फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   World ›   Pakistan ›   China Pakistan economic corridor is the biggest reason for unemployment in pakistan

पाकिस्तान में बेरोजगारी की बड़ी वजह बन रही चीन की दोस्ती और CPEC

Tue, 30 Jul 2019 02:41 PM IST
अनिल पांडेय अनिल पाण्डेय, नई दिल्ली
अनिल पाण्डेय, नई दिल्ली Published by: अनिल पांडेय Updated Tue, 30 Jul 2019 02:41 PM IST
विज्ञापन
सार
  • पाक-चीन आर्थिक गलियारे की वजह से पाक में बलूचिस्तान के लोग हो रहे बेरोजगार
  • 1958 में ओमान से पाकिस्तान ने खरीदा था ग्वादर पोर्ट
  • 2013 में पाकिस्तान ने इस बंदरगाह को चलाने का ठेका सिंगापुर से लेकर एक चीनी कंपनी के हवाले कर दिया
  • 57 अरब डॉलर की लागत से बन रहा है चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा
  • 2011 में ग्वादर शहर को बलूचिस्तान की शीतकालीन राजधानी घोषित किया था पाकिस्तान ने
  • यह चीन की Belt and Road परियोजना का हिस्सा है
loader
China Pakistan economic corridor is the biggest reason for unemployment in pakistan
सीपेक-ग्वादर बंदरगाह - फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर

विस्तार

चीन की जिस परियोजना के दम पर पाकिस्तान खुद को आर्थिक रूप से समृद्ध करने का ख्वाब देख रहा है, वही उसके लिए सिरदर्द बनती जा रही है। दरअसल, ग्वादर बंदरगाह पर चल रहे चीन के काम की वजह से बलूचिस्तान में बेरोजगारी तेजी से बढ़ी है। इस गलियारे की वजह से पाकिस्तान को आर्थिक रूप से कमजोर होने का खतरा महसूस होने लगा है। इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के मुताबिक चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा चीन के हितों को पाकिस्तान के हितों से ऊपर रखता है। लिहाजा इससे चीन को फायदा होगा, लेकिन पाकिस्तान के कई प्रांतों को इससे काफी नुकसान हो रहा है।



पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के तटीय कस्बे ग्वादर और इसके आसपास के इलाके को 1958 में पाकिस्तान सरकार ने ओमान से खरीदा था। इस तटीय क्षेत्र के एक बड़े बंदरगाह बनने की संभावनाओं की बात उस समय शुरू हुई जब 1954 में एक अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण में ग्वादर को डीप-सी पोर्ट के लिए एक बेहतरीन स्थान बताया गया था। तब से ग्वादर को बंदरगाह के रूप में विकसित करने की बातें तो होती रहीं लेकिन जमीन पर काम दशकों बाद साल 2002 में शुरू हुआ।


उस वक्त सेना अध्यक्ष रहे जनरल परवेज मुशर्रफ ने ग्वादर बंदरगाह के निर्माण कार्य का उद्घाटन किया था और 24 करोड़ डॉलर की लागत से यह परियोजना 2007 में पूरी हुई। सरकार ने इस नए बंदरगाह को चलाने का ठेका सिंगापुर की एक कंपनी को अंतरराष्ट्रीय बाजार में नीलामी के बाद दिया।

ग्वादर बंदरगाह पहली बार विवाद और संदेह की चपेट में तब आया जब 2013 में पाकिस्तान सरकार ने इस बंदरगाह को चलाने का ठेका सिंगापुर की कंपनी से लेकर एक चीनी कंपनी के हवाले कर दिया। विशेषज्ञ इस मामले की पारदर्शिता पर आज भी सवाल उठाते हैं। यह वह दौर था जब पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर चीनी निवेश की बातें सामने आने लगीं।

