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दिलचस्प मोड़ पर नेपाल की सियासत, एक बार फिर टूटने की कगार पर पहुंची कम्युनिस्ट पार्टी

Sun, 05 Jul 2020 12:21 AM IST
Rajeev Rai वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू Published by: Rajeev Rai Updated Sun, 05 Jul 2020 12:21 AM IST
सार

  • दिलचस्प मोड़ पर नेपाल की सियासत, ओली फिर मिले राष्ट्रपति भंडारी से
  • अपने तमाम मंत्रियों को बुलाया, आगे की रणनीति समझाई, फिर शीतल निवास गए
  • प्रचंड के साथ बातचीत बेनतीजा, समझौते की कोई उम्मीद नहीं, रविवार को बना सकते हैं नई पार्टी
  • एक बार फिर टूटने की कगार पर पहुंची नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी

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Politics of Nepal at an interesting point, Communist Party on the verge of breaking once again
Nepal Parliament - फोटो : Social Media

विस्तार

नेपाल में सियासी सरगर्मियां चरम पर हैं। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और उनके ‘प्रचंड’ विरोधी पुष्प कमल दहल के बीच तीन घंटे हुई बातचीत आखिरकार बेनतीजा रही। इसके बाद ओली ने अपने सभी कैबिनेट मंत्रियों को पहले अपने निवास बालूवाटार बुलाया फिर राष्ट्रपति बिद्यादेवी भंडारी से मिलने चले गए।

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प्रचंड जहां ओली के पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री पद से इस्तीफे पर अड़े हैं, वहीं ओली किसी भी कीमत पर कुर्सी बचाने की जोड़-तोड़ में जुटे हैं। प्रचंड की खीझ उस वक्त साफ नजर आई जब पत्रकारों ने उनसे ओली के साथ हुई इतनी लंबी बैठक के बारे में पूछा। प्रचंड ने जहां कुछ भी बोलने से मना कर दिया, वहीं ओली ने ये इशारा जरूर किया कि वो इस्तीफा नहीं देंगे, भले ही पार्टी टूट जाए।
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माना ये जा रहा है कि ओली रष्ट्रपति के सामने अपना शक्ति प्रदर्शन करने गए हैं और ये बताना चाहते हैं कि उनके पास सरकार चलाने के लिए पूरी संख्या है, इसलिए वो इस्तीफा नहीं देंगे। राष्ट्रपति चाहें तो शक्ति परीक्षण करवा लें। दूसरी तरफ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की स्थाई समिति की बैठक रद्द कर दी गई और ज्यादातर सदस्य ओली के अगले कदम का इंतजार कर रहे हैं।

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जानकारों का मानना है कि ओली ने अपनी सरकार बचाने के लिए पूरी रणनीति तैयार कर रखी है और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी किसी भी वक्त टूट सकती है। मई 2018 में ही दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों का एकीकरण हुआ था और तब कहा ये जा रहा था कि नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी देश की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी है और इसकी राजनीतिक ताकत के आगे लंबे वक्त तक कोई राजनीतिक पार्टी खड़ी नहीं हो सकती। 

नेपाल में लोकतंत्र की बहाली के बाद से ही प्रचंड की माओवादी पार्टी और ओली की सीपीएन-यूएमएल अपनी अलग-अलग लड़ाइयां लड़ती रहीं, लेकिन वैचारिक विरोध की पतली लकीर तीन साल पहले चुनाव के दौरान टूट गई और दोनों पार्टियों ने मिलकर चुनाव लड़ा। जबरदस्त जीत हुई और दोनों ने मिलकर 174 सीटें जीत लीं। 

ओली और प्रचंड पिछले आठ महीनों से इस कोशिश में लगे थे कि दोनों पार्टियों का एकीकरण हो जाए और फिर ये पार्टी नेपाल की सबसे बड़ी पार्टी बन जाए। चुनाव से पहले इस एकीकरण की कोशिश में अहम भूमिका निभाई थी बामदेव गौतम ने। लेकिन गौतम चुनाव हार गए और ओली प्रधानमंत्री बन गए।

ऐसा हुआ भी और मई 2018 में ओली की सीपीएन-यूएमएल और प्रचंड की माओइस्ट सेंटर ने मिलकर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी बनाई, इसका नया संविधान और नई समितियां बनाईं। ये समझौता हुआ कि ओली और प्रचंड बारी-बारी से सरकार चलाएंगे, साथ ही पार्टी के अध्यक्ष दोनों ही रहेंगे। ओली अध्यक्ष और प्रचंड सह अध्यक्ष। लगा था कि ये प्रयोग लंबे समय तक चलेगा। लेकिन सत्ता की जंग और महात्वाकांक्षाओं ने दो साल में ही असलियत सबके सामने ला दी।

दरअसल सीपीएन-यूएमएल के अहम नेताओं में माधव कुमार नेपाल भी थे और गौतम भी। लेकिन चुनाव के बाद गौतम और नेपाल को ओली ने दरकिनार कर दिया और उन्हें हाशिये पर धकेल दिया। बाद में गौतम और नेपाल प्रचंड की तरफ आ गए और ओली के खिलाफ मुहिम चलने लगी।

ओली भी पार्टी में बगैर प्रचंड को भरोसे में लिए फैसले लेने लगे और थोपने लगे, वहीं प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए भी उन्होंने इन नेताओं से अलग अपनी एक कोटरी बना ली। ऐसे में उनके खिलाफ पार्टी में आवाज मुखर होती गई।

बाद में कोविड-19 के दौरान उन पर चीन के साथ राहत सामग्री को लेकर हुई डील में घपले का आरोप भी लगा। कोरोना के दौरान भी नेपाली जनता के बारे में न सोचने और इसे संवेदनशील तरीके से न लेने का आरोप लगा।

जब इसे लेकर उन पर इस्तीफे का दबाव बना तो उन्होंने अपना भारत विरोधी चेहरा दिखाया और मई में नेपाल के नए नक्शे को मंजूरी देकर राष्ट्रवाद की सियासी चाल चल दी। फिर उन्होंने सबसे गंभीर आरोप हाल ही में ये लगा दिया कि भारत उनकी सरकार गिराने की साजिश रच रहा है।

लेकिन ओली अपने खेल में अब भी अपने विरोधियों से भारी पड़ रहे हैं और उन्हें लग रहा है कि राष्ट्रपति भंडारी उनकी सरकार बचाने में उनका साथ देंगी, क्योंकि आखिरकार वो उनकी पार्टी की उपाध्यक्ष और असरदार नेता रही हैं, भले ही अब वो राष्ट्रपति बन चुकी हों।

उधर नेपाली कांग्रेस शुरू से ही प्रचंड की धुर विरोधी रही है और ये नहीं चाहती कि किसी भी तरह प्रचंड की सत्ता में वापसी हो, इसलिए वो ओली को बाहर से समर्थन देने को तैयार है।

जाहिर है, नेपाल की सियासत एक बार फिर दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है और वहां की कम्युनिस्ट पार्टी एक बार फिर टुकड़ों में बंटने को तैयार है। माना ये जा रहा है कि ओली रविवार तक कोई न कोई फैसला कर सकते हैं और नई पार्टी बनाने का एलान भी कर सकते हैं। जाहिर है वह भी कम्युनिस्टों का ही तीसरा धड़ा होगा।

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