अनुसंधान: नए स्वरूपों को रोकने के लिए पड़ सकती है बूस्टर डोज की जरूरत
- अमेरिका में बने फाइजर, मॉडर्ना और जॉनसन एंड जॉनसन के टीके कम से कम एक साल तक बचाव कर सकते हैं
- कोरोना के नए स्वरूपों के खिलाफ वैक्सीन जरूरतों में बदलाव की बात भी उठ रही है
- यहां जानिए, टीकों का प्रभाव, कोरोना के स्वरूपों से बचाव और नए टीकों की जरूरत से जुड़े सवाल-जवाब
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दुनियाभर में कोरोना महामारी की रोकथाम के लिए टीकाकरण ने रफ्तार तो पकड़ ली है लेकिन अब इन टीकों से बनने वाली एंटीबॉडी के ठहराव को लेकर सवाल उठने लगे हैं। इन दिनों लोग वैज्ञानिकों से पूछ रहे हैं कि वह दोनों टीके लगवाकर क्या हमेशा के लिए संक्रमण से निश्चिंत रह सकते हैं या उन्हें फिर बूस्टर डोज की जरूरत पड़ेगी। लेकिन लोगों को फिलहाल इसका कोई जवाब नहीं मिल पा रहा है।
विभिन्न तकनीकों से बने टीकों के प्रभाव में फर्क
हालांकि, कई शोधकर्ताओं का अनुमान है कि अमेरिका में बने फाइजर, मॉडर्ना और जॉनसन एंड जॉनसन के टीके कम से कम एक साल तक बचाव कर सकते हैं, पर इस बारे में सटीक तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। इस बीच, कोरोना के नए स्वरूपों के खिलाफ वैक्सीन जरूरतों में बदलाव की बात भी उठ रही है।
यहां जानिए, टीकों का प्रभाव, कोरोना के स्वरूपों से बचाव और नए टीकों की जरूरत से जुड़े सवाल-जवाब...
फ्लू का टीका सालाना लगवाना पड़ता है। खसरा की बचपन में दो खुराक जीवनभर सुरक्षा प्रदान करती हैं, क्यों?
विभिन्न रोगाणु हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को अलग-अलग तरह से प्रभावित करते हैं। खसरा जैसे रोगों में एक दफा बीमार पड़ने भर से दोबारा संक्रमण से ताउम्र सुरक्षा मिल जाती है। पर कुछ अन्य रोगाणुओं के खिलाफ साल भर में प्रतिरक्षा कमजोर पड़ने लगती है।
खसरा के टीके जीवनभर के लिए पर्याप्त हैं, तो टिटनेस का इंजेक्शन हर साल लगवाना पड़ जाता है। कुछ रोगों का वायरस हर साल स्वरूप बदल लेता है। ऐसे में हमें उसका बूस्टर डोज चाहिए होता है, जो प्रतिरक्षा सुधार सके। फ्लू वायरस इसी श्रेणी में आता है, जिसकी हर साल वैक्सीन लगवानी पड़ती है।
मौजूदा कोरोना टीकों से हमें कितनी लंबी सुरक्षा मिलेगी?
लोगों को कुछ माह पहले ही टीके लगने शुरू हुए हैं। ऐसे में इसे बताने के लिए फिलहाल ज्यादा साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के डॉ. क्रस्टीन लाइक का कहना है, इन टीकों के एक साल बाद प्रतिरक्षा की स्थिति क्या रहती है, इसे लेकर अभी हम ज्यादा कुछ नहीं जानते, लेकिन शुरुआती रुझान उत्साहजनक हैं।
- शोधकर्ताओं ने ट्रायल के दौरान जब वॉलेंटियरों के नमूनों में एंटीबॉडी का स्तर जांचा तो इसमें धीमी गिरावट दर्ज हुई थी। इसके चलते संभव है कि टीकों से लंबे समय तक सुरक्षा मिले।
- कुछ जानकारों का कहना है कि जो लोग पहले संक्रमित हो चुके और उन्होंने टीका भी लगवा लिया है तो हो सकता है, उनमें ज्यादा समय तक एंटीबॉडी टिकी रहें
क्या कुछ कोरोना वैक्सीनों से अन्य के मुकाबले ज्यादा लंबी प्रतिरक्षा मिल सकती है?
