जलवायु सम्मेलन: धन देने के अलावा बाकी सारी बातें कर रहे हैं धनी देश!
धनी देशों ने यह माना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए गरीब देशों को वित्तीय मदद मिलनी चाहिए। लेकिन जानकारों का कहना है कि इस बारे में किए वादों को उन्होंने नहीं निभाया है। 2009 में उन्होंने 2020 तक हर साल 100 अरब डॉलर देने का वादा किया था। लेकिन उन्होंने ये वादा उन्होंने नहीं निभाया...
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जलवायु परिवर्तन पर यहां चल रहे संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (कॉप-26) में अब गरीब देश सीधे धनी देशों को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़, जंगलों में आग, सूखा, और समुद्र के जल स्तर में बढ़ोतरी की समस्याएं गंभीर हो गई हैं। गरीब देशों पर इनकी ज्यादा मार पड़ रही है। इन देशों ने यहां ये मांग जोरदार ढंग से उठाई है कि धनी देश उन्हें हो रहे नुकसान के बदले मुआवजा दें।
अमीर देशों में उठाया फायदा, गरीब देशों को नुकसान
गरीब और विकासशील देशों की दलील है कि पश्चिमी देश जलवायु को भारी नुकसान पहुंचाते हुए धनी हुए। उसकी कीमत अब दुनिया में सबको बराबर चुकानी पड़ रही है। इसलिए यह धनी देशों की जिम्मेदारी है कि उनके विकास की वजह से गरीब देशों को जो नुकसान हो रहा है, उसकी वे भरपाई करें।
कॉप-26 के अध्यक्ष आलोक शर्मा ने यहां संवाददाताओं से कहा- ‘अगर आपने यहां चल रही प्रक्रियाओं पर ध्यान दिया है, तो आपको मालूम होगा कि नुकसान का मुद्दा हमेशा से देशों के बीच गोलबंदी करने वाला रहा है। लेकिन यहां माहौल कुछ बेहतर हुआ है। इस बात को व्यावहारिक रूप में स्वीकार किया जा रहा है कि जिस तरह से जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बढ़ रहा है, उसे देखते हुए कदम उठाने की जरूरत है।’
अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भी ये बात मानी है कि जलवायु परिवर्तन से नुकसान को सीमित रखने के लिए संसाधनों में वृद्धि करना जरूरी है। ईयू के धनी देशों ने दो साल पहले बने सांतियागो नेटवर्क को मजबूत करने की मांग का समर्थन किया है। ये नेटवर्क गरीब देशों को तकनीकी सहायता देने के लिए बनाया गया था, ताकि वे कार्बन गैसों के उत्सर्जन को बेहतर ढंग घटा सकेँ।
लेकिन गरीब देशों की शिकायत है कि बड़ी बातें करने के बावजूद धनी देशों ने असल में गरीब देशों की मदद के लिए कोई महत्त्वपूर्ण घोषणा नही की है। उन्होंने धन देने की इच्छा नहीं दिखाई है। केन्या स्थित थिंक टैंक पॉवर शिफ्ट अफ्रीका के निदेशक मोहम्मद एडॉव ने वेबसाइट पॉलिटिको.ईयू से कहा- ‘नुकसान को लेकर घिसी-पिटी बातें खूब कही गई हैं। लेकिन धनी देश जिस बात पर चर्चा नहीं करना चाहते, वह वित्तीय मदद है।’
धनी देशों ने नहीं निभाया वादा
पर्यवेक्षकों के मुताबिक सांतियागो नेटवर्क को मजबूत करने के लिए जरूरी है कि उसे अधिक धन और कर्मचारी मुहैया कराए जाएं। ये कैसे होगा, इस पर ग्लासगो में चर्चा नहीं हुई है। धनी देशों ने अलग से क्षति कोष बनाने या उसके लिए धन मुहैया कराने की बातों से गुरेज ही किया है।
धनी देशों ने यह माना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए गरीब देशों को वित्तीय मदद मिलनी चाहिए। लेकिन जानकारों का कहना है कि इस बारे में किए वादों को उन्होंने नहीं निभाया है। 2009 में उन्होंने 2020 तक हर साल 100 अरब डॉलर देने का वादा किया था। लेकिन उन्होंने ये वादा उन्होंने नहीं निभाया। ग्लासगो सम्मेलन में यह कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए जरूरी नीतियां विकासशील देश अपना सकें, इसके लिए उन्हें हर साल 70 अरब डॉलर की जरूरत होगी। ये लेकिन ये रकम उपलब्ध कैसे होगी, इस पर यहां कोई ठोस बात नहीं की गई है।