यूक्रेन संकट से नई चुनौती: पाकिस्तान के सामने है बेहद मुश्किल डगर, अमेरिका समर्थक देशों के राजदूतों ने दिखाए कड़े तेवर
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विस्तार
यूक्रेन संकट पर पाकिस्तान ने बीच का रास्ता अपनाया है। उसने यूक्रेन की प्रादेशिक अखंडता का समर्थन किया है, लेकिन उसने रूस के हमले की निंदा नहीं की है। पाकिस्तान ने अपना यही रुख संयुक्त राष्ट्र महासभा की विशेष बैठक में भी दोहराया। जिस रोज रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, उस दिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान मास्को में थे। उन्होंने वहां यह बयान दे दिया था कि वे एक रोमांचक मौके पर रूस आए हैं।
विदेशी राजदूतों ने बढ़ाया दबाव
अब पाकिस्तान के इस रुख के कूटनीतिक परिणाम सामने आ रहे हैं। अब यह साफ हुआ है कि पाकिस्तान के इस रुख से पश्चिमी देश काफी नाराज हैं। मंगलवार को इस संबंध में एक असामान्य घटना हुई। इस्लामाबाद स्थित कई अमेरिका समर्थक देशों के राजदूतों ने एक साझा बयान जारी कर पाकिस्तान से दो टूक कहा कि वह रूसी हमले की निंदा करे।
कूटनीति विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि विदेशी राजदूत इस तरह साझा बयान जारी करें, यह असाधारण घटना है। आम तौर पर दुनिया में ऐसा कहीं देखने को नहीं मिलता। राजदूतों की ऐसी गतिविधियों को आम तौर पर संबंधित देश के अंदरूनी मामले में हस्तक्षेप समझा जाता है। विशेषज्ञों ने इस तरफ भी ध्यान खींचा है कि यूक्रेन पर हमले के मामले में पाकिस्तान ने जो रुख लिया है, वैसा ही रुख भारत, चीन और यूएई का भी है। लेकिन इन देशों के राजदूतों ने वहां ऐसा बयान जारी नहीं किया।
विदेशी राजदूतों ने बयान संयुक्त राष्ट्र महासभा में रूस की निंदा के लिए लाए गए प्रस्ताव पर चर्चा शुरू होने से ठीक पहले जारी किया। उनके बयान में कहा गया कि महासभा में पेश प्रस्ताव में यूक्रेन की संप्रभुता, स्वतंत्रता, एकता और प्रादेशिक अखंडता का समर्थन किया गया है। उसमें रूस से कहा गया है कि वह तुरंत यूक्रेन से अपनी सेना वापस बुलाए। राजदूतों ने कहा- ‘अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अवश्य ही एकजुट होकर नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की रक्षा करनी चाहिए।’
स्वतंत्र विदेश नीति पर पाक सरकार
इस बयान पर यूरोपियन यूनियन में शामिल देशों के साथ-साथ जापान, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के राजदूतों ने भी दस्तखत किए। पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस वक्तव्य के जरिए अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों ने पाकिस्तान को दो टूक चेतावनी दी है। इसका साफ मतलब यह है कि रूस के प्रति नरम रुख अपनाने की नीति जारी रखने पर पाकिस्तान भी पश्चिमी देशों के निशाने पर आ सकता है। जानकारों के मुताबिक पाकिस्तान के रूस के प्रति नरम रुख के पीछे असल वजह चीन से उसकी निकटता है। यूक्रेन विवाद में चीन रूस का समर्थन कर रहा है। ऐसे में पाकिस्तान के लिए अलग रुख अपनाना मुश्किल हो गया है।
जबकि पाकिस्तान सरकार का कहना है कि वह स्वतंत्र विदेश नीति पर चल रही है। उसने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में उसने वैसा ही रुख अपनाया, जो भारत, अर्मीनिया, गैबॉन, कैमरून, कजाखस्तान, मॉरितिनिया, नामीबिया, सेनेगल, सोमालिया, सूडान, संयुक्त अरब अमीरात और उज्बेकिस्तान ने अपनाया। इन तमाम देशों ने रूस विरोधी प्रस्ताव पर मतदान से खुद को अलग कर लिया। कई लैटिन अमेरिकी देशों ने भी ऐसा ही रुख अपनाया है।