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Russia Ukraine War: रूस में सैन्य भर्ती से कैसे बढ़ने वाली हैं भारत की मुश्किलें, जानें दुनिया पर क्या असर
Sun, 02 Oct 2022 07:36 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, मॉस्को
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, मॉस्को
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sun, 02 Oct 2022 07:36 PM IST
सार
यूक्रेन से युद्ध के बीच रूस को तेल कंपनियों के कर्मियों को भर्ती करने की जरूरत क्यों पड़ रही है? इससे रूस के राजस्व पर क्या असर पड़ेगा? बाकी दुनिया पर रूस के इस कदम के क्या प्रभाव होंगे? इसके अलावा भारत पर इस फैसले का क्या असर होगा? आइये जानते हैं...
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रूस से तेल आयात।
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध को सात महीने से ज्यादा हो चुके हैं। दोनों ही देशों के बीच जंग लगातार बढ़ती जा रही है। खासकर रूस की ओर से यूक्रेन के चार क्षेत्रों के अधिग्रहण के एलान के बाद से। इस बीच रूस ने अपने रिजर्व सैनिकों को भी युद्ध के मैदान में उतारने का फैसला किया है। सेना में अनुभव रखने वाले या सैन्य ट्रेनिंग पाए जिन लोगों की भर्ती की जा रही है, उनमें से अधिकतर इस वक्त आम लोगों की तरह नौकरियां कर रहे हैं। इनमें दुकान चलाने वालों से लेकर बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम करने वाले लोग तक शामिल हैं। खास बात यह है कि सेना में जिनकी भर्ती की जा रही है, उनमें देश की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अहम ऑयल-गैस सेक्टर से जुड़े कर्मचारी मुख्य रूप से शामिल हैं।
ऐसे में रूस की रिजर्व सैन्य भर्ती को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। खास तौर पर तेल कंपनियों के कर्मचारियों की भर्ती को लेकर। क्योंकि रूस के राजस्व में एक बड़ा हिस्सा इन्हीं तेल कंपनियों द्वारा किए जा रहे निर्यात की वजह से आ रहा है। इसके अलावा ओपेक देशों की तरफ से कच्चे तेल के दामों में लगातार होती बढ़ोतरी के बीच कई देश तेल सप्लाई के लिए रूस पर जबरदस्त तौर पर निर्भर हैं। इनमें एक नाम भारत का भी है। यानी एक चिंता यह भी है कि रूसी तेल कंपनियों में कर्मचारियों की कमी का दुनियाभर में तेल सप्लाई पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
यूक्रेन से युद्ध के बीच रूस को तेल कंपनियों के कर्मियों को भर्ती करने की जरूरत क्यों पड़ रही है? इससे रूस के राजस्व पर क्या असर पड़ेगा? बाकी दुनिया पर रूस के इस कदम के क्या प्रभाव होंगे? इसके अलावा भारत पर इस फैसले का क्या असर होगा? आइये जानते हैं...
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ऐसे में रूस की रिजर्व सैन्य भर्ती को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। खास तौर पर तेल कंपनियों के कर्मचारियों की भर्ती को लेकर। क्योंकि रूस के राजस्व में एक बड़ा हिस्सा इन्हीं तेल कंपनियों द्वारा किए जा रहे निर्यात की वजह से आ रहा है। इसके अलावा ओपेक देशों की तरफ से कच्चे तेल के दामों में लगातार होती बढ़ोतरी के बीच कई देश तेल सप्लाई के लिए रूस पर जबरदस्त तौर पर निर्भर हैं। इनमें एक नाम भारत का भी है। यानी एक चिंता यह भी है कि रूसी तेल कंपनियों में कर्मचारियों की कमी का दुनियाभर में तेल सप्लाई पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
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यूक्रेन से युद्ध के बीच रूस को तेल कंपनियों के कर्मियों को भर्ती करने की जरूरत क्यों पड़ रही है? इससे रूस के राजस्व पर क्या असर पड़ेगा? बाकी दुनिया पर रूस के इस कदम के क्या प्रभाव होंगे? इसके अलावा भारत पर इस फैसले का क्या असर होगा? आइये जानते हैं...
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रूस को तेल कंपनियों के कर्मियों को भर्ती करने की जरूरत क्यों पड़ी?
यूक्रेन की तरफ से रूसी सेना के खिलाफ किए जा रहे पलटवार के बीच राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने आंशिक सैन्य संग्रहण (Partial Military Conscription) यानी आम जनता से सैनिकों की भर्ती का एलान कर दिया। इसके तहत रूस में ही रिजर्व रखे गए 2.5 करोड़ सैन्य प्रशिक्षितों में से यूक्रेन में युद्ध के लिए 3,00,000 सैनिकों की टुकड़ी का गठन होना है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, रूस में सेना से रिटायर होने या सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके लोगों का एक बड़ा तबका तेल कंपनियों में ही काम करता है। ऐसे में रूस की 3,00,000 रिजर्व सैन्यकर्मियों की भर्ती में एक बड़ा वर्ग इन्हीं तेल कंपनियों में कार्यरत कर्मचारियों का होगा।
यूक्रेन की तरफ से रूसी सेना के खिलाफ किए जा रहे पलटवार के बीच राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने आंशिक सैन्य संग्रहण (Partial Military Conscription) यानी आम जनता से सैनिकों की भर्ती का एलान कर दिया। इसके तहत रूस में ही रिजर्व रखे गए 2.5 करोड़ सैन्य प्रशिक्षितों में से यूक्रेन में युद्ध के लिए 3,00,000 सैनिकों की टुकड़ी का गठन होना है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, रूस में सेना से रिटायर होने या सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके लोगों का एक बड़ा तबका तेल कंपनियों में ही काम करता है। ऐसे में रूस की 3,00,000 रिजर्व सैन्यकर्मियों की भर्ती में एक बड़ा वर्ग इन्हीं तेल कंपनियों में कार्यरत कर्मचारियों का होगा।
क्या होगा रूस के राजस्व पर प्रभाव?
पश्चिमी देशों की तरफ से रूस पर पहले ही कई प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं। इनमें अमेरिका से लेकर फ्रांस की तरफ से लगाई गई पाबंदियां भी शामिल हैं। यानी रूस को अपने जीवाश्म ईंधन से होने वाले राजस्व में पहले ही बड़ी कमी का सामना करना पड़ा है। जर्मनी को गैस पहुंचाने वाली उसकी नॉर्ड स्ट्रीम 1 पाइपलाइन से सप्लाई पहले ही बंद हो चुकी है। इसके अलावा नॉर्ड स्ट्रीम 2 पर भी अज्ञात लोगों के हमले से बड़ा नुकसान हुआ है। यानी रूस के ऊर्जा क्षेत्र पर चौतरफा दबाव है।
अब ऊर्जा कंपनियों से कर्मचारियों की भर्ती सेना में करने के बाद रूस के तेल-गैस सेक्टर पर और ज्यादा दबाव बढ़ने की आशंका है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कर्मचारियों की कमी के चलते आने वाले दिनों में रूस के साइबेरिया में मौजूद प्राकृतिक गैस के कुओं को कुछ दिनों में ही बंद करना पड़ेगा। इसके चलते रूस की उत्पादन क्षमता घटना लगभग तय है। इसके अलावा जो देश इस वक्त रूस से तेल-गैस खरीद भी रहे हैं, उन्हें भी इसके आयात के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। नतीजतन पहले से आर्थिक दबाव झेल रहे रूस को ऊर्जा क्षेत्र से होने वाले राजस्व में भारी घाटा उठाना पड़ेगा।
पश्चिमी देशों की तरफ से रूस पर पहले ही कई प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं। इनमें अमेरिका से लेकर फ्रांस की तरफ से लगाई गई पाबंदियां भी शामिल हैं। यानी रूस को अपने जीवाश्म ईंधन से होने वाले राजस्व में पहले ही बड़ी कमी का सामना करना पड़ा है। जर्मनी को गैस पहुंचाने वाली उसकी नॉर्ड स्ट्रीम 1 पाइपलाइन से सप्लाई पहले ही बंद हो चुकी है। इसके अलावा नॉर्ड स्ट्रीम 2 पर भी अज्ञात लोगों के हमले से बड़ा नुकसान हुआ है। यानी रूस के ऊर्जा क्षेत्र पर चौतरफा दबाव है।
अब ऊर्जा कंपनियों से कर्मचारियों की भर्ती सेना में करने के बाद रूस के तेल-गैस सेक्टर पर और ज्यादा दबाव बढ़ने की आशंका है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कर्मचारियों की कमी के चलते आने वाले दिनों में रूस के साइबेरिया में मौजूद प्राकृतिक गैस के कुओं को कुछ दिनों में ही बंद करना पड़ेगा। इसके चलते रूस की उत्पादन क्षमता घटना लगभग तय है। इसके अलावा जो देश इस वक्त रूस से तेल-गैस खरीद भी रहे हैं, उन्हें भी इसके आयात के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। नतीजतन पहले से आर्थिक दबाव झेल रहे रूस को ऊर्जा क्षेत्र से होने वाले राजस्व में भारी घाटा उठाना पड़ेगा।
बाकी दुनिया पर रूस के इस कदम के क्या प्रभाव होंगे?
अमेरिका-यूरोप समेत पश्चिमी देशों ने रूस से होने वाले आम उत्पादों से लेकर उसके तेल क्षेत्र तक पर प्रतिबंध लगाए हैं। अमेरिका ने सबसे पहले रूस से तेल-कोयले का आयात को बंद कर दिया था। इसके बाद यूरोप के कुछ देशों ने रूसी तेल और कोयले पर प्रतिबंध लगाया। कुछ और पश्चिमी देशों ने भी चरणबद्ध तरीके से रूसी तेल-गैस के आयात को बंद करने के लिए कदम उठाए हैं। एक आंकड़े के मुताबिक, यूक्रेन पर हमले से पहले यूरोपीय देश रूस से 14 लाख बैरल तेल प्रतिदिन आयात करता था। यह आंकड़ा अब 10 लाख बैरल प्रतिदिन से नीचे आ चुका है। बताया जाता है कि पांच दिसंबर 2022 तक पश्चिमी देश इन प्रतिबंधों को और बढ़ा देंगे।
यानी पश्चिमी देशों के लिए रूस की ओर से तेल कंपनियों से सैन्य भर्ती करने का असर ज्यादा प्रभावी नहीं होगा। लेकिन कई अन्य देशों पर रूस के इस कदम का विपरीत असर देखने को मिलेगा। दरअसल, तेल निर्यातक देशों के गठबंधन ओपेक ने पहले ही तेल उत्पादन को सीमित किया है, जिसकी वजह से दुनियाभर में कच्चे तेल की कीमतें जबरदस्त रूप से बढ़ी हैं। अब अगर रूस की तरफ से भी तेल-गैस का उत्पादन कम कर दिया जाता है तो इससे कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आएगा। इसका असर रूस के मित्र देशों पर भी पड़ेगा।
अमेरिका-यूरोप समेत पश्चिमी देशों ने रूस से होने वाले आम उत्पादों से लेकर उसके तेल क्षेत्र तक पर प्रतिबंध लगाए हैं। अमेरिका ने सबसे पहले रूस से तेल-कोयले का आयात को बंद कर दिया था। इसके बाद यूरोप के कुछ देशों ने रूसी तेल और कोयले पर प्रतिबंध लगाया। कुछ और पश्चिमी देशों ने भी चरणबद्ध तरीके से रूसी तेल-गैस के आयात को बंद करने के लिए कदम उठाए हैं। एक आंकड़े के मुताबिक, यूक्रेन पर हमले से पहले यूरोपीय देश रूस से 14 लाख बैरल तेल प्रतिदिन आयात करता था। यह आंकड़ा अब 10 लाख बैरल प्रतिदिन से नीचे आ चुका है। बताया जाता है कि पांच दिसंबर 2022 तक पश्चिमी देश इन प्रतिबंधों को और बढ़ा देंगे।
यानी पश्चिमी देशों के लिए रूस की ओर से तेल कंपनियों से सैन्य भर्ती करने का असर ज्यादा प्रभावी नहीं होगा। लेकिन कई अन्य देशों पर रूस के इस कदम का विपरीत असर देखने को मिलेगा। दरअसल, तेल निर्यातक देशों के गठबंधन ओपेक ने पहले ही तेल उत्पादन को सीमित किया है, जिसकी वजह से दुनियाभर में कच्चे तेल की कीमतें जबरदस्त रूप से बढ़ी हैं। अब अगर रूस की तरफ से भी तेल-गैस का उत्पादन कम कर दिया जाता है तो इससे कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आएगा। इसका असर रूस के मित्र देशों पर भी पड़ेगा।
किन-किन देशों पर सबसे ज्यादा असर?
इस वक्त रूस की ओर से तेल उत्पादन कम होने असर एशियाई देशों को ही होगा। मौजूदा समय में जो देश रूस से तेल-गैस आयात कर रहे हैं, उनमें यूरोप के कई देश शामिल हैं। लेकिन उनकी तरफ से आयात घटाए जाने के बीच एशियाई देश रूस के मददगार बन कर सामने आए हैं। खासकर भारत और चीन ने बीते महीनों में रूस से तेल का आयात काफी बढ़ा लिया है। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब ने तेल के भंडार होने के बावजूद रूस से तेल आयात जारी रखा है। यूरोपीय देश फ्रांस और बेल्जियम भी फिलहाल सस्ती दरों पर उपलब्ध रूसी तेल-गैस से मुंह नहीं मोड़ पाए हैं। दूसरी तरफ आर्थिक संकट से जूझ रहे तुर्की और श्रीलंका ने भी रूस से तेल आयात बढ़ाया है।
इस वक्त रूस की ओर से तेल उत्पादन कम होने असर एशियाई देशों को ही होगा। मौजूदा समय में जो देश रूस से तेल-गैस आयात कर रहे हैं, उनमें यूरोप के कई देश शामिल हैं। लेकिन उनकी तरफ से आयात घटाए जाने के बीच एशियाई देश रूस के मददगार बन कर सामने आए हैं। खासकर भारत और चीन ने बीते महीनों में रूस से तेल का आयात काफी बढ़ा लिया है। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब ने तेल के भंडार होने के बावजूद रूस से तेल आयात जारी रखा है। यूरोपीय देश फ्रांस और बेल्जियम भी फिलहाल सस्ती दरों पर उपलब्ध रूसी तेल-गैस से मुंह नहीं मोड़ पाए हैं। दूसरी तरफ आर्थिक संकट से जूझ रहे तुर्की और श्रीलंका ने भी रूस से तेल आयात बढ़ाया है।
रूस के तेल उत्पादन कम होने से भारत पर क्या प्रभाव होगा?
आंकड़ों से समझा जाए तो इस वक्त भारत और चीन जितना तेल रूस से आयात कर रहे हैं, वह यूरोप के 27 सदस्य देशों से भी ज्यादा है। समुद्री मार्ग के जरिए होने वाले रूस के लगभग आधे तेल निर्यात भारत और चीन ही पहुंचते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से तो खास तौर पर भारत ने रूसी तेल के आयात को बढ़ाया है। अगस्त तक रूस से भारत का तेल आयात अपने उच्चतम स्तर पर था। हालांकि, अगस्त-सितंबर में आयात का आंकड़ा नीचे आया है। इसके बावजूद भारत इस वक्त रूस से प्रतिदिन 10 लाख बैरल से ज्यादा तेल खरीद रहा है।
आंकड़ों से समझा जाए तो इस वक्त भारत और चीन जितना तेल रूस से आयात कर रहे हैं, वह यूरोप के 27 सदस्य देशों से भी ज्यादा है। समुद्री मार्ग के जरिए होने वाले रूस के लगभग आधे तेल निर्यात भारत और चीन ही पहुंचते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से तो खास तौर पर भारत ने रूसी तेल के आयात को बढ़ाया है। अगस्त तक रूस से भारत का तेल आयात अपने उच्चतम स्तर पर था। हालांकि, अगस्त-सितंबर में आयात का आंकड़ा नीचे आया है। इसके बावजूद भारत इस वक्त रूस से प्रतिदिन 10 लाख बैरल से ज्यादा तेल खरीद रहा है।
बताया जाता है कि भारत को रूस से कच्चा तेल औसत दामों से 20-30 डॉलर प्रति बैरल तक सस्ता मिल रह है। इसके जरिए भारत सरकार तेल के बढ़ते दामों और महंगाई के दोहरे असर से जनता को बचाने में कामयाब हुई है। खुद भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रूस से तेल आयात के फैसले का बचाव करते हुए अमेरिका में कहा है कि कच्चे तेल के बढ़ते दामों ने भारत की कमर तोड़ दी है। इस बीच रूस में तेल कंपनियों के कर्मचारियों की कमी के बाद उत्पादन में अगर गिरावट आती है तो यह भारत के लिए मुश्किल वक्त की शुरुआत होगी।