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उत्तर कोरिया में किम की बहन को लेकर अटकलों का दौर, पार्टी में पहले से भी मजबूत होकर उभरे किम जोंग
Tue, 12 Jan 2021 03:39 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हांगकांग
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हांगकांग
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Tue, 12 Jan 2021 03:39 PM IST
सार
किम जोंग-उन ने जानबूझ कर अपनी बहन को अत्याधिक मीडिया लाइमलाइट से दूर किया है, ताकि वे लो-प्रोफाइल रहते हुए अपना काम कर सकें,,,
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kim jong un sister Kim Yo Jong
- फोटो : Amar Ujala (File)
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विस्तार
उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग-उन ने देश की सत्ता पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है। ये बात यहां सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के महाधिवेशन में जाहिर हुई। दूसरी तरफ इस महाधिवेशन से जो संकेत मिले, उससे किम की शक्तिशली बहन के राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलों का दौर शुरू हो गया है।
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पर्यवेक्षकों ने इस बात पर गौर किया है कि पार्टी की पोलित ब्यूरो के सदस्यों की सूची में किम की बहन किम यो-जोंग का नाम नहीं है। पिछले साल किम के बीमार होने की जब खबर फैली थी, तब कहा गया था कि उनकी मृत्यु की स्थिति में किम यो-जोंग ही सत्ता संभालेंगी। वैसे भी उन्हें उत्तर कोरिया में दूसरी सबसे शक्तिशाली शख्सियत समझा जाता रहा है। लेकिन इस बार पोलित ब्यूरो में उनका नाम ना आने से कई तरह की अकटलें लगाई जा रही हैं। कुछ विश्लेषकों के मुताबिक यह किम यो-जोंग की ताकत घटाने की कोशिश है। लेकिन कई दूसरे विश्लषकों ने कहा है कि किम जोंग-उन ने जानबूझ कर अपनी बहन को अत्याधिक मीडिया लाइमलाइट से दूर किया है, ताकि वे लो-प्रोफाइल रहते हुए अपना काम कर सकें।
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महाधिवेशन के दौरान किम ने सत्ता पर अपनी पकड़ दिखाने के लिए अपने वफादार अधिकारियों की पदोन्नति की। इनमें ज्यादातर लंबे समय से कार्यरत अधिकारी हैं, जिनकी उम्र साठ साल से ऊपर हो चुकी है। किम की हैसियत अब देश में वैसी हो गई है, जैसी उनके दादा किम इल सुंग की थी। उनके पिता ने भी लगभग वैसी हैसियत हासिल की थी। उत्तर कोरिया के सरकारी मीडिया के मुताबिक महाधिवेशन के दौरान प्रमुख अधिकारियों की नियुक्ति हुई। उसी सूची पर गौर करने के बाद उत्तर कोरिया के पर्यवेक्षकों का कहना है कि इसमें भी सबसे ऊंची प्राथमिकता निजी वफादारी को दी गई।
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महाधिवेशन के दौरान देश की विदेश, सैनिक और आर्थिक नीति को भी मंजूरी दी गई। उत्तर कोरिया इस समय गहरे आर्थिक संकट में है। यह बात महाधिवेशन के आरंभिक सत्र में खुद किम ने स्वीकार की थी। इसके अलावा महाधिवेशन के सामने अमेरिका में हो रहे सत्ता परिवर्तन के मद्देनजर विदेश नीति को हरी झंडी देने की चुनौती भी थी।
सियोल यूनिवर्सिटी में उत्तर कोरियाई मामलों के प्रोफेसर यांग मू-जिन ने हांगकांग के अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से बातचीत में कहा कि किम ने अपने लिए जो नया पद लिया है, उससे ही उसकी बढ़ी हैसियत का अंदाजा लगता है। अब तक उनका पद प्रथम सचिव का था। अब वे पार्टी के महासचिव बन गए हैं। यांग के मुताबिक अपने शासन के आरंभिक दिनों में किम अपनी सत्ता मजबूत करना चाहते थे। ऐसा कर लेने के बाद अब उन्होंने महासचिव का पद संभाल लिया है, जिससे उनके साथ उनके पूर्ववर्तियों का प्रभामंडल जुड़ गया है।
उन्होंने संदेश दिया है कि अब वे अपने बूते पर राज कर रहे हैं। यांग ने कहा कि महाधिवेश से मिला महत्वपूर्ण संकेत यह है कि राजकाज में सैनिक मामलों को प्राथमिकता देने की नीति अब बदली जा रही है। उसकी जगह अब पार्टी केंद्रित सोशलिस्ट सिस्टम पर जोर दिया जाएगा, ताकि आर्थिक नीतियों पर अमल को तरजीह मिल सके।
लेकिन उत्तर कोरिया के कई दूसरे जानकारों का मानना है कि अपना पद बढ़ाकर किम ने खुद से जुड़ी अपेक्षाओं को भी बढ़ा दिया है। किम नौ साल से सत्ता में हैं। अब अगर वे आर्थिक कठिनाइयों से समेत दूसरी चुनौतियों के मामले में नतीजा देने में विफल रहते हैं और परमाणु मुद्दे पर अमेरिका से उत्तर कोरिया का तनाव बढ़ता है, तो किम के लिए सत्ता पर पकड़ बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा।