जर्मनी: यूरोप की निगाह आखिर क्यों टिकी है बर्लिन के जनमत संग्रह पर?
जानकारों के मुताबिक शहर में टेक कंपनियों की बढ़ी गतिविधियों के कारण यहां मकान किराये में ये बढ़ोतरी हुई। लेकिन यहां उसी अनुपात में लोगों की तनख्वाह नहीं बढ़ी है। बर्लिन में औसत आमदनी जर्मनी की औसत आय से कम है। राजधानी होने के बावजूद बर्लिन प्रति व्यक्ति औसत आय के लिहाज से जर्मन शहरों में 16वें स्थान पर है...
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जर्मनी में संघीय संसद के चुनाव पर सारी दुनिया की निगाहें हैं। लेकिन इसके साथ ही बर्लिन शहर में एक खास जनमत संग्रह भी होगा। जानकारों की राय है कि बर्लिन के लोग जो फैसला देंगे, उसका यूरोप और दूसरे देशों की आवास नीति पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा। टीवी चैनल यूरो न्यूज के एक विश्लेषण में कहा गया है कि बर्लिन के जनमत संग्रह के नतीजों से यूरोपीय राजधानियों में रियल एस्टेट के कारोबार से जुड़े लोगों को सदमा पहुंच सकता है।
बर्लिन में मतदान संघीय चुनाव के साथ ही 26 सितंबर को होगा। उसमें बर्लिन के बाशिंदे इस सवाल पर फैसला देंगे कि क्या नगर प्रशासन को बड़े बिल्डरों के अतिरिक्त मकानों को जब्त कर लेना चाहिए। यूरोप के दूसरे शहरों की तरह बर्लिन में भी आवास की महंगाई एक बड़ी समस्या बनी हुई है। अगर बर्लिन के मतदाताओं ने बिल्डरों के मकान जब्त करने के पक्ष में फैसला दिया, तो संभव है कि दो लाख 40 हजार अपार्टमेंट नगर प्रशासन अपने मालिकाने में ले ले। संभावना है कि इससे यूरोप के दूसरे शहरों में भी ऐसा कदम उठाने की मांग तेज हो जाएगी।
यूरो न्यूज के मुताबिक बर्लिन में जनमत संग्रह कराने का फैसला किरायेदारों में बढ़े असंतोष का नतीजा है। एक समय बर्लिन की छवि सबसे किफायती आवास वाले शहर की थी। लेकिन हाल के वर्षों में बर्लिन उन शहरों में शामिल हो गया है, जहां सबसे तेजी से मकान किराया बढ़ा है। लंदन और पेरिस की तरह ही यहां 2009 से 2019 के बीच औसत मकान किराया दो गुना हो गया।
जानकारों के मुताबिक शहर में टेक कंपनियों की बढ़ी गतिविधियों के कारण यहां मकान किराये में ये बढ़ोतरी हुई। लेकिन यहां उसी अनुपात में लोगों की तनख्वाह नहीं बढ़ी है। बर्लिन में औसत आमदनी जर्मनी की औसत आय से कम है। राजधानी होने के बावजूद बर्लिन प्रति व्यक्ति औसत आय के लिहाज से जर्मन शहरों में 16वें स्थान पर है।
मकानों के राष्ट्रीयकरण के पक्ष में अभियान चलाने वाले संगठन ड्यूश वोहनेन कैंपेन के कार्यकर्ता केली कुंकेल ने यूरो न्यूज से बातचीत में कहा कि आवास की महंगाई से सिर्फ कम आय वाले लोगों पर ही दबाव नहीं बढ़ा है, बल्कि इससे बर्लिन का ताना-बाना बिखर जाने का खतरा पैदा हो गया है। उन्होंने कहा- “शहर में कम आय वाले लोगों की संख्या बहुत है। आवास की महंगाई का भारी बोझ उन पर पड़ रहा है। बर्लिन के निवासियों में 80 से 85 फीसदी ऐसे लोग हैं, जो किराये के मकानों में रहते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि शहर की बहुसंख्या को इस हकीकत का सामना करना पड़ रहा है।”
इसी समस्या के बीच बर्लिन के नगर प्रशासन ने जनमत संग्रह कराने का फैसला किया। इसके पहले प्रशासन ने किराया घटाने का आदेश जारी किया। लेकिन जर्मनी के सर्वोच्च न्यायालय ने उसे रद्द कर दिया। कोर्ट का ये फैसला कोरोना महामारी के बीच आया। इससे बर्लिन वासियों में नाराजगी पैदा हुई। शहर में कोर्ट के फैसले के खिलाफ कई बड़ी रैलियां हुईं। इस आंदोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि जिन लोगों के पास 3000 से ज्यादा फ्लैट हैं, उनके अतिरिक्त फ्लैट्स को प्रशासन अपने मालिकाने में लेकर उसे सार्वजनिक संपत्ति घोषित कर दे। इसी मुद्दे पर जनमत संग्रह में बर्लिन के लोग अपना निर्णय देंगे।