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Hindi News ›   World ›   Pakistan Supporter Turkey added to FATF Grey List for connections of not stopping Financial Aid to Terror Organisations under Recep Tayyip Erdogan explained

FATF: तुर्की ने की थी पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट से निकालने की बात, अब खुद बना सूची का हिस्सा, जानें कैसे जुड़ा आतंकवाद से नाम?

Fri, 22 Oct 2021 08:04 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेरिस/अंकारा
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेरिस/अंकारा Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Fri, 22 Oct 2021 08:04 PM IST
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सार
आतंकवादी संगठनों को मिलने वाले आर्थिक मदद के जरिए न रोक पाने के लिए पाकिस्तान तीन साल से एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट का हिस्सा, पर अब फ्रांस की आतंकरोधी संस्था ने मानक और कड़े करते हुए तुर्की को भी ग्रे लिस्ट में शामिल कर लिया है। जानें ग्रे लिस्ट में शामिल होने के बाद आतंक समर्थकों को क्या दिक्कतें आती हैं...
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Pakistan Supporter Turkey added to FATF Grey List for connections of not stopping Financial Aid to Terror Organisations under Recep Tayyip Erdogan explained
एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में तुर्की और पाकिस्तान दोनों के नाम। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

पिछले साल अक्तूबर में फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की बैठक के दौरान जब पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में रखने के मुद्दे पर चर्चा शुरू हुई, तो उसे दो देशों से समर्थन मिला। पहला देश था चीन और दूसरा देश तुर्की। कश्मीर मुद्दे पर लगातार भारत के विरोध में बोलने वाले राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोआन ने तो यहां तक कह दिया था कि वे किसी भी तरह से पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट से बाहर निकलवाने की कोशिश करेंगे। हालांकि, न तो तब और न ही अब तुर्की की यह कोशिश सफल हुई। बल्कि खुद तुर्की अब आतंकवादियों की मदद करने के आरोप में घिर चुका है। एफएटीएफ ने अक्टूबर में हुई तीन दिन की बैठक के बाद एलान किया कि अब खुद तुर्की भी पाकिस्तान के साथ इस ग्रे लिस्ट का हिस्सा बन गया है। 

ग्रे लिस्ट में अब पाकिस्तान, तुर्की समेत 22 देश 

आतंकवादियों को मिलने वाली आर्थिक मदद के स्रोतों पर प्रतिबंध लगाने वाली संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) ने पहली बार जून 2018 में ग्रे लिस्ट में डाला था। अब इस संस्था की हालिया बैठक के बाद पाकिस्तान के साथ 22 और देश एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट का हिस्सा रहेंगे। इनमें म्यांमार और तुर्की के नाम भी शामिल कर लिए गए हैं।

पर ग्रे लिस्ट में तुर्की का नाम क्यों, क्या है आतंकवाद से कनेक्शन?

एफएटीएफ के अध्यक्ष प्लीयर ने एक न्यूज कॉन्फ्रेंस के दौरान तुर्की के नेतृत्व पर ही सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने कहा कि तुर्की को आतंकवादियों तक पहुंचने वाली आर्थिक मदद की गंभीरता से निगरानी करने की जरूरत है। खासकर अपने बैंकिंग और रियल एस्टेट सेक्टर और सोने और कीमती रत्नों के सौदागरों की। प्लीयर ने कहा कि तुर्की को दिखाना होगा कि वह मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों को प्रभावी तौर से निपट रहा है और आतंकियों को वित्तीय मदद पहुंचाने वालों पर कार्रवाई भी कर रहा है। खासकर आईएसआईएस और अल-कायदा से जुड़े आंतकी संगठनों के मामले में। 

एफएटीएफ के बयान में कहा गया है कि तुर्की ने आतंकवाद को रोकने और एफएटीएफ को मजबूत करने के लिए कई उच्चस्तरीय राजनीतिक प्रतिबद्धताएं जताईं। इसलिए एफएटीएफ ने तुर्की को ग्रे लिस्ट से बाहर आने के लिए आठ विशेष कार्य दिए हैं। इनके तहत-

