते अप्रैल से राष्ट्रपति राजपक्षे यहीं रह रहे हैं। अप्रैल में उग्र भीड़ ने राष्ट्रपति के निजी आवास को घेर लिया था। उसके बाद राजपक्षे सपरिवार कोलंबो फोर्ट आ गए थे। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक गुरुवार को पैदल मार्च में तकरीबन 100 भिक्षु शामिल थे। लेकिन एक अदालती आदेश के कारण उनके मार्च को बीच में रोक दिया गया।
तब उन भिक्षुओं ने भूख हड़ताल शुरू कर दी। बौद्ध भिक्षु उलापने समंगला थेरो ने इकट्ठा हुए भिक्षुओं को संबोधित करते हुए कहा- ‘ईंधन संकट के बावजूद बौद्ध भिक्षु यहां पहुंचे हैं। वे देश और इतिहास के प्रति अपना कर्त्तव्य निभाने के लिए यहां आए हैं। इसलिए कोर्ट का आदेश लाकर उन्हें रोकने की कोशिश ना की जाए।’
बौद्ध भिक्षुओं ने पहले किया का राजपक्षे का समर्थन
बौद्ध भिक्षुओं के आंदोलन को राष्ट्रपति राजपक्षे के लिए तगड़ा झटका माना जा रहा है। नवंबर 2019 में हुए चुनाव में भिक्षुओं ने उन्हें अपना पुरजोर समर्थन दिया था। दो करोड़ 20 लाख आबादी वाले श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंहली समुदाय बौद्ध धर्म को मानता है। इसलिए भिक्षुओं का समर्थन महत्वपूर्ण समझा जाता है। कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों की राय है कि देश में महंगाई और जरूरी चीजों के अभाव के कारण जनमत का एक बड़ा हिस्सा राजपक्षे परिवार से निकटता के कारण भिक्षुओं के खिलाफ होने लगा था। इसीलिए अब बौद्ध भिक्षु सरकार विरोधी रुख अपनाने को मजबूर हो गए हैं।
समंगला थेरो ने दावा किया कि उनके सरकार विरोधी अभियान को देश भर के तमाम बौद्ध भिक्षुओं का समर्थन हासिल है। उन्होंने कहा- ‘अभी तो यह शुरुआत है। आने वाले दिनों में विरोध स्थल पर पहुंचने वाले भिक्षुओं की संख्या बढ़ती चली जाएगी।’
देश में गहराते आर्थिक संकट के कारण तीन महीने पहले श्रीलंका में ‘गोटा गो होम’ (गोटबया वापस जाओ) आंदोलन शुरू हुआ था। तब से यह लगातार जारी है। लेकिन एक लंबे अंतराल के बाद अब शनिवार को इस आंदोलन का एक बड़ा कार्यक्रम कोलंबो में आयोजित किया गया है।