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आज खुशी कल गम: पाकिस्तान को बहुत महंगा पड़ सकता है तालिबान की जीत पर जश्न

Wed, 18 Aug 2021 02:25 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, इस्लामाबाद
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, इस्लामाबाद Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 18 Aug 2021 02:25 PM IST
सार

विