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जर्मनी के बच्चों को लेकर आई खास रिपोर्ट, सरकार भी टेक चुकी है घुटने

Wed, 29 Jul 2020 04:05 AM IST
योगेश साहू वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बर्लिन।
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बर्लिन। Published by: योगेश साहू Updated Wed, 29 Jul 2020 04:05 AM IST
सार

  • जर्मनी पर कोरोना की मार, हर पांचवां बच्चा गरीबी का शिकार
  • लॉकडाउन की वजह से और बिगड़ गए हालात 
  • 28 लाख बच्चे गरीबी में जीवन बिताने को हैं मजबूर 
  • 24 फीसदी बच्चों के पास कंप्यूटर और इंटरनेट नहीं 
  • 21.3 फीसदी बच्चे देश में फिलहाल गरीबी का शिकार 
  • 2014 में इस मामले में बहुत कम सुधार देखा गया

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Special report on children of Germany, every fifth poverty victim, situation deteriorated due to lockdown
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

विस्तार

कोरोना वायरस ने दुनिया के तमाम देशों की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित किया है। कई संपन्न देशों के आर्थिक हालात खराब हो गए हैं तो कई देश जो विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे, उनके भी पहिए थम से गए हैं। कोरोना वायरस के देशों में आमजन के साथ-साथ आर्थिक हालात पर भी बुरा प्रभाव डाला है। इसका असर बच्चों के भविष्य पर भी पड़ा है।

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जर्मनी के बेर्टल्समन फाउंडेशन की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, देश में 28 लाख बच्चे अपना जीवन गरीबी रेखा में बिता रहे हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सालों से बच्चों की गरीबी का मुद्दा जर्मनी के लिए सबसे बड़ी सामाजिक चुनौतियों में से एक रहा है।
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साल 2014 से इस मामले में बहुत ही कम सुधार देखा गया था। इस रिपोर्ट के अनुसार, 18 साल से कम उम्र के कुल 21.3 फीसदी बच्चे फिलहाल गरीबी का शिकार हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सोशल सिक्योरिटी पाने वाले परिवारों में 24 फीसदी बच्चों के पास कंप्यूटर और इंटरनेट नहीं था।
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फाउंडेशन के अध्यक्ष यार्ग ड्रेगर का आरोप है कि सरकार इस समस्या से निपटने के लिए कुछ भी नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि बच्चों को गरीबी से बाहर निकालना प्राथमिकता होनी चाहिए, मगर ऐसा नहीं किया गया। अब कोरोना की वजह से बच्चे पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं, ऐसे में उनके लिए कुछ और व्यवस्था की जानी चाहिए थी मगर कुछ नहीं किया गया। यह ऐसा है जैसे सरकार ने भी घुटने टेक दिए हैं।

लॉकडाउन में नहीं शुरू कर पाए पढ़ाई

बच्चों का एक वर्ग वह भी है जिसे अप्रैल में पढ़ाई-लिखाई शुरू करनी थी। मगर कोरोना वायरस और उसके कारण लॉकडाउन ने उनको भी रोक दिया है अब वह कब स्कूल जा पाएंगे और कब शिक्षा शुरू कर पाएंगे, ये भी कोई नहीं कह सकता। ऐसे में बच्चों के भविष्य पर असर पड़ना तय है। इस शोध के लिए बच्चों की जिंदगी से जुड़े कई कारकों पर ध्यान दिया गया उसके बाद रिपोर्ट तैयार की गई।

पार्ट टाइम नौकरी वालों के बच्चों पर सबसे ज्यादा असर

दरअसल, गरीबी में बच्चों को पाल रहे ज्यादातर लोग वे हैं जो किसी तरह की पार्ट टाइम नौकरी करते हैं। कोरोना संक्रमण के दौरान ऐसे लोगों की आमदनी पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है। बेर्टल्समन फाउंडेशन के अध्यक्ष यार्ग ड्रेगर का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान सरकार द्वारा दी जाने वाली कई सेवाएं भी लोगों तक नहीं पहुंच सकी हैं।

ऐसे में गरीबी में जी रहे इन बच्चों पर काफी असर पड़ा है। इन बच्चों के लिए घर पर रहकर पढ़ाई करना भी मुश्किल था, क्योंकि स्कूल ऑनलाइन क्लास चला रहे थे और इन बच्चों के परिवारों के पास ऑनलाइन पढ़ाई के सभी जरूरी साधन नहीं थे।

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