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पाकिस्तान: ट्रांसजेंडर्स को संरक्षण देकर कट्टरपंथियों से घिरी इमरान सरकार

Sat, 05 Mar 2022 02:43 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, इस्लामाबाद
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, इस्लामाबाद Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 05 Mar 2022 02:43 PM IST
सार

विश्लेषकों का कहना है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम तब से ही विवादित रहा है, जब उसे पारित कराया गया था। समाज के कट्टरपंथी हलकों में इसको लेकर लगातार विरोध जताया गया है। अब ये मामला शरिया कोर्ट के दायरे में है। इस्लाम में समलैंगिकता को गुनाह समझा गया है। जबकि सरकार का कहना है कि इस कानून का मकसद ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को संरक्षण देना है...

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Pakistan Shariat Court pull the Human Rights Ministry in the issue of rights of transgender persons
पाकिस्तान में ट्रांसजेंडर्स को मानवाधिकार - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

पाकिस्तान में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकार के मुद्दे पर विवाद और बढ़ गया है। देश के संघीय शरीयत कोर्ट ने इस मामले में संघीय मानवाधिकार मंत्रालय को कठघरे में खड़ा कर दिया है। मंत्रालय ने 2018 में बने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम के बारे में शरिया अदालत में जो जवाब दाखिल किया था, उस पर अदालत ने उससे सख्त सवाल पूछे हैं। मामले की सुनवाई शरिया अदालत की तीन जजों की बेंच कर रही है। बेंच की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद नूर मेसकनजई कर रहे हैं।

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अदालत ने पूछे मंत्रालय से सवाल

अदालत ने मानवाधिकार मंत्रालय की तरफ से दायर जवाब पर जिरह के लिए मंत्रालय के महानिदेशक को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में तलब किया। बेंच में शामिल जज सईद मोहम्मद अनवर ने उनसे सीधा सवाल पूछा- क्या मानवाधिकार मंत्रालय समलैंगिकता का समर्थन कर रहा है। इस मामले में मंत्रालय के विधि सलाहकार से भी कोर्ट ने सवाल पूछे। जस्टिस अनवर ने कहा- ऐसा लगता है कि सरकार समलैंगिक विवाहों के खिलाफ मौजूद कानून को खत्म करने की कोशिश कर रही है।

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जस्टिस अनवर ने मंत्रालय के जवाब में एलजीबीटी अधिकारों के जिक्र पर भी आपत्ति उठाई। उन्होंने पूछा- ‘ये पत्र किसने लिखा है? क्या आपको मालूम है कि एलजीबीटी अधिकार क्या होते हैं? क्या मानवाधिकार मंत्रालय पाकिस्तान में एलजीबीटी अधिकारों का समर्थन कर रहा है?’
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विश्लेषकों का कहना है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम तब से ही विवादित रहा है, जब उसे पारित कराया गया था। समाज के कट्टरपंथी हलकों में इसको लेकर लगातार विरोध जताया गया है। अब ये मामला शरिया कोर्ट के दायरे में है। इस्लाम में समलैंगिकता को गुनाह समझा गया है। जबकि सरकार का कहना है कि इस कानून का मकसद ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को संरक्षण देना है।

मानवाधिकार मंत्री को कोर्ट में पेश करनी की धमकी

इस कानून पर शरिया कोर्ट ने सरकार को नोटिस भेजा था। उस पर ही मानवाधिकार मंत्रालय ने अपना जवाब पेश किया। लेकिन इसमें इस्तेमाल हुई भाषा पर कोर्ट और भड़क गया है। जस्टिस अनवर ने चेतावनी दी कि मंत्रालय के उत्तर पर जो सवाल उठाए गए हैं, अगर सरकार उस पर स्षटीकरण देने में नाकाम रही, तो सीधे मानवाधिकार मंत्री को कोर्ट में बुलाया जाएगा। उन्होंने कहा कि इंटरनेट के कॉपी-पेस्ट कर तैयार किए गए जवाब को अदालत स्वीकार नहीं कर सकती।

इस कानून को कोर्ट में चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये कानून समलैंगिक विवाह को वैध बनाने की दिशा में पहला कदम है। विपक्षी दल जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फजलुर) इस कानून का लगातार विरोध करता रहा है। पार्टी की सांसद नईमा किशवर ने दलील दी है कि इस कानून में कई गंभीर खामियां हैँ। पिछले नवंबर में जमीयत ने इस कानून में संशोधन का एक बिल नेशनल असेंबली में पेश किया था।



विश्लेषकों का कहना है कि ये विवाद पाकिस्तान में बढ़ रहे कट्टरपंथ की मिसाल है। मानवाधिकारों के समर्थक गुट लंबे समय से ट्रांसजेंडर लोगों को संरक्षण देने के लिए मुहिम चलाते रहे हैं। उसी के दबाव में 2018 में सरकार ने कानून बनाया था। लेकिन तभी से कट्टरपंथियों ने इस पर जवाबी हमला बोल रखा है।

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