1. तुर्की को मनी लॉन्ड्रिंग-आतंकवाद की वित्तीय मदद की निगरानी के लिए ज्यादा संसाधन लगाने होंगे। खासकर उच्च-जोखिम वाले सेक्टर्स में, जहां उसे आतंकी गतिविधियों की जांच भी बढ़ानी होगी। 

2. तुर्की को मनी लॉन्ड्रिंग और आंतकवाद को मिलने वाली आर्थिक मदद रोकने के लिए ऐसी गतिविधियों को अलग-थलग करने वाले प्रतिबंध लगाने होंगे। इनमें गैर-रजिस्टर्ड पैसों के लेन-देन भी शामिल होने चाहिए।

3. उसे मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी जांच के लिए अपने आर्थिक खुफिया विभाग का इस्तेमाल बढ़ाना होगा। 

4. तुर्की को मनी लॉन्ड्रिंग की जांच और आरोपियों पर कार्रवाई भी करनी होगी। 

5. जिम्मेदारी तय करनी होगी और आंतक-रोधी वित्तीय प्राधिकरणों के लिए प्रदर्शन के आधार पर लक्ष्य तय करने होंगे।

6. आतंकवाद से जुड़े मामलों में ज्यादा से ज्यादा आर्थिक जांच करनी होंगी। 

7. संयुक्त राष्ट्र के आतंकरोधी प्रस्ताव के तहत लक्षित आतंकियों और संगठनों वित्तीय प्रतिबंध लगाने होंगे। और...

8. गैर-लाभकारी संस्थाओं पर जोखिम-आधारित निगरानी लागू करनी होगी, ताकि उन्हें आतंकवाद को वित्तीय मदद मुहैया कराने से रोका जा सके। 

एफएटीएफ की लिस्ट में रखे जाने पर क्या होता है नुकसान?

माना जाता है कि किसी भी देश को एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में ले जाने से उसकी आर्थिक व्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ता है। दरअसल, ग्रे लिस्ट में शामिल किए जाने का एक मतलब यह निकाला जाता है कि वह देश आतंकवाद के खिलाफ जानबूझकर या अनजान बनते हुए कार्रवाई कर पाने में असमर्थ है। ऐसे में आतंकवादियों को सीधे या अप्रत्यक्ष तौर पर मदद पहुंचाने के लिए कई संस्थाएं उस देश पर अलग-अलग तरह के आर्थिक प्रतिबंध भी लगाती हैं। 

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की एक हालिया स्टडी में कहा गया था कि किसी भी देश के ग्रे लिस्ट में जाने से उसे मिलने वाली राशि जीडीपी के मुकाबले 7.6 फीसदी तक कम हो जाती है। जबकि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) पर भी जबरदस्त उल्टा प्रभाव पड़ने का खतरा रहता है। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि एफएटीएफ की तरफ से ग्रे लिस्ट में जाने के बाद तुर्की की करेंसी- लीरा पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और यह गुरुवार के अपने रिकॉर्ड न्यूनतम स्तर से और भी नीचे जा सकती है। 

तुर्की में राष्ट्रपति अर्दोआन के रवैये और बढ़ते कट्टरपंथ का नतीजा है यह रैंकिंग

तुर्की में बीते कुछ सालों में जबरदस्त बदलाव आए हैं। इस्लामिक जगत में अपने धर्मनिरपेक्ष रवैये के लिए लोकप्रिय तुर्की अब राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोआन के शासन में कट्टरपंथ की तरफ मुड़ चुका है। अर्दोआन के राज में ही तुर्की ने भारत से रिश्ता लगभग तोड़ते हुए पाकिस्तान के साथ रिश्तों पर जोर देना शुरू किया। इसी कड़ी में तुर्की ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर जुल्म का मुद्दा उठाना बंद किया और भारत में कश्मीर मुद्दे पर बयान देने शुरू कर दिए। फ्रांस में इसी साल पैगंबर का कार्टून दिखाने वाले एक शिक्षक की हत्या से जुड़ा मामला हो या अफगानिस्तान में तालिबान का समर्थन करने का। तुर्की ने लगातार आतंकवाद के समर्थन वाले बयान देना जारी रखा है। 
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