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श्रीलंका: क्या है संविधान का 13वां संशोधन? जिसे लेकर तमिल सांसदों ने पीएम मोदी को लिखा पत्र और वहां हो गया विवाद

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Thu, 20 Jan 2022 07:00 PM IST

सार

संशोधन का उद्देश्य तमिल अल्पसंख्यकों को अधिक प्रतिनिधित्व देकर उनके लिए सुलह का रास्ता खोलने और उन्हें राजनीतिक भागीदारी देना है, लेकिन श्रीलंका की सरकारें इसे भारत की तरफ से थोपने के रूप में देखती हैं।
आर सम्पंथन के नेतृत्व में मंगलवार को सांसदों की एक टीम ने  कोलंबो में भारतीय उच्चायुक्त से मुलाकात की और उन्हें पत्र सौंपा
आर सम्पंथन के नेतृत्व में मंगलवार को सांसदों की एक टीम ने कोलंबो में भारतीय उच्चायुक्त से मुलाकात की और उन्हें पत्र सौंपा - फोटो : Twitter : @Sugashkanu
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विस्तार

भयानक आर्थिक बदहाली से गुजर रहे पड़ोसी देश श्रीलंका की भारत हर संभव मदद कर रहा है। पड़ोसी देश की मौजदा स्थिति देखकर पिछले सप्ताह 13 जनवरी को श्रीलंका स्थित भारतीय उच्चायोग ने श्रीलंका को 90 करोड़ डॉलर की मदद की घोषणा की थी। लेकिन यह श्रीलंका के लिए नाकाफी था। मदद के  लिए भारत फिर आगे आया। बीते मंगलवार को 50 करोड़ डॉलर की एक और मदद दी जिससे श्रीलंका पेट्रोलियम उत्पाद खरीद सके।
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भारत के इस सहयोग को लेकर श्रीलंका के उच्चायुक्त मिलिंडा मोरागोडा ने भारत का आभार जताया है और कहा कि इससे दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली में मदद मिलेगी। उन्होंने ये भी कहा है इसके बाद चीन को लेकर भारत की चिंताएं खत्म होंगी। लेकिन इस बीच श्रीलंका के उत्तरी और पूर्वी श्रीलंका के प्रमुख तमिल सांसदों ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा है जिसमें उन्होंने लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़े तमिलों से जुड़े मुद्दों को सुलझाने में मदद करने की गुजारिश की है।


मंगलवार को वरिष्ठ तमिल राजनेता और तमिल नेशनल अलायंस  के नेता आर सम्पंथन के नेतृत्व में सांसदों की एक टीम ने कोलंबो में भारतीय उच्चायुक्त से मुलाकात की और उन्हें पत्र सौंपा। इससे पहले दिसंबर 2021 में भी श्रीलंका के तमिल और मुस्लिम दलों के एक समूह ने दशकों से लंबित 13 वें संविधान संशोधन के पूर्ण कार्यान्वयन के लिए श्रीलंका सरकार पर दबाव बनाने के लिए भारत के हस्तक्षेप की मांग की थी।

आर सम्पंथन के नेतृत्व में मंगलवार को सांसदों की एक टीम ने कोलंबो में भारतीय उच्चायुक्त से मुलाकात की और उन्हें पत्र सौंपा।
आर सम्पंथन के नेतृत्व में मंगलवार को सांसदों की एक टीम ने कोलंबो में भारतीय उच्चायुक्त से मुलाकात की और उन्हें पत्र सौंपा। - फोटो : Twitter : @Sugashkanu
पत्र में क्या है?
पत्र में श्रीलंका के संविधान में 13वें संशोधन को लागू करवाने में भी मदद करने का अनुरोध किया गया है। इस पत्र पर तमिल पार्टियों के कई नेताओं और सांसदों के हस्ताक्षर हैं और उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री से इस मुद्दे पर श्रीलंका सरकार पर दबाव डालने का आग्रह किया है। 

इस पत्र को लेकर श्रीलंका में विवाद हो गया है और देश के ऊर्जा मंत्री उदया गम्मनपिला ने भारतीय प्रधानमंत्री को पत्र लिखे जाने पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने बुधवार को कहा कि संविधान के 13वें संशोधन को लागू करने की मांग देश की चुनी हुई सरकार के सामने उठानी चाहिए न कि भारतीय प्रधानमंत्री के सामने। उन्होंने कहा कि श्रीलंका एक संप्रभु राष्ट्र है और यह भारत का हिस्सा नहीं है।

राजीव गांधी (फाइल फोटो)
राजीव गांधी (फाइल फोटो) - फोटो : Twitter
क्या है श्रीलंका के संविधान में 13वां संशोधन
इस संशोधन के तहत श्रीलंका के नौ प्रांतों में काउंसिल को सत्ता में साझीदार बनाने की बात कही गई। इसका मुख्य उद्देशय श्रीलंका में तमिलों और सिंहलियों के बीच के संघर्ष को रोकना था। संविधान संशोधन के जरिए प्रांतीय परिषद बनाने की बात थी ताकि सत्ता का विकेंद्रीकरण किया जा सके। 

यह संशोधन जुलाई 1987 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी और तत्कालीन श्रीलंकाई राष्ट्रपति जेआर जयवर्धने के बीच शांति समझौते के बाद हुआ था। उस समय, श्रीलंका सशस्त्र बलों और लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) के बीच गृहयुद्ध जैसी स्थिति थी जिसमें एक अलग प्रांत की मांग की जा रही थी।

भारत-श्रीलंका शांति समझौते का उद्देश्य तत्कालीन उत्तरी और पूर्वी प्रांतों में राजनीतिक शक्तियों को हस्तांतरित करने का एक तरीका खोजना था, जिसमें देश के तमिल बहुल क्षेत्र शामिल थे। इस समझौते के तहत श्रीलंका के संविधान में 13वां संशोधन करने और 1987 के प्रांतीय परिषद अधिनियम को सक्षम बनाने की बात कही गई थी जिससे श्रीलंकाई गृहयुद्ध को हल करने की उम्मीद जगी थी। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, आवास, भूमि और पुलिस जैसे विभिन्न मुद्दे शामिल हैं।

एस जयशंकर और श्रीलंका के वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे
एस जयशंकर और श्रीलंका के वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे - फोटो : [email protected] S jaishankar
दिक्कत कहां है
इस मुद्दे पर अभी तक गतिरोध बना हुआ है। 13वें संशोधन की कई बातें अभी तक लागू नहीं की गई है और सरकारों ने इस पर सकारात्मक रुख नहीं दिखाया है। दरअसल देश में कई ऐसी ताकतें हैं जो तमिल अल्पसंख्यकों के साथ किसी भी तरह की राजनीतिक भागीदारी को साझा करने का विरोध कर रही हैं। ज्यादातर सिंहली राष्ट्रवादी दल जैसे जनता विमुक्ति पेरामुना, नेशनल फ्रीडम फ्रंट  और जथिका हेला उरुमाया लगातार संशोधन को रद्द करने की मांग करते रहते हैं। वहीं, श्रीलंका इस विषय को अपने आंतरिक मामलों में भारत के हस्तक्षेप के रूप में देखता है। 

भारत क्या चाहता है?
भारत चाहता है कि श्रीलंका सरकार संविधान संशोधन के सभी प्रावधानों को जल्द से जल्द लागू करे, ताकि सत्ता का हस्तांतरण हो और जाफना में तमिलों को नीतिगत फैसले लेने का अधिकार हासिल हो। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर जो पिछले साल जनवरी के पहले सप्ताह में श्रीलंका के तीन दिवसीय दौरे पर गए थे, उन्होंने वहां यह दोहराया था कि समानता, न्याय, शांति और गरिमा के लिए तमिलों  की उम्मीदों को पूरा करना संयुक्त श्रीलंका के हित में है। पिछले साल अक्टूबर में भारत के विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला के श्रीलंका दौरे के दौरान भी यह मुद्दा उठाया था। माना जाता है कि भारत-श्रीलंका के संबंधों के बीच यही एक नस है जो इसे तनावपूर्ण बना देता है। 
 
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