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साइबेरिया: जंगल में लगी आग से लाखों हेक्टेयर वनक्षेत्र नष्ट, बदलती जलवायु से बढ़ा खतरा

Sat, 03 Aug 2019 06:04 PM IST
अनिल पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अनिल पांडेय Updated Sat, 03 Aug 2019 06:04 PM IST
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सार
  • 3 हजार 900 लाख वर्ष पूर्व पहली बार कार्बोनिफेरस युग में लगी थी जंगलों में आग। इसके प्रमाण उपलब्ध हैं।
  • 2017 में दक्षिणी अमेरिकी देश चिली के जंगलों में लगी थी दशक की सबसे भीषण आग।
  • 747 सुपर टैंक आग बुझाने में सबसे मददगार हैं, क्योंकि एक बार में यह 75 हजार लीटर से अधिक पानी गिरा सकते हैं।
  • 30 मिनट के कम समय में इस सुपर टैंकर को जैल, फाेम और पानी से भरा जा सकता है। 600 मील की रफ्तार से यह उड़ सकता है।
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Smoke from Siberian forest fires traveled across Bering Sea to United States, Canada
साइबेरिया के जंगलों में आग - फोटो : Russia Today

विस्तार

साइबेरिया और पूर्वी रूस के जंगलों में लगी आग पर काबू पाने के लिए रूसी सेना ने भी प्रयास करना शुरू कर दिया है। साइबेरिया में लगभग 30,000 वर्ग किलोमीटर (11,580 वर्ग मील) वनक्षेत्र में लगी आग पर काबू पाने के लिए हरसंभव प्रयास किया जा रहा है। आग पर काबू पाने के लिए सैन्य परिवहन विमानों और हेलीकॉप्टरों को भी शामिल किया गया है। रूस ने पांच क्षेत्रों में आपातकाल की स्थिति घोषित की है, जिसमें सभी इरकुत्स्क और क्रास्नोयार्स्क क्षेत्र शामिल हैं, जो उत्तर मंगोलिया में स्थित हैं।



साइबेरिया के क्रास्नोयार्स्क क्षेत्र में लगी आग की तस्वीरों को नासा और यूरोप के कोपरनिकस वायुमंडल निगरानी सेवा (सीएएमएस) ने जारी किया है। इसमें देखा जा सकता है कि तेज हवा के कारण फैली आग की वजह से धुएं ने पूरे क्षेत्र को ढंक दिया है। इससे दक्षिण-पश्चिमी साइबेरिया में 16 लाख की आबादी के साथ रूस के तीसरे सबसे बड़े शहर नोवोसिबिर्स्क सहित कई शहरों में लोगों को सांस लेने दिक्कत हो रही है।

बदलती जलवायु से बढ़ा जंगलों में आग का खतरा

ग्लोबल वार्मिंग के कारण जंगलों में आग लगने की समस्या विकराल होती जा रही है। पिछले साल अमेरिका के कैलिफोर्निया और यूरोप में एथेंस के जंगलों में भीषण आग से काफी नुकसान हुआ था। विशेषज्ञों के अनुसार इंसानों का जंगल में बढ़ता दखल, जंगलों की खराब व्यवस्था और बदलती जलवायु जंगलों की आग लगने का बड़ा कारण है।

 




दुनिया में आग से तबाह हुए कई इलाके ऐसे हैं, जहां की जलवायु में तापमान और सूखा बढ़ने के कयास लगाए गए थे। गर्मी से वाष्पीकरण की प्रक्रिया भी तेज होती है और सूखा कायम रहता है। मौसम सूखा होगा तो वनस्पति सूखेगी और आग को ईंधन मिलेगा। सूखे पेड़-पौधों और घास में आग न सिर्फ आसानी से लगती है, बल्कि तेजी से फैलती है। सूखे मौसम के कारण जंगलों में ईंधन का एक भरा पूरा भंडार तैयार हो जाता है। गर्म मौसम में हल्की सी चिंगारी या फिर पेड़ पौधों के आपस में घर्षण से पैदा हुई आग जंगल जला देती है।

जंगल में आग कैसे लगती है?

नासा की तस्वीर में आग और धुआं
नासा की तस्वीर में आग और धुआं - फोटो : Nasa

आग के लिए तीन चीजों की जरूरत होती हैः ईंधन, ऑक्सीजन और ताप। जब गर्मी चरम पर होती है तो पूरे जंगल को अपने आगोश में लेने के लिए एक हल्की सी चिंगारी भी काफी होती है। ये चिंगारी जंगलों से गुजरने वाली ट्रेनों के पहियों से निकल सकती है या फिर टहनियों की रगड़ से। सूरज की तेज किरणें भी आग को बढ़ावा देती है। हालांकि ज्यादातर आग इंसान की लापरवाही के चलते लगती आई है। जैसे कैंप फायर, सिगरेट का जलता टुकड़ा, पटाखे और माचिस की तिल्लियां इसकी वजह रही हैं।

तेजी से क्यों फैलती है आग?

अगर आग एक बार लगती है तो इसे हवा बढ़ावा देती है। अगर हवा तेज गति से चल रही है तो आग तेजी से जंगल में फैलती है। गर्मी ज्यादा होती है तो जंगल में पेड़ों की टहनियां और शाखाएं सूख जाती हैं, जो आसानी से आग पकड़ लेती हैं। अगर जंगल में ढलान है तो आग और तेजी से फैलती है।

मौसम भी है कारण

बारिश का कम होना, सूखे जैसी स्थिति, गर्म हवाओं का चलना और ज्यादा तापमान, ये सभी जंगलों में आग के लिए जिम्मेदार होते हैं। जैसे-जैसे प्रकृति का दोहन बढ़ रहा है, वातावरण में संतुलन बिगड़ रहा है। इसकी वजह से बारिश कम हो रही है, गर्मी ज्यादा होने लगी है, जिसके कारण जंगलों में आग का खतरा बढ़ता जा रहा है।

ऐसे पाया जाता है आग पर काबू

विशेषज्ञ आग की संभावनाओं का पता लगाने के लिए विशेष टूल का इस्तेमाल करते हैं, जो तापमान, हवा की गति जैसे मानकों की जांच करती है। इन मानकों के खतरनाक स्तर पर पहुंचने से पहले आग को रोकने के प्रयास किए जाते हैं। जैसे जंगल के इलाकों में बीच-बीच में गड्ढे खोद देना ताकि आग आगे न फैल सके। साथ ही जंगलों से उन सभी चीजों को हटा दिया जाता है, जो चिंगारी पैदा करती हों। 

जलवायु परिवर्तन से है जंगल की आग का संबंध

सूखे में उगने वाले पेड़-पौधे: पौधों की नई प्रजातियां मौसम के हिसाब से अपने आपको अनुकूलित कर रही है और कम पानी में उग सकने वाले पेड़ पौधों की तादाद बढ़ती जा रही है। नमी में उगने वाले पौधे गायब हो रहे हैं और उनकी जगह रोजमैरी, वाइल्ड लैवेंडर और थाइ जैसे पौधे जड़ जमा रहे हैं जो सूखे मौसम को भी झेल सकते हैं और जिनमें आग भी खूब लगती है।

जमीन की कम होती नमी: तापमान बढ़ने और बारिश कम होने के कारण पानी की तलाश में पेड़ों और झाड़ियों की जड़ें मिट्टी में ज्यादा गहराई तक जा रही हैं और वहां मौजूद पानी के हर कतरे को सोख रही हैं ताकि अपनी पत्तियों और कांटों को पोषण दे सकें। इसका मतलब है कि जमीन की जो नमी से आग को फैलने से रोकती थी, वह अब वहां नहीं है।

सालभर में कभी भी लग सकती है आग

धरती के उत्तरी गोलार्ध में तापमान की वजह से आग लगने का मौसम ऐतिहासिक रूप से छोटा होता था। ज्यादातर इलाकों में जुलाई से लेकर अगस्त तक। आज यह बढ़कर जून से अक्टूबर तक चला गया है। कुछ वैज्ञानिक तो कहते हैं कि अब आग पूरे साल में कभी भी लग सकती है। अब इसके लिए किसी खास मौसम की जरूरत नहीं। वहीं जितनी गर्मी होगी उतनी ज्यादा बिजली गिरेगी। वैज्ञानिक बताते हैं कि उत्तरी इलाकों में अक्सर बिजली गिरने से आग लगती है। हालांकि बात अगर पूरी दुनिया की हो तो जंगल में आग लगने की 95 फीसदी घटनाएं इंसानों की वजह से शुरू होती हैं।

कमजोर जेट स्ट्रीम भी है कारण: उत्तरी अमेरिका और यूरेशिया में मौसम का पैटर्न शक्तिशाली, ऊंची हवाओं से तय होता है। ये हवाएं ध्रुवीय और भूमध्यरेखीय तापमान के अंतर से पैदा होती हैं। इन्हें जेट स्ट्रीम कहा जाता है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक इलाके का तापमान वैश्विक औसत की तुलना में दोगुना बढ़ गया है और इसके कारण ये हवाएं कमजोर पड़ गई हैं। तापमान बढ़ने से कारण ना सिर्फ जंगल में आग लगने का खतरा रहता है, बल्कि इनकी आंच के भी तेज होने का जोखिम रहता है। हाल के समय में कैलिफोर्निया और ग्रीस में यह साफतौर पर देखने को मिला। वहां हालात ऐसे बन गए कि कुछ भी करके आग को रोका नहीं जा सकता। सारे उपाय नाकाम हो गए। 

25 फीसदी ग्रीनहाउस गैसों को सोख लेते हैं जंगल

दुनियाभर के जंगल पृथ्वी के जमीनी क्षेत्र से पैदा होने वाले 45 फीसदी कार्बन और इंसानों की गतिविधियों से पैदा हुईं 25 फीसदी ग्रीनहाउस गैसों को सोख लेते हैं। हालांकि जंगल के पेड़ जब मर जाते हैं या जल जाते हैं तो कार्बन की कुछ मात्रा फिर जंगल के वातावरण में चली जाती है और इस तरह से जलवायु परिवर्तन में उनकी भी भूमिका बन जाती है।

भारत में भी दर्ज हुए आंकड़े

अंतरिक्ष मंत्रालय ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा कि पिछले साल उपग्रहों ने जंगल में आग की 38,900 घटनाओं की पहचान की, जिनकी सूचनाएं राज्यों के वन विभाग से साझा की गईं। रिपोर्ट में कहा गया कि फरवरी से जून 2018 के बीच उपग्रहों से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल करते हुए सक्रियता से वनों में आग की निगरानी की गई। गर्मियों में अक्सर आग लगने की घटनाएं होती हैं।

2018-2019 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया, 'मौसम के दौरान करीब 38,900 जगहों पर आग लगने की घटनाएं हुईं।' मौजूदा बजट सत्र के दौरान यह रिपोर्ट संसद में पेश की गई। जंगल में आग की जानकारी भारतीय वन सर्वेक्षण,देहरादून के साथ साझा की गई। रिपोर्ट में कहा कि इसके अलावा चुनिंदा राज्य वन विभागों को एसएमएस के जरिये आग का अलर्ट भी भेजा जाता है।

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