वैज्ञानिकों ने पहले पाया है कि विभिन्न तकनीकों से बने टीकों का प्रभाव अलग-अलग हो सकता है। अभी एमआरएनए तकनीक से बनी फाइजर और मॉडर्ना की वैक्सीनें सबसे प्रभावी मानी जा रही हैं। वहीं, सिनोफार्मा और भारत बायोटेक के निष्क्त्रिस्य (इनएक्टिवेटेड) वायरस से बने टीके थोड़े कम प्रभावी मिले हैं।
- यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया के प्रतिरक्षाविद स्कॉट हेंसली के मुताबिक, इसके पीछे कोई साफ कारण अभी सामने नहीं आया है। संभव है कि कम प्रभावी कोरोना टीकों से मिलने वाली सुरक्षा जल्दी कमजोर पड़ जाएगी। सिनोफॉर्मा के टीकों में ऐसा देखने को भी मिला है।
यह कब पता लगेगा कि टीके शरीर में अपना प्रभाव खोने लगे हैं?
वैज्ञानिक इसके लिए जैविक पैमाने ढूंढ रहे हैं। यह संभव है कि टीकों का प्रभाव मापने को लेकर एंटीबॉडी का एक निश्चित स्तर निर्धारित किया जाए। जब किसी के रक्त में इस स्तर से ज्यादा एंटीबॉडी मिले तो इसका मतलब होगा कि आप सुरक्षित हैं। स्तर से कम एंटीबॉडी होने पर संक्रमण का जोखिम माना जाए।
- कुछ प्राथमिक अध्ययनों से पता चला है कि शरीर में कोरोना टीकों का प्रभाव पता करने के लिए ऐसे कुछ जैविक चिह्न मौजूद हैं। इनकी तलाश के लिए आगे शोध जारी है।
टीकों के बाद कोरोना के नए स्वरूपों से कितने सुरक्षित?
हो सकता है कि नए-नए स्वरूपों को रोकने के लिए हमें बूस्टर डोज की जरूरत पड़े। लेकिन, इसे लेकर स्थिति ज्यादा साफ नहीं है। कुछ म्यूटेशन टीकों को बेअसर कर सकते हैं। पिछले माह कतर में फाइजर वैक्सीन को लेकर एक शोध प्रकाशित हुआ था।
इसमें उन 2.50 लाख लोगों को शामिल किया गया, जिन्हें दिसंबर 2020 से इस साल मार्च तक फाइजर के टीके लगाए गए थे। नतीजों में यह वैक्सीन कोरोना के मूल स्वरूप पर 95 फीसदी प्रभावी पाई गई। पर इसके अल्फा स्वरूप पर इसका प्रभाव घटकर 89.5 फीसदी हो गया।
- दक्षिण अफ्रीका में मिले बीटा स्वरूप ने तो टीके का असर और कम करके 75 फीसदी कर दिया। हालांकि, यह टीका गंभीर बीमारी और मौत से बचाने में सौ फीसदी कारगर रहा।
..तो क्या कोरोना के स्वरूप विशेष के लिए खास टीके की जरूरत पड़ेगी?
इस पर अभी ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि वायरस के मूल स्वरूप के खिलाफ बनी उच्च प्रतिरक्षा दूसरे स्वरूपों से भी पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करेगी। लेकिन यह संभव है कि किसी स्वरूप विशेष के लिए बना टीका ज्यादा प्रभावी रहे। इस दिशा में फाइजर ने ट्रायल भी शुरू कर दिए हैं।