जब नवाज शरीफ के नेतृत्व में सरकार बनी तो उसने बताया कि चीनी सरकार ने पाकिस्तान में अरबों डॉलर के निवेश का इरादा जताया है। इस परियोजना को चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरीडोर का नाम दिया गया और इसके तहत चीन को ग्वादर बंदरगाह से जोड़ने की योजना बनाई गई। 2015 में इस समझौत पर हस्ताक्षर हुआ और तब पता चला कि इस परियोजना में सड़कें, रेलवे और बिजली परियोजनाओं के अलावा कई विकास परियोजनाएं शामिल हैं।

इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप (आईसीजी) की रिपोर्ट में दावा किया गया कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (सीपीईसी) की वजह से बलूचिस्तान के स्थानीय लोग बेरोजगार और बेघर हो रहे हैं। इसकी मुख्य वजह सीपीईसी वाले क्षेत्र में बड़ी संख्या में सेना की तैनाती है। स्थानीय लोग परियोजना का लगातार विरोध कर रहे हैं। सीपीईसी पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के गिलगित-बाल्तिस्तान इलाके से गुजरता है, जिस पर भारत का दावा है। इसी वजह से परियोजना को लेकर भारत शुरू से ही आपत्ति जताता रहा है।

15 हजार सैनिकों को किया गया है तैनात

ग्वादर बंदरगाह
ग्वादर बंदरगाह - फोटो : Internet

इससे पहले भी खबरें आ चुकी हैं कि 9000 पाकिस्तानी सैनिकों और 6000 पैरामिलिट्री सैनिकों वाले Special Security Division (SSD) को CPEC प्रोजेक्ट और उसपर काम कर रहे चीनी नागरिकों की सुरक्षा के लिए तैयार किया गया है।

पर्यावरण को क्षति 

बलूचिस्तान और सिंध प्रांत का मानना है कि इस परियोजना के तहत बनने वाले रास्तों, इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक प्रोजेक्ट का अधिकतर फायदा पंजाब प्रांत को मिलेगा, जो कि पहले से ही देश का सबसे धनी और राजनीतिक रूप से ताकतवर प्रांत है। सिंध में कोयला आधारित बिजली संयंत्र लगाने से न सिर्फ यहां पर्यावरण को नुकसान हो रहा है, बल्कि लोगों को भी अपना घर छोड़कर जाना पड़ रहा है।

ग्वादर बंदरगाह से कम मुनाफे की आशंका के चलते पहले से अशांत बलूचिस्तान में और अशांति फैल सकती है। रिपोर्ट में सलाह दी गई है कि सरकार को इस प्रोजेक्ट का विरोध करने वाले लोगों पर अत्याचार और उनकी गिरफ्तारी पर भी रोक लगानी चाहिए, क्योंकि यह प्रोजेक्ट सामाजिक बंटवारे, राजनीतिक गतिरोध और नए संघर्षों की वजह बनता जा रहा है।

सिंगापुर जैसा बनाने का झांसा

चीन ने पाकिस्तान को समझाया कि गवादर बंदरगाह पूरा होने पर पाकिस्तान, सिंगापुर और हांगकांग से ज्यादा समृद्ध हो जाएगा। यह केवल उसकी आंखों में धूल झोंकने के बराबर था। चीन वास्तव में पाक के जरिए कई पड़ोसी देशों को साधना चाहता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक सच यह है कि चीन ने पाकिस्तान में जो आर्थिक गलियारा बनाया है, इसका मुख्य उद्देश्य हिंद महासागर में प्रवेश पाना है और सच कहा जाए तो यह केवल भारत को घेरने की चीन की साजिश है, जिसमें पाकिस्तान उसका अनजाने ही सहयोगी बन गया है। पाकिस्तान यह कहता है कि चीन ने जो आर्थिक गलियारा बनाया है उससे उसकी आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत हो जाएगी।

चीन ने पाकिस्तान को यह समझाया है कि यद्यपि अमेरिका पाकिस्तान को बीच-बीच में आर्थिक सहायता दे रहा है, लेकिन विश्व की बदलती राजनीति में अमेरिका अब भारत के बहुत निकट आ गया है। यह पाकिस्तान के लिए खतरे की बात है। पाकिस्तान चीन के इस झांसे में आ गया है और चीन जैसा कहता है वैसा ही वह कर रहा है। 

चीनी कब्जे में ग्वादर बंदरगाह

पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी भाग में बलूचिस्तान प्रांत में अरब सागर के किनारे पर स्थित एक पोर्ट सिटी है। यह ग्वादर जिले का केंद्र है। ग्वादर शहर एक 60 किमी चौड़ी तटवर्ती पट्टी पर स्थित है, जिसे मकरान कहा जाता है। ईरान तथा फारस की खाड़ी के देशों के बहुत पास होने की वजह से इस शहर का सैन्य और राजनीतिक महत्व है। पाकिस्तान प्रयास कर रहा है कि इस बंदरगाह के जरिए न केवल पाकिस्तान बल्कि चीन, अफगानिस्तान व मध्य एशिया के देशों का भी आयात-निर्यात को बढ़ावा मिले।

बदहाल होती अर्थव्यवस्था

ग्वादर की पुरानी तस्वीर
ग्वादर की पुरानी तस्वीर - फोटो : Internet

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का हाल दिनोंदिन बदतर होता जा रहा है। एक अनुमान है कि महंगाई बढ़ने के चलते पाकिस्तान में इस बार 10 लाख से अधिक लोग बेरोजगार हो जाएंगे। वहां की एक तिहाई अर्थव्यवस्था पर सेना का कब्जा है। सेना के आगे वहां की निर्वाचित सरकार भी बेबस है।

इस संस्था के नियंत्रण में व्यापार

डॉन अखबार के मुताबिक पाकिस्तान में सबसे ज्यादा बिजनेस फौजी फाउंडेशन के पास हैं। फौजी फाउंडेशन, सीमेंट, फर्टिलाइजर, बिजली और खाद्य उत्पादन करने वाली फैक्ट्रियों का नियंत्रण हैं। इसके अलावा 15 प्रोजेक्ट का नियंत्रण भी इसके पास है। फौजी के अलावा देश में शाहीन फाउंडेशन, बहरिया फाउंडेशन, आर्मी वेलफेयर ट्रस्ट और डिफेंस हाउसिंग अथॉरिटी (डीएचए) है, जिसके तहत 50 से अधिक व्यापार पर पूरा कंट्रोल है।

डीएचए को कानून के जरिए बनाया गया है, जिसके कार्य का क्षेत्र कराची, लाहौर, रावलपिंडी, इस्लामाबाद, मुल्तान, गुंजरावाला, बाहवलपुर, पेशावर और क्वेटा में है।

भारत का विरोध है बिजनेस: विदेशों में काफी संख्या में पाकिस्तानी सेना के खाते और बेनामी संपत्ति हैं। भारत का विरोध करना भी पाकिस्तानी सेना के लिए एक तरह का व्यापार है।

अर्थव्यवस्था से नहीं है लेना-देना

पाकिस्तानी सेना को देश की अर्थव्यवस्था और वहां के नागरिकों की दयनीय हालत से किसी तरह का कोई फर्क नहीं पड़ता है। वो चाहता है कि प्रत्येक पाकिस्तानी रुपये को केवल भारत विरोध में लगाया जाए, ताकि उसका बरसों पुराना एजेंडा चलता रहे।

ड्रेगन को फायदा, पाक को नुकसान

इसी मुहिम के तहत ग्वादर पोर्ट भी पाकिस्तानी सेना के दखल के साथ बन रहा है। कमर्शियल हब बनाए जाने के नाम पर शुरू हुए इस प्रोजेक्ट से यह इलाका विकास की बजाय सेना के बड़े ठिकाने में तब्दील होता जा रहा है। प्रोजेक्ट की वजह से लोग बेघर हो रहे हैं और उनका रोजगार छिन रहा है। वहीं आर्थिक गलियारे के बहाने चीन पाकिस्तान के बाजार में बुरी तरह छा गया है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get latest World News headlines in Hindi related political news, sports news, Business news, Crime all breaking news and live updates. Stay updated with us for all latest Hindi news.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed