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एक देश, दो हिस्से और तीन दशक की हिंसा: ट्रंप ने फिर क्यों उठाया आयरलैंड को एक करने का मुद्दा? विवाद की कहानी
Mon, 14 Sep 2026 02:48 AM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, दूनबेग।
पीटीआई, दूनबेग।
Published by: राकेश कुमार
Updated Mon, 14 Sep 2026 02:48 AM IST
सार
डोनाल्ड ट्रंप के एकीकृत आयरलैंड के समर्थन ने ब्रिटेन और आयरलैंड के करीब एक सदी पुराने संवेदनशील मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है। आयरलैंड की आजादी के बाद उत्तरी आयरलैंड ब्रिटेन में रहा और वहां राष्ट्रवादियों तथा संघवादियों के बीच लंबे समय तक तनाव और हिंसा चली। 1998 के गुड फ्राइडे समझौते ने हिंसा को काफी हद तक खत्म किया और भविष्य में जनमत संग्रह के जरिए एकीकरण का रास्ता खुला रखा। हालांकि ब्रिटेन का कहना है कि अभी ऐसी स्थिति नहीं आई है, वहीं आयरलैंड में एकीकरण के समर्थक ट्रंप की टिप्पणी का स्वागत कर रहे हैं।
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डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आयरलैंड की अपनी यात्रा के दौरान एक ऐसे मुद्दे पर खुलकर राय रख दी, जिस पर ब्रिटेन और आयरलैंड के बीच लंबे समय से गहरी राजनीतिक और भावनात्मक खाई रही है। ट्रंप ने कहा कि वह आयरलैंड को एक होते देखना चाहते हैं। रविवार को आयरलैंड के डूनबेग में अपने गोल्फ कोर्स पर आयरिश ओपन के दौरान उन्होंने अपनी बात दोहराते हुए कहा कि आयरलैंड और उत्तरी आयरलैंड को एक साथ कर देना दुनिया की सबसे स्वाभाविक चीजों में से एक है। एक दिन पहले उन्होंने एकीकृत आयरलैंड को ‘शानदार’ बताया था।
डोनाल्ड ट्रंप का कहना था कि उनके लिए यह कोई असामान्य बात नहीं है कि आयरलैंड और उत्तरी आयरलैंड एक हो जाएं। हालांकि उन्होंने रविवार को यह भी कहा कि यह केवल उनकी राय है और उन्हें इस विचार के लिए काफी समर्थन मिला है। समस्या यह है कि उत्तरी आयरलैंड का ब्रिटेन में रहना या आयरलैंड के साथ जुड़ना केवल दो इलाकों को मिलाने का मामला नहीं है। इसके पीछे करीब एक सदी का इतिहास, दो अलग समुदायों की पहचान और कई दशकों की हिंसा जुड़ी हुई है।
आखिर आयरलैंड और उत्तरी आयरलैंड अलग-अलग क्यों हैं?
इस विवाद को समझने के लिए करीब एक सदी पीछे जाना होगा। आयरलैंड ने ब्रिटेन से स्वतंत्रता हासिल की और एक स्वशासित देश बना। यह देश मुख्य रूप से रोमन कैथोलिक आबादी वाला था। लेकिन आयरलैंड के उत्तर में स्थित छह काउंटी ब्रिटेन का हिस्सा बने रहे। यही इलाका आज उत्तरी आयरलैंड कहलाता है।
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इसके बाद उत्तरी आयरलैंड में दो बड़े राजनीतिक और सामाजिक समुदाय बन गए। एक तरफ राष्ट्रवादी थे, जिनमें ज्यादातर कैथोलिक लोग शामिल थे। वे चाहते थे कि उत्तरी आयरलैंड बाकी आयरलैंड के साथ मिल जाए। दूसरी तरफ मुख्य रूप से प्रोटेस्टेंट संघवादी थे। वे उत्तरी आयरलैंड को ब्रिटेन का हिस्सा बनाए रखना चाहते थे। यानी विवाद सिर्फ जमीन का नहीं था, बल्कि यह सवाल भी था कि वहां रहने वाले लोग खुद को आयरिश मानते हैं या ब्रिटिश।
इस बंटवारे को ऐसे समझें
राष्ट्रवादी: ज्यादातर कैथोलिक, आयरलैंड के साथ एकीकरण चाहते थे।
संघवादी: ज्यादातर प्रोटेस्टेंट, ब्रिटेन के साथ बने रहना चाहते थे।
‘द ट्रबल्स’ क्या था और इसमें कितनी हिंसा हुई?
समय के साथ दोनों पक्षों के बीच तनाव इतना बढ़ गया कि 1960 के दशक के आखिर में यह हिंसक संघर्ष में बदल गया। इस दौर को ‘द ट्रबल्स’ कहा जाता है। करीब तीन दशक तक उत्तरी आयरलैंड में हिंसा चलती रही। इसमें दोनों पक्षों के अर्धसैनिक संगठन शामिल थे और ब्रिटिश सैनिक भी वहां तैनात थे।
बम धमाकों, गोलीबारी और दूसरे हमलों ने आम लोगों की जिंदगी को भी प्रभावित किया। इस हिंसा में करीब 3,600 लोगों की जान चली गई। यही वजह है कि आज भी उत्तरी आयरलैंड की राजनीतिक स्थिति पर होने वाली कोई भी चर्चा वहां के इतिहास और पुराने घावों से जुड़ जाती है।
1998 में गुड फ्राइडे समझौता हुआ। अमेरिका ने इस शांति समझौते को कराने में अहम भूमिका निभाई। इस समझौते के बाद हिंसा काफी हद तक खत्म हो गई। लेकिन समझौते ने यह तय नहीं किया कि भविष्य में उत्तरी आयरलैंड हमेशा ब्रिटेन का हिस्सा रहेगा या कभी आयरलैंड के साथ जुड़ सकता है।
1998 के गुड फ्राइडे समझौते में एकीकरण का रास्ता कैसे खुला?
गुड फ्राइडे समझौते की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने उत्तरी आयरलैंड के अंतिम राजनीतिक दर्जे को हमेशा के लिए तय नहीं किया। समझौते के तहत अगर जनमत सर्वेक्षणों से यह संकेत मिले कि उत्तरी आयरलैंड के लोग आयरलैंड के साथ एकीकरण के पक्ष में मतदान कर सकते हैं, तो जनमत संग्रह कराया जा सकता है।
लेकिन अभी ब्रिटेन सरकार का कहना है कि ऐसी स्थिति नहीं बनी है। यानी उसके अनुसार फिलहाल सार्वजनिक राय उस स्तर तक नहीं बदली है कि एकीकरण पर जनमत संग्रह की जरूरत पड़े। दूसरी तरफ, अगर कभी उत्तरी आयरलैंड में एकीकरण के पक्ष में जनमत संग्रह होता है, तो आयरलैंड को भी इस बदलाव को अपने यहां जनमत संग्रह के जरिए मंजूरी देनी होगी।
गुड फ्राइडे समझौते की अहम बातें:-
ट्रंप के बयान पर ब्रिटेन और आयरलैंड में क्या प्रतिक्रिया?
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बयान के बाद प्रतिक्रिया दोनों तरह की रही। आयरलैंड के प्रधानमंत्री माइकल मार्टिन ने लोगों से इस मुद्दे पर शांत नजरिया रखने को कहा। उन्होंने कुछ प्रतिक्रियाओं को जरूरत से ज्यादा बताया। मार्टिन ने कहा कि वह खुद आयरिश एकता में विश्वास रखते हैं और आयरलैंड की कई राजनीतिक पार्टियां भी एकता का समर्थन करती हैं।
ब्रिटेन की सरकार ने ट्रंप के बयान को ज्यादा तूल न देने की कोशिश की। प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम के कार्यालय ने गुड फ्राइडे समझौते के प्रति उनके 100 प्रतिशत समर्थन की बात दोहराई और कहा कि जनमत संग्रह तभी विचार में आएगा, जब लोगों की राय इतनी बदले कि इस मांग पर विचार करना जरूरी हो जाए।
ब्रिटेन की विपक्षी कंजरवेटिव पार्टी की नेता केमी बेडेनोच ने ट्रंप की आलोचना की। उन्होंने कहा कि ट्रंप पहले भी ग्रीनलैंड और कनाडा के अमेरिका का 51वां राज्य बनने जैसे मुद्दों पर इसी तरह खुलकर बोल चुके हैं और लोकतांत्रिक देशों के भविष्य को लेकर इस तरह की ढीली टिप्पणी तनाव पैदा करती है।
उत्तरी आयरलैंड की डेमोक्रेटिक यूनियनिस्ट पार्टी के नेता गेविन रॉबिन्सन ने भी ट्रंप की बात को खारिज किया। उन्होंने कहा कि उत्तरी आयरलैंड का संवैधानिक भविष्य वहां के लोग तय करेंगे, न कि लंदन, डबलिन या वॉशिंगटन में होने वाली टिप्पणियां।
क्या आयरलैंड के एकीकरण के समर्थक ट्रंप के साथ हैं?
डोनाल्ड ट्रंप के बयान का आयरलैंड के एकीकरण की मांग करने वाली सिन फेन पार्टी ने स्वागत किया। दिलचस्प बात यह है कि राजनीतिक रूप से सिन फेन और ट्रंप के विचारों में काफी अंतर है। सिन फेन का कहना है कि उत्तरी आयरलैंड का भविष्य आयरलैंड के साथ होना चाहिए।
सिन फेन के पूर्व नेता गेरी एडम्स ने भी ट्रंप की टिप्पणी का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि कई दूसरे मुद्दों पर ट्रंप से गहरा मतभेद होने के बावजूद आयरिश एकता को लेकर उनका बयान स्वागत योग्य है। आयरलैंड की सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियां कागज पर एकीकरण का समर्थन करती हैं। हालांकि सिन फेन का आरोप है कि माइकल मार्टिन की मध्यमार्गी सरकार एकीकरण की संभावना को देखते हुए पर्याप्त तैयारी नहीं कर रही है।
मार्टिन का रुख यह है कि आयरिश एकता में विश्वास रखने के बावजूद गुड फ्राइडे समझौते के रास्ते का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि ट्रंप पहले भी आयरलैंड और उत्तरी आयरलैंड के बीच ‘विलय’ को लेकर सवाल पूछ चुके हैं। इसलिए उनके ताजा बयान को पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं माना जाना चाहिए।
क्यों इतना संवेदनशील माना जा रहा ट्रंप का बयान?
सबसे बड़ी वजह यह है कि उत्तरी आयरलैंड का भविष्य ब्रिटेन और आयरलैंड के बीच बेहद संवेदनशील राजनीतिक सवाल है। यहां की शांति कई दशकों की हिंसा के बाद बनी है और गुड फ्राइडे समझौते ने दोनों समुदायों के बीच संतुलन कायम करने की कोशिश की है।
ट्रंप से पहले अमेरिका के राष्ट्रपतियों ने इस मुद्दे पर सीधे टिप्पणी करने से आम तौर पर परहेज किया। यहां तक कि आयरलैंड से गहरे भावनात्मक संबंध रखने वाले पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी उत्तरी आयरलैंड के एकीकरण के सवाल पर सीधा रुख नहीं लिया था। ऐसे में ट्रंप का सार्वजनिक रूप से एकीकरण के समर्थन में बोलना इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
फिर भी ट्रंप का बयान अपने आप में कोई जनमत संग्रह नहीं कराता और न ही उत्तरी आयरलैंड की संवैधानिक स्थिति बदलता है। फिलहाल स्थिति वही है कि उत्तरी आयरलैंड ब्रिटेन का हिस्सा है और भविष्य में बदलाव का रास्ता गुड फ्राइडे समझौते में तय प्रक्रिया से ही खुल सकता है। इसीलिए ट्रंप के बयान ने पुराने मुद्दे को राजनीतिक बहस में जरूर वापस ला दिया है, लेकिन उत्तरी आयरलैंड का भविष्य अभी भी अनसुलझा सवाल है।
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डोनाल्ड ट्रंप का कहना था कि उनके लिए यह कोई असामान्य बात नहीं है कि आयरलैंड और उत्तरी आयरलैंड एक हो जाएं। हालांकि उन्होंने रविवार को यह भी कहा कि यह केवल उनकी राय है और उन्हें इस विचार के लिए काफी समर्थन मिला है। समस्या यह है कि उत्तरी आयरलैंड का ब्रिटेन में रहना या आयरलैंड के साथ जुड़ना केवल दो इलाकों को मिलाने का मामला नहीं है। इसके पीछे करीब एक सदी का इतिहास, दो अलग समुदायों की पहचान और कई दशकों की हिंसा जुड़ी हुई है।
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आखिर आयरलैंड और उत्तरी आयरलैंड अलग-अलग क्यों हैं?
इस विवाद को समझने के लिए करीब एक सदी पीछे जाना होगा। आयरलैंड ने ब्रिटेन से स्वतंत्रता हासिल की और एक स्वशासित देश बना। यह देश मुख्य रूप से रोमन कैथोलिक आबादी वाला था। लेकिन आयरलैंड के उत्तर में स्थित छह काउंटी ब्रिटेन का हिस्सा बने रहे। यही इलाका आज उत्तरी आयरलैंड कहलाता है।
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इसके बाद उत्तरी आयरलैंड में दो बड़े राजनीतिक और सामाजिक समुदाय बन गए। एक तरफ राष्ट्रवादी थे, जिनमें ज्यादातर कैथोलिक लोग शामिल थे। वे चाहते थे कि उत्तरी आयरलैंड बाकी आयरलैंड के साथ मिल जाए। दूसरी तरफ मुख्य रूप से प्रोटेस्टेंट संघवादी थे। वे उत्तरी आयरलैंड को ब्रिटेन का हिस्सा बनाए रखना चाहते थे। यानी विवाद सिर्फ जमीन का नहीं था, बल्कि यह सवाल भी था कि वहां रहने वाले लोग खुद को आयरिश मानते हैं या ब्रिटिश।
इस बंटवारे को ऐसे समझें
राष्ट्रवादी: ज्यादातर कैथोलिक, आयरलैंड के साथ एकीकरण चाहते थे।
संघवादी: ज्यादातर प्रोटेस्टेंट, ब्रिटेन के साथ बने रहना चाहते थे।
‘द ट्रबल्स’ क्या था और इसमें कितनी हिंसा हुई?
समय के साथ दोनों पक्षों के बीच तनाव इतना बढ़ गया कि 1960 के दशक के आखिर में यह हिंसक संघर्ष में बदल गया। इस दौर को ‘द ट्रबल्स’ कहा जाता है। करीब तीन दशक तक उत्तरी आयरलैंड में हिंसा चलती रही। इसमें दोनों पक्षों के अर्धसैनिक संगठन शामिल थे और ब्रिटिश सैनिक भी वहां तैनात थे।
बम धमाकों, गोलीबारी और दूसरे हमलों ने आम लोगों की जिंदगी को भी प्रभावित किया। इस हिंसा में करीब 3,600 लोगों की जान चली गई। यही वजह है कि आज भी उत्तरी आयरलैंड की राजनीतिक स्थिति पर होने वाली कोई भी चर्चा वहां के इतिहास और पुराने घावों से जुड़ जाती है।
1998 में गुड फ्राइडे समझौता हुआ। अमेरिका ने इस शांति समझौते को कराने में अहम भूमिका निभाई। इस समझौते के बाद हिंसा काफी हद तक खत्म हो गई। लेकिन समझौते ने यह तय नहीं किया कि भविष्य में उत्तरी आयरलैंड हमेशा ब्रिटेन का हिस्सा रहेगा या कभी आयरलैंड के साथ जुड़ सकता है।
1998 के गुड फ्राइडे समझौते में एकीकरण का रास्ता कैसे खुला?
गुड फ्राइडे समझौते की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने उत्तरी आयरलैंड के अंतिम राजनीतिक दर्जे को हमेशा के लिए तय नहीं किया। समझौते के तहत अगर जनमत सर्वेक्षणों से यह संकेत मिले कि उत्तरी आयरलैंड के लोग आयरलैंड के साथ एकीकरण के पक्ष में मतदान कर सकते हैं, तो जनमत संग्रह कराया जा सकता है।
लेकिन अभी ब्रिटेन सरकार का कहना है कि ऐसी स्थिति नहीं बनी है। यानी उसके अनुसार फिलहाल सार्वजनिक राय उस स्तर तक नहीं बदली है कि एकीकरण पर जनमत संग्रह की जरूरत पड़े। दूसरी तरफ, अगर कभी उत्तरी आयरलैंड में एकीकरण के पक्ष में जनमत संग्रह होता है, तो आयरलैंड को भी इस बदलाव को अपने यहां जनमत संग्रह के जरिए मंजूरी देनी होगी।
गुड फ्राइडे समझौते की अहम बातें:-
- उत्तरी आयरलैंड के लोगों को अपनी पहचान आयरिश, ब्रिटिश या दोनों बताने का अधिकार मिला।
- भविष्य में परिस्थितियां बदलने पर एकीकरण को लेकर जनमत संग्रह का रास्ता खुला रखा गया।
- ब्रिटेन का कहना है कि अभी जनमत संग्रह कराने वाली परिस्थितियां नहीं बनी हैं।
ट्रंप के बयान पर ब्रिटेन और आयरलैंड में क्या प्रतिक्रिया?
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बयान के बाद प्रतिक्रिया दोनों तरह की रही। आयरलैंड के प्रधानमंत्री माइकल मार्टिन ने लोगों से इस मुद्दे पर शांत नजरिया रखने को कहा। उन्होंने कुछ प्रतिक्रियाओं को जरूरत से ज्यादा बताया। मार्टिन ने कहा कि वह खुद आयरिश एकता में विश्वास रखते हैं और आयरलैंड की कई राजनीतिक पार्टियां भी एकता का समर्थन करती हैं।
ब्रिटेन की सरकार ने ट्रंप के बयान को ज्यादा तूल न देने की कोशिश की। प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम के कार्यालय ने गुड फ्राइडे समझौते के प्रति उनके 100 प्रतिशत समर्थन की बात दोहराई और कहा कि जनमत संग्रह तभी विचार में आएगा, जब लोगों की राय इतनी बदले कि इस मांग पर विचार करना जरूरी हो जाए।
ब्रिटेन की विपक्षी कंजरवेटिव पार्टी की नेता केमी बेडेनोच ने ट्रंप की आलोचना की। उन्होंने कहा कि ट्रंप पहले भी ग्रीनलैंड और कनाडा के अमेरिका का 51वां राज्य बनने जैसे मुद्दों पर इसी तरह खुलकर बोल चुके हैं और लोकतांत्रिक देशों के भविष्य को लेकर इस तरह की ढीली टिप्पणी तनाव पैदा करती है।
उत्तरी आयरलैंड की डेमोक्रेटिक यूनियनिस्ट पार्टी के नेता गेविन रॉबिन्सन ने भी ट्रंप की बात को खारिज किया। उन्होंने कहा कि उत्तरी आयरलैंड का संवैधानिक भविष्य वहां के लोग तय करेंगे, न कि लंदन, डबलिन या वॉशिंगटन में होने वाली टिप्पणियां।
क्या आयरलैंड के एकीकरण के समर्थक ट्रंप के साथ हैं?
डोनाल्ड ट्रंप के बयान का आयरलैंड के एकीकरण की मांग करने वाली सिन फेन पार्टी ने स्वागत किया। दिलचस्प बात यह है कि राजनीतिक रूप से सिन फेन और ट्रंप के विचारों में काफी अंतर है। सिन फेन का कहना है कि उत्तरी आयरलैंड का भविष्य आयरलैंड के साथ होना चाहिए।
सिन फेन के पूर्व नेता गेरी एडम्स ने भी ट्रंप की टिप्पणी का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि कई दूसरे मुद्दों पर ट्रंप से गहरा मतभेद होने के बावजूद आयरिश एकता को लेकर उनका बयान स्वागत योग्य है। आयरलैंड की सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियां कागज पर एकीकरण का समर्थन करती हैं। हालांकि सिन फेन का आरोप है कि माइकल मार्टिन की मध्यमार्गी सरकार एकीकरण की संभावना को देखते हुए पर्याप्त तैयारी नहीं कर रही है।
मार्टिन का रुख यह है कि आयरिश एकता में विश्वास रखने के बावजूद गुड फ्राइडे समझौते के रास्ते का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि ट्रंप पहले भी आयरलैंड और उत्तरी आयरलैंड के बीच ‘विलय’ को लेकर सवाल पूछ चुके हैं। इसलिए उनके ताजा बयान को पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं माना जाना चाहिए।
क्यों इतना संवेदनशील माना जा रहा ट्रंप का बयान?
सबसे बड़ी वजह यह है कि उत्तरी आयरलैंड का भविष्य ब्रिटेन और आयरलैंड के बीच बेहद संवेदनशील राजनीतिक सवाल है। यहां की शांति कई दशकों की हिंसा के बाद बनी है और गुड फ्राइडे समझौते ने दोनों समुदायों के बीच संतुलन कायम करने की कोशिश की है।
ट्रंप से पहले अमेरिका के राष्ट्रपतियों ने इस मुद्दे पर सीधे टिप्पणी करने से आम तौर पर परहेज किया। यहां तक कि आयरलैंड से गहरे भावनात्मक संबंध रखने वाले पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी उत्तरी आयरलैंड के एकीकरण के सवाल पर सीधा रुख नहीं लिया था। ऐसे में ट्रंप का सार्वजनिक रूप से एकीकरण के समर्थन में बोलना इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
फिर भी ट्रंप का बयान अपने आप में कोई जनमत संग्रह नहीं कराता और न ही उत्तरी आयरलैंड की संवैधानिक स्थिति बदलता है। फिलहाल स्थिति वही है कि उत्तरी आयरलैंड ब्रिटेन का हिस्सा है और भविष्य में बदलाव का रास्ता गुड फ्राइडे समझौते में तय प्रक्रिया से ही खुल सकता है। इसीलिए ट्रंप के बयान ने पुराने मुद्दे को राजनीतिक बहस में जरूर वापस ला दिया है, लेकिन उत्तरी आयरलैंड का भविष्य अभी भी अनसुलझा सवाल है।