सियालकोट में बर्बरता: अपने बोये को काट रहा है पाकिस्तान
पर्यवेक्षकों का कहना है कि असल समस्या पाकिस्तान का ईश निंदा संबंधी कानून है। इस कानून का विरोध करने पर वहां हत्याएं हो चुकी हैं। सियालकोट की घटना की निंदा सभी राजनीतिक दलों ने की है। लेकिन उनमें से किसी ने ईश निंदा कानून को खत्म करने या उसके लिए जनमत बनाने की पहल नहीं की है...
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पाकिस्तान के सियालकोट शहर में यातना देने के बाद एक श्रीलंकाई नागरिक की हुई हत्या ने पाकिस्तान के जागरूक तबकों को हिला दिया है। इस घटना ने एक बार फिर इस बात पर रोशनी डाली है कि देश में धर्मांधता किस हद तक बढ़ चुकी है। ईशा-निंदा (इस्लाम को अपमानित करना) के आरोप में लोगों पर हमले पाकिस्तान में दशकों से जारी रहे हैं। लेकिन सियालकोट की घटना को जितने भयानक ढंग से अंजाम दिया गया, वैसा लंबे समय बाद हुआ है।
घटना के तुरंत के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने दोषियों को सजा दिलाने का वादा किया। सोशल मीडिया पर समाज के उदारवादी तबकों की तरफ से इस पर नाराजगी जताई गई। कुछ शख्सियतों ने अतीत में ईशा निंदा के आरोप में हुई हिंसा का जिक्र भी किया और कहा कि पाकिस्तान घूम-फिर कर फिर उसी मुकाम पर पहुंच गया है।
दारूद शरीफ लिखे कागज को फाड़ा
पंजाब प्रांत के शहर सियालकोट में जो व्यक्ति इस बार शिकार बना, वह श्रीलंकाई नागरिक था। पाकिस्तानी मीडिया में पुलिस सूत्रों के हवाले से छपी खबरों के मुताबिक वह एक फैक्टरी में ऑपरेशन मैनेजर था और वहां सात साल से काम कर रहा था। भीड़ ने पहले उसकी बेरहमी से पिटाई की और फिर उसे जला कर मार डाला। श्रीलंकाई नागरिक पर आरोप लगाया गया था कि उसने उस कागज को फाड़ डाला था, जिस पर दारूद शरीफ लिखित था।
दारूद शरीफ ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए पढ़ी जाने वाली आयतें हैं। इस्लाम में मान्यता है कि दारूद शरीफ को पढ़ने वाले व्यक्ति के दस पाप माफी हो जाते हैं, जबकि उसके दस अच्छे कर्म दर्ज हो जाते हैं। साथ ही इससे गरीबी और भूख खत्म होती है। मान्यता है कि रोज दारूद शरीफ का पाठ करने वाले व्यक्ति के हृदय पवित्र होता है।
पाकिस्तानी मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक श्रीलंकाई नागरिक के कथित रूप से दारूद शरीफ फाड़ने की खबर फैक्टरी इलाके में फैल गई। उसके बाद वहां भीड़ इकट्ठी होने लगी। पुलिस को इस बारे में सूचना दी गई। लेकिन उसके पहले के पहुंचने ही वहां उसकी हत्या हो चुकी थी। प्रधानमंत्री इमरान खान ने एक ट्विट में इसे पाकिस्तान के लिए राष्ट्रीय शर्म की घटना बताया।
ईश निंदा संबंधी कानून है असली जड़
लेकिन पर्यवेक्षकों का कहना है कि असल समस्या पाकिस्तान का ईश निंदा संबंधी कानून है। इस कानून का विरोध करने पर वहां हत्याएं हो चुकी हैं। सियालकोट की घटना की निंदा सभी राजनीतिक दलों ने की है। लेकिन उनमें से किसी ने ईश निंदा कानून को खत्म करने या उसके लिए जनमत बनाने की पहल नहीं की है।
भीड़ की हिंसा का शिकार बने श्रीलंका नागरिक का नाम प्रियंता कुमार है। उनकी पिटाई में शामिल दो लोगों ने ट्विटर पर इस घटना का वीडियो डाल कर कुमार की पिटाई में शामिल होने की बात गर्व से कबूल की। उन्होंने अपने इस कृत्य को वाजिब ठहराया। उन्होंने कहा कि पहले उन्होंने फैक्टरी मैनेजमेंट के पास कुमार के व्यवहार की शिकायत की। लेकिन मैनेजमेंट ने उस पर ध्यान नहीं दिया, तो उन्होंने मामला अपने हाथ में लेने का फैसला किया।
पर्यवेक्षकों ने इस घटना को पाकिस्तान में बढ़ रहे कट्टरपंथ और असहनशीलता की मिसाल बताया है। यहां ये आम समझ है कि पाकिस्तान के सभी राजनीतिक दल इस माहौल को भड़काने में कभी ना कभी शामिल रहे हैं।