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यूक्रेन संकट: बढ़ते विवाद के बीच निशाने पर क्यों आ गया है रशिया टुडे?

Thu, 24 Feb 2022 05:38 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 24 Feb 2022 05:38 PM IST
सार

पर्यवेक्षकों का कहना है कि आरटी के खिलाफ पश्चिमी देशों में शिकायत लंबे समय से गहरा रही है। यहां आम शिकायत बनी है कि आरटी पश्चिमी समाजों के अंतर्विरोधों को खूब अहमियत देकर प्रसारित करता है। इससे वह सामाजिक विभाजनों को बढ़ाने में सफल रहा है। पिछले साल जर्मनी में हुए आम चुनाव के ये तथ्य सामने आया कि इंटरनेट पर जिस समाचार माध्यम के वीडियो क्लिप सबसे ज्यादा देखे गए, वह आरटी के ही थे...

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Russia Ukraine Crisis: Margarita Simonyan, editor-in-chief of Russia Today also under sanctions by the European Union
रशिया टुडे - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

यूक्रेन में गहराते संकट के बीच यूरोपियन यूनियन (ईयू) ने जिन व्यक्तियों पर प्रतिबंध लगाने का एलान किया है, उनमें रूस के टीवी चैनल रशिया टुडे (आरटी) की प्रधान संपादक मार्गरिटा सिमॉनयान भी शामिल हैं। उधर ब्रिटेन में भी इस चैनल पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठी है। ये मांग वहां की संसद में उठी। उसके बाद प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने एलान किया कि पाबंदी की संभावना का पता लगाने के लिए जांच शुरू कर दी गई है। कुछ ही समय पहले जर्मनी में सरकार के आदेश पर इस चैनल के यूट्यूब चैनल पर रोक लगा दी गई थी।

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ब्रिटेन की संसद में विपक्ष के नेता केयर स्टार्मर आरटी को रूस का प्रोपेगैंडा चैनल बताया और सवाल उठाया कि सरकार इस पर रोक क्यों नहीं लगा रही है। इस पर प्रधानमंत्री जॉनसन ने कहा कि इस बारे में ऑफकॉम (ऑफिस ऑफ कम्युनिकेशंस) ने जांच शुरू कर दी है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि ब्रिटेन में इस बारे में फैसला विशेषज्ञों की समिति करती है, रूस की तरह राजनेता नहीं।  

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रूस का पक्ष मजबूती से रख रहा है रशिया टुडे

पर्यवेक्षकों का कहना है कि आरटी के खिलाफ पश्चिमी देशों में शिकायत लंबे समय से गहरा रही है। यहां आम शिकायत बनी है कि आरटी पश्चिमी समाजों के अंतर्विरोधों को खूब अहमियत देकर प्रसारित करता है। इससे वह सामाजिक विभाजनों को बढ़ाने में सफल रहा है। पिछले साल जर्मनी में हुए आम चुनाव के ये तथ्य सामने आया कि इंटरनेट पर जिस समाचार माध्यम के वीडियो क्लिप सबसे ज्यादा देखे गए, वह आरटी के ही थे। तब आरोप लगा कि आरटी ने वैक्सीन और लॉकडाउन विरोधी आंदोलनों को खूब महत्त्व देकर दिखाया है। वह धुर दक्षिणपंथी और धुर वामपंथी विचारों को भी काफी जगह देता है।

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यूक्रेन को लेकर चल रहे विवाद में ये धारणा बनी है कि आरटी मजबूती से रूस का पक्ष रख रहा है, जबकि पश्चिमी देशों में रूस विरोधी भावनाएं हैं। इसी वजह से वहां आरटी के खिलाफ भी माहौल बन गया है। लेकिन ब्रिटेन में आरटी पर प्रतिबंध लगाने की मांग का कई हलकों से विरोध भी हुआ है। पूर्व ब्रिटिश राजनयिक पीटर फोर्ड और लंदन के पूर्व मेयर केन लिविंग्स्टोन ने आरटी चैनल के अपनी समझ के मुताबिक खबर और विश्लेषण देने के अधिकार का समर्थन किया है।

प्रतिबंध की चर्चा परेशान करने वाली

सीरिया और बहरीन में ब्रिटेन के राजदूत रह चुके फोर्ड ने कहा- ‘प्रतिबंध की चर्चा परेशान करने वाली है। ये सारा प्रकरण ही हास्यास्पद है।’ उन्होंने ने आरोप लगाया है कि ऑफकॉम ब्रिटिश सरकार के इशारे पर काम कर रहा है, इसलिए एक वास्तविक निर्णायक की भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं है। फोर्ड ने कहा कि ब्रिटिश सरकार जो चाहती है, उसके लिए वह ऑफकॉम का इस्तेमाल कर रही है। लिविंगस्टोन ने तो यहां तक कहा है कि वे रोज आरटी देखते हैं और कभी उसे प्रोपेगैंडा में शामिल नहीं पाया। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके उलट ब्रिटिश मीडिया ब्रिटेन के लोगों को सच नहीं बता रहा है।



ब्रिटेन में पिछले चीन के टीवी चैनल सीजीटीएन पर रोक लगा दी गई थी। तब भी अभिव्यक्ति की आजादी के प्रति ब्रिटेन की निष्ठा को लेकर सवाल उठाए गए थे। कहा गया था कि ब्रिटेन में इस आजादी का सम्मान तभी तक होता है, जब तक उसके मन-माफिक बात की जाती है।

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