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इस रणनीति से ट्रंप का ‘राजदुलारा’ बनना चाहता है पाकिस्तान, कंगाली से निकलने की आखिरी कोशिश

Mon, 16 Sep 2019 04:02 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 16 Sep 2019 04:02 PM IST
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Pakistan trying diplomatic push to solve Afghanistan peace deal to impress US president Donald Trump
इमरान खान और डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : PTI

पाकिस्तान ने अफगानिस्तान शांति वार्ता को पटरी पर लाने के लिए डिप्लोमेटिक प्रयास शुरू कर दिए हैं। 9-11 बरसी पर काबूल स्थित अमेरिकी दूतावास पर तालिबान के हमले के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने शांति वार्ता रद्द कर दी थी। वहीं पाकिस्तान को इसमें अभी भी उम्मीद की किरण नजर आ रही है। दरअसल पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति इस शांति वार्ता को फिर से शुरू करने की पक्षधर नहीं है। लेकिन पैसे-पैसे के लिए मोहताज हो चुका पाकिस्तान इस वार्ता को बहाल करके फिर से अमेरिका की गुडबुक में शामिल होना चाहता है।      

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एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में आने का डर

अगले महीने 16 से 18 अक्टूबर को पेरिस में होने वाली फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की बैठक को लेकर पाकिस्तान की धड़कनें तेज हो गई हैं। एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट (काली सूची) से बचने की लिए पाकिस्तान तरह-तरह की तिकड़म बिठा रहा है। पाकिस्तान को पता है कि अगर एक बार वह ब्लैक लिस्ट हो गया तो उससे बाहर आना बेहद मुश्किल होगा। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ग्रे लिस्ट में शामिल होने से बचने के लिए तमाम कोशिशों में लगे हैं। सितंबर के आखिर में 27 तारीख को होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की बैठक से पहले इमरान खान दुनियाभर के 20 नेताओं से मुलाकात करने वाले हैं, ताकि कुछ समर्थन जुटाया जा सके।

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शांति वार्ता बहाली के लिए सक्रिय हुआ पाकिस्तान

वहीं अफगानिस्तान में अमेरिका और तालिबान के बीच रद्द हो चुकी शांति वार्ता की बहाली में पाकिस्तानी डिप्लोमेट्स का सक्रिय होना भी इसी रणनीति का हिस्सा है। काबुल में हुए हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कैंप डेविड में तालिबान के शीर्ष नेताओं होने वाली इस गुप्त वार्ता को रद्द कर दिया था। इस बैठक में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी भी हिस्सा लेने वाले थे और दोनों पक्षों के पास ड्राफ्ट समझौता भी पहुंच चुका था।


पाकिस्तान का आधिकारिक तौर पर कहना है कि अफगानिस्तान में 18 सालों से चल रही जंग का समाधान करने के लिए बातचीत जरूरी है, लेकिन बातचीत रूकने से एक बार फिर से अफगानिस्तान में गृह युद्ध का खतरा मंडरा सकता है। समझौते के तहत अफगानिस्तान में अमेरिका के 14 हजार सैनिक हैं, जिनमें से 20 हफ्तों के भीतर 5,400 सैनिकों को वापस बुलाया जाना था।   

बताया एनएसए का हटना इसी रणनीति का हिस्सा

पाकिस्तान ने वार्ता की बहाली के लिए दो अपने वरिष्ठ राजनयिकों को लगाया है और दोनों अधिकारी संबंधित पक्षों से वर्तमान परिस्थितियों से बाहर निकलने का रास्ता खोज रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि ट्रंप ने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन को बाहर का रास्ता दिखा कर सकारात्मक संदेश भेजा है। अड़ियल अधिकारी के तौर पर अपने पहचान बना चुके जॉन बोल्टन शुरू से ही इस शांति वार्ता के खिलाफ थे, और अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो से भी उनकी पटरी नहीं बैठ रही थी।

पाक राजनयिकों का तर्क है बोल्टन को बाहर करने का साफ अर्थ है कि ट्रंप अभी भी बातचीत के लिए सकारात्मक हैं। उनका कहना है कि दोनों पक्षों के बीच नौ बार से बैठक में अहम भूमिका निभा चुका कतर अभी भी शांति वार्ता बहाली की कोशिशों में जुटा हुआ है। गौरतलब है कि कतर में ही तालिबान का राजनीति ऑफिस भी है।

जो बिडेन भी डाल रहे हैं दबाव

वहीं अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बिडेन भी पाकिस्तान की तरफ से अमेरिका पर दबाव बना रहे हैं। 2020 में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों की उम्मीदवारी के लिए होने वाली डिबेट में बोलते हुए बिडेन ने कहा कि अमेरिका खुद को अफगानिस्तान में आतंकवाद का पीड़ित बनने से रोक सकता है। बिडेन का कहना था कि अमेरिका आतंक के खिलाफ अभियान में पाक से मदद मांगे।     

पाक को उम्मीद घटेगा तनाव

पाकिस्तानी राजनयिकों को उम्मीद है कि उनकी कोशिशें बेकार नहीं जाएंगी और वे दोनों पक्षों के बीच तनाव घटाने में अहम भूमिका निभाएंगे। उनका कहना है कि अगर दोनों पक्ष संघर्ष विराम पर भी सहमति नहीं जताते हैं, तो हिंसक गतिविधियां कम करने के लिए तो राजी हो ही सकते हैं। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता डॉ. मुहम्मद फैसल का कहना है कि हम हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और सभी पक्षों से बातचीत के लिए किसी तर्कसंगत फैसले पर पहुंचने की अपील कर रहे हैं।

‘शांति दूत’ बनने की रणनीति

वहीं पाकिस्तान शांति वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभा कर अमेरिका की गोद में बैठना चाहता है। पाकिस्तान की रणनीति है कि अमेरिकी और तालिबान के बीच शांति वार्ता फिर से शुरू करके वह दुनिया की नजरों में ‘शांति दूत’ बन सकता है। वहीं इस मुहिम का फायदा उसे न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर में अनुच्छेद 370 की समाप्ति को मुद्दा बना कर मिलेगा, वहीं वह खुद को आतंकवाद से पीड़ित बता कर एफएटीएफ से फंड हासिल कर सकेगा। साथ ही, ट्रंप की  

भारत विरोधी माहौल बनाने में जुटे इमरान

पाक प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी एफएटीएफ की बैठक से पहले ही माहौल भी बनाना शुरू कर दिया है। इमरान का दावा है कि भारत सरकार ने बातचीत शुरू कर शांति कायम करने के बजाय पाकिस्तान को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) में ब्लैकलिस्ट कराना चाहता है। एफएटीएफ ने जून 2018 में पाकिस्तान को अपनी ब्लैक लिस्ट में रखा था और आतंक के खिलाफ कार्रवाई के लिए 27 सूत्रीय एक्शन प्लान सौंपा गया था। जिसके लिए पाक को 15 महीने का समय दिया गया था, ताकि आतंक के खिलाफ कार्रवाई की पाकिस्तान की कोशिशों की समीक्षा की जा सके। इससे पहले 22 अगस्त को एशिया पैसिफिक ग्रुप (एपीजी) ने पाकिस्तान को मानदंड पूरा ना कर पाने के कारण ब्लैक लिस्ट में भी डाल दिया था।

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