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असल जिन्ना से कितना अलग है पाकिस्तान का 'नया जिन्ना'?
शुमाइला जाफ़री, बीबीसी संवाददाता
Updated Tue, 26 Dec 2017 07:48 PM IST
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मोहम्मद अली जिन्ना
- फोटो : BBC
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पाकिस्तान के लोगों के लिए 25 दिसंबर दोहरा महत्व रखता है। इस दिन जहां पाकिस्तान के ईसाई यीशु मसीह का तो वहीं देश अपने संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का जन्मदिन मनाता है।
यहां के लोग इन्हें कायदे-आजम यानी महान नेता कहकर बुलाते हैं। अन्य देशों की तरह पाकिस्तान में इस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है। यह अवकाश क्रिसमस के मौके पर नहीं बल्कि जिन्ना के जन्मदिन के अवसर पर दिया जाता है।
देश और सत्ता में बैठे दक्षिणपंथी यह नहीं चाहते हैं कि वो किसी ऐसे पर्व पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करें जिसका जुड़ाव पश्चिम देशों और गैर-मुस्लिम जड़ों से जुड़ा हो। जिन्ना के सम्मान में सार्वजनिक अवकाश घोषित करने को सही ठहराया जा सकता है। आज के पाकिस्तान की छवि के निर्धारण में धर्म का सबसे बड़ा योगदान है।
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लेकिन क्या यह सब जिन्ना के विचारों से मेल खाता है? क्या वे धर्म के सिद्धांतों पर आधारित धर्मशासित देश चाहते थे? और क्या वो एक ऐसा देश बनाना चाहते थे जहां हर तरह के आस्था में विश्वास रखने वाले लोगों को अपना सके?
और क्या वे पाकिस्तान को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाना चाहते थे?
इतिहासकार और टिप्पणीकार यासीर लतीफ हमदानी कहते हैं, "जिन्ना ने अपने 33 भाषणों में नागरिक वर्चस्व, लोकतंत्र और अल्पसंख्यकों के सामान अधिकार के महत्व का जिक्र किया था। उनका कहना था कि इस्लाम के सिद्धांत समानता पर आधारित हैं।"
वो आगे कहते हैं, "लेकिन अभी जो भी पाकिस्तान में हो रहा है वो जिन्ना के विचारों से मेल नहीं खाता है।"
यासीर हमदानी विरोधी पार्टी तहरीके लब्बैक के रसूल अल्लाह के फैजाबाद में हाल ही दिए धरने का जिक्र करते हुए कहते हैं कि यह जिन्ना की चाहतों के बिलकुल विपरीत था।
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यहां के लोग इन्हें कायदे-आजम यानी महान नेता कहकर बुलाते हैं। अन्य देशों की तरह पाकिस्तान में इस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है। यह अवकाश क्रिसमस के मौके पर नहीं बल्कि जिन्ना के जन्मदिन के अवसर पर दिया जाता है।
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देश और सत्ता में बैठे दक्षिणपंथी यह नहीं चाहते हैं कि वो किसी ऐसे पर्व पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करें जिसका जुड़ाव पश्चिम देशों और गैर-मुस्लिम जड़ों से जुड़ा हो। जिन्ना के सम्मान में सार्वजनिक अवकाश घोषित करने को सही ठहराया जा सकता है। आज के पाकिस्तान की छवि के निर्धारण में धर्म का सबसे बड़ा योगदान है।
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लेकिन क्या यह सब जिन्ना के विचारों से मेल खाता है? क्या वे धर्म के सिद्धांतों पर आधारित धर्मशासित देश चाहते थे? और क्या वो एक ऐसा देश बनाना चाहते थे जहां हर तरह के आस्था में विश्वास रखने वाले लोगों को अपना सके?
और क्या वे पाकिस्तान को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाना चाहते थे?
इतिहासकार और टिप्पणीकार यासीर लतीफ हमदानी कहते हैं, "जिन्ना ने अपने 33 भाषणों में नागरिक वर्चस्व, लोकतंत्र और अल्पसंख्यकों के सामान अधिकार के महत्व का जिक्र किया था। उनका कहना था कि इस्लाम के सिद्धांत समानता पर आधारित हैं।"
वो आगे कहते हैं, "लेकिन अभी जो भी पाकिस्तान में हो रहा है वो जिन्ना के विचारों से मेल नहीं खाता है।"
यासीर हमदानी विरोधी पार्टी तहरीके लब्बैक के रसूल अल्लाह के फैजाबाद में हाल ही दिए धरने का जिक्र करते हुए कहते हैं कि यह जिन्ना की चाहतों के बिलकुल विपरीत था।
'इतिहासकार जिन्ना की झूठी छवि गढ़ रहे'
झंडा लहराते पाकिस्तानी
- फोटो : BBC
जिन्ना की छवि
इतिहासकार मुबारक अली मानते हैं कि पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान के तथाकथित इतिहासकारों ने जानबूझकर जिन्ना की छवि एक संत और धार्मिक व्यक्ति के रूप में गढ़ी है। और यह खास मकसद से किया गया है ताकि दक्षिणपंथी देश में चल रहे धार्मिक परंपराओं को जिन्ना के सपने के करीब या प्रासंगिक बता सके।
"ये तथाकथित इतिहासकार झूठी छवि बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि जिन्ना धर्मनिरपेक्षता और भारतीय राष्ट्रवाद से पूरी तरह अलग हो गए और वो अंग्रेजों के खिलाफ नहीं थे।" मुबारक अली का मानना है कि यह "नया जिन्ना" पूरी तरह से असल जिन्ना से अलग हैं और अपना ऐतिहासिक महत्व को खो बैठे हैं।
विचारों का दफन
लेकिन असल जिन्ना कौन थे? मुबारक अली असल जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष सोच वाले व्यक्ति के रूप में देखते हैं। हालांकि वो इस बात से सहमत हैं कि मुहम्मद अली जिन्ना ने धर्म का इस्तेमाल राजनीति के लिए किया। लेकिन धर्म का इस्तेमाल इस तरह से नहीं किया कि यह राजनीति को अलग कर दे।
मुबारक अली कहते हैं, "उन्होंने यह स्पष्ट किया था कि पाकिस्तान धार्मिक देश नहीं बनेगा।"
यासीर लतीफ हमदानी भी इस बात से सहमत हैं कि "कायदे अजाम के विचार को तोड़ा मरोड़ा गया और उन सभी भद्दे विचारों को उनसे जोड़ा गया जो उनकी सोच के बिलकुल विपरीत हैं।"
यासीर का मानना है कि जिन्ना के पाकिस्तान का विचार 1974 में पहली बार दफनाया गया था, जब पाकिस्तान की संसद ने संविधान का संशोधन कर अहमदी को गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया था।
इतिहासकार मुबारक अली मानते हैं कि पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान के तथाकथित इतिहासकारों ने जानबूझकर जिन्ना की छवि एक संत और धार्मिक व्यक्ति के रूप में गढ़ी है। और यह खास मकसद से किया गया है ताकि दक्षिणपंथी देश में चल रहे धार्मिक परंपराओं को जिन्ना के सपने के करीब या प्रासंगिक बता सके।
"ये तथाकथित इतिहासकार झूठी छवि बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि जिन्ना धर्मनिरपेक्षता और भारतीय राष्ट्रवाद से पूरी तरह अलग हो गए और वो अंग्रेजों के खिलाफ नहीं थे।" मुबारक अली का मानना है कि यह "नया जिन्ना" पूरी तरह से असल जिन्ना से अलग हैं और अपना ऐतिहासिक महत्व को खो बैठे हैं।
विचारों का दफन
लेकिन असल जिन्ना कौन थे? मुबारक अली असल जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष सोच वाले व्यक्ति के रूप में देखते हैं। हालांकि वो इस बात से सहमत हैं कि मुहम्मद अली जिन्ना ने धर्म का इस्तेमाल राजनीति के लिए किया। लेकिन धर्म का इस्तेमाल इस तरह से नहीं किया कि यह राजनीति को अलग कर दे।
मुबारक अली कहते हैं, "उन्होंने यह स्पष्ट किया था कि पाकिस्तान धार्मिक देश नहीं बनेगा।"
यासीर लतीफ हमदानी भी इस बात से सहमत हैं कि "कायदे अजाम के विचार को तोड़ा मरोड़ा गया और उन सभी भद्दे विचारों को उनसे जोड़ा गया जो उनकी सोच के बिलकुल विपरीत हैं।"
यासीर का मानना है कि जिन्ना के पाकिस्तान का विचार 1974 में पहली बार दफनाया गया था, जब पाकिस्तान की संसद ने संविधान का संशोधन कर अहमदी को गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया था।
'जिन्ना धार्मिक व्यक्ति नहीं थे'
मोहम्मद अली जिन्ना
- फोटो : BBC
'जिन्ना धार्मिक व्यक्ति नहीं थे'
इसके बाद तानाशाह जनरल जिला उल हक ने दफनाया और अब जिस तरह सरकार ने फैजाबाद प्रदर्शनकारियों के साथ समझौता किया है उससे पाकिस्तान धार्मिक देश बन गया है, जो जिन्ना के सपनों के उलट है।
मुबारक अली मानते हैं कि जिन्ना व्यक्तित्व के धनी थे लेकिन देश के नेताओं ने जान बूझकर उनकी उपेक्षा करने का फैसला किया।
"वो अपने बातों पर खरे उतरने वाले व्यक्ति, ईमानदार, समर्पित और बेहतरीन पेशेवर वकील थे। उनकी न्याय निष्ठा पर बात करना राजनेताओं को नहीं भाता है। इसलिए उनकी धार्मिकता पर ये लोग बात करते हैं जबकि सच्चाई यह है कि वो एक धार्मिक व्यक्ति नहीं थे।"
विश्लेषक यासीर लतीफ हमदानी कहते हैं कि जिन्ना पाकिस्तान को आधुनिक लोकतांत्रिक देश बनाना चाहते थे। जहां हर नागरिक आजाद और समान हो चाहे वो किसी भी धर्म और विचारधारा को मानता हो।लेकिन पाकिस्तान का संविधान गैर-मुस्लिम के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बनने की इजाजत नहीं देता है। यासरी कहते हैं कि यह जिन्ना के पाकिस्तान में नहीं हो सकता था।
मुबारक अली महसूस करते हैं कि जिन्ना के पाकिस्तान में कई तरह की उलझन हैं। "जिन्ना ने कहा था कि पाकिस्तान एक धार्मिक देश नहीं हो सकता है लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया था कि यह धर्मनिरपेक्ष होगा या लोकतांत्रिक।"
जबकि यासीर लतीफ हमादानी के अनुसार पाकिस्तान के लिए जिन्ना की सोच स्पष्ट थी। देश के पहले कानून मंत्री हिंदू थे और उन्हें कायदे आजम ने नियुक्त किया था। यासीर कहते हैं, "बंटवारे के दो दिन पहले जिन्ना ने मूलभूत अधिकारों के लिए कमेटी का गठन किया था। इसके छह सदस्य हिंदू थे। सो वे बहुत स्पष्ट थे। उनके लिए समानता राज्य का मूल सिद्धांत था।"
इतिहासकार मुबारक अली मानते हैं इतिहास में जीने के बजाय पाकिस्तान को अपना रास्ता खुद बनाना चाहिए।
वो कहते हैं, "पाकिस्तान जिन्ना की संपत्ति नहीं है। यह देश इनके लोगों का है। हमलोगों को पाकिस्तान को आज की परिस्थितियों के मुताबिक बनाना चाहिए न कि जिन्ना की सोच के मुताबिक।"
लेकिन यासीर इस बात से पूरी तरह असहमत हैं। वो कहते हैं कि जिन्ना देश के संस्थापक हैं और वो पाकिस्तान के लिए प्रासंगिक हैं और रहेंगे।
इसके बाद तानाशाह जनरल जिला उल हक ने दफनाया और अब जिस तरह सरकार ने फैजाबाद प्रदर्शनकारियों के साथ समझौता किया है उससे पाकिस्तान धार्मिक देश बन गया है, जो जिन्ना के सपनों के उलट है।
मुबारक अली मानते हैं कि जिन्ना व्यक्तित्व के धनी थे लेकिन देश के नेताओं ने जान बूझकर उनकी उपेक्षा करने का फैसला किया।
"वो अपने बातों पर खरे उतरने वाले व्यक्ति, ईमानदार, समर्पित और बेहतरीन पेशेवर वकील थे। उनकी न्याय निष्ठा पर बात करना राजनेताओं को नहीं भाता है। इसलिए उनकी धार्मिकता पर ये लोग बात करते हैं जबकि सच्चाई यह है कि वो एक धार्मिक व्यक्ति नहीं थे।"
विश्लेषक यासीर लतीफ हमदानी कहते हैं कि जिन्ना पाकिस्तान को आधुनिक लोकतांत्रिक देश बनाना चाहते थे। जहां हर नागरिक आजाद और समान हो चाहे वो किसी भी धर्म और विचारधारा को मानता हो।लेकिन पाकिस्तान का संविधान गैर-मुस्लिम के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बनने की इजाजत नहीं देता है। यासरी कहते हैं कि यह जिन्ना के पाकिस्तान में नहीं हो सकता था।
मुबारक अली महसूस करते हैं कि जिन्ना के पाकिस्तान में कई तरह की उलझन हैं। "जिन्ना ने कहा था कि पाकिस्तान एक धार्मिक देश नहीं हो सकता है लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया था कि यह धर्मनिरपेक्ष होगा या लोकतांत्रिक।"
जबकि यासीर लतीफ हमादानी के अनुसार पाकिस्तान के लिए जिन्ना की सोच स्पष्ट थी। देश के पहले कानून मंत्री हिंदू थे और उन्हें कायदे आजम ने नियुक्त किया था। यासीर कहते हैं, "बंटवारे के दो दिन पहले जिन्ना ने मूलभूत अधिकारों के लिए कमेटी का गठन किया था। इसके छह सदस्य हिंदू थे। सो वे बहुत स्पष्ट थे। उनके लिए समानता राज्य का मूल सिद्धांत था।"
इतिहासकार मुबारक अली मानते हैं इतिहास में जीने के बजाय पाकिस्तान को अपना रास्ता खुद बनाना चाहिए।
वो कहते हैं, "पाकिस्तान जिन्ना की संपत्ति नहीं है। यह देश इनके लोगों का है। हमलोगों को पाकिस्तान को आज की परिस्थितियों के मुताबिक बनाना चाहिए न कि जिन्ना की सोच के मुताबिक।"
लेकिन यासीर इस बात से पूरी तरह असहमत हैं। वो कहते हैं कि जिन्ना देश के संस्थापक हैं और वो पाकिस्तान के लिए प्रासंगिक हैं और रहेंगे।