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Sri Lanka Crisis: उथल-पुथल के बीच अहम सवाल, अब श्रीलंका के सामने विकल्प क्या हैं?

Wed, 11 May 2022 06:20 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 11 May 2022 06:20 PM IST
सार

पिछले महीने वित्त मंत्री बनाए गए मोहम्मद अली साबरी ने संकट टालने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से मदद पाने की कोशिश की थी। लेकिन वाशिंगटन में आईएमएफ अधिकारियों से कई दिन चली बातचीत के बाद वे मायूस होकर लौट आए...

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Sri Lanka Crisis: big question is What are the options are left out from the exit of the economic crisis after the resignation of Prime Minister Mahinda Rajapaksa
श्रीलंका संकट - फोटो : Agency

विस्तार

श्रीलंका में प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के इस्तीफे के बाद सरकार विरोधी आंदोलनकारियों ने राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे पर इस्तीफे के लिए दबाव बढ़ा दिया है। उन्होंने देश में ऐसी नई सरकार के गठन की मांग की है, जिसमें राजपक्षे परिवार का कोई सदस्य शामिल न हो। सोमवार से देश में जारी हिंसा में कम से कम सात लोग मारे गए हैं, जबकि 225 से ज्यादा जख्मी हो गए हैं। देश में अलग-अलग हिस्सों में कर्फ्यू जारी है।

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इस बीच यह कुछ विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि सिर्फ सरकार बदलना श्रीलंका की असल समस्या का हल नहीं है। बल्कि राजनीतिक समस्या खड़ी इसलिए हुई, क्योंकि राजपक्षे सरकार लगातार गहराते चले गए आर्थिक संकट का हल ढूंढने में नाकाम रही। ऐसे में अगर देश में कोई नई सरकार भी बनती है, तो उसके सामने भी देश को मौजूदा मुसीबत से निकालने का सवाल खड़ा रहेगा। इन विशेषज्ञों के मुताबिक असल मुद्दा यह है कि देश जहां पहुंच गया है, वहां अब उसके सामने क्या विकल्प हैं।

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आईएमएफ से भी मिली मायूसी

पिछले महीने वित्त मंत्री बनाए गए मोहम्मद अली साबरी ने संकट टालने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से मदद पाने की कोशिश की थी। लेकिन वाशिंगटन में आईएमएफ अधिकारियों से कई दिन चली बातचीत के बाद वे मायूस होकर लौट आए। वहां ये साफ हो गया कि श्रीलंका की मौजूदा हालत के बीच आईएमएफ तुरंत सहायता देने के मूड में नहीं है।

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विशेषज्ञों अनीस चौधरी और जोमो क्वामे सुंदरम ने एक विश्लेषण में कहा है कि श्रीलंका आज जिस मुसीबत में है, वह पिछले कई दशक से अपनाई जा रही आर्थिक नीतियों का नतीजा है। इन नीतियों के कारण देश का औद्योगिक ढांचा कमजोर हुआ। देश के सकल घरेलू उत्पाद में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर का हिस्सा 22 फीसदी था। 2017 में यह 17 फीसदी रह गया। इसका असर देश के निर्यात पर पड़ा। साल 2000 में देश के जीडीपी के 39 फीसदी हिस्से के बराबर निर्यात हुआ था। 2010 में ये हिस्सा 20 फीसदी रह गया। इसी अनुपात में देश का जीडीपी- टैक्स अनुपात भी कमजोर हुआ है। 1990-92 में कुल जीडीपी के 18.4 फीसदी के बराबर टैक्स वसूली हुई थी। 2019 में ये आंकड़ा 12.7 फीसदी रह गया।

विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि इस रूझान के कारण श्रीलंका विदेशी मुद्रा के लिए अधिक से अधिक पर्यटन से होने वाली आय और कर्ज पर निर्भर होता गया। लेकिन लिए गए कर्ज का इस्तेमाल उत्पादक निवेश और रोजगार पैदा करने की गतिविधियों के बजाय सरकारी तड़क-भड़क पर किया गया। राजपक्षे परिवार की सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की नीतियों ने हालात को और बदतर बना दिया।

अगली सरकार के लिए बड़ी चुनौती

गोटबया राजपक्षे ने 2019 में राष्ट्रपति बनने के बाद मध्य वर्ग को खुश करने के लिए प्रत्यक्ष करों में बड़ी कटौती की। एक ताजा अनुमान के मुताबिक इससे राजकोष को जीडीपी के दो फीसदी हिस्से के बराबर नुकसान हुआ। 2020 में टैक्स-जीडीपी अनुपात घट कर 8.4 फीसदी रह गया।



विश्लेषकों का कहना है कि इन आंकड़ों की रोशनी में लोगों का राजपक्षे परिवार पर गुस्सा फूटना गलत नहीं है। लेकिन अब असल सवाल यह है कि अगली जो भी सरकार बनेगी, क्या उसके पास गलत नीतियों को सुधारने और एक नई शुरुआत करने की इच्छाशक्ति और समझ होगी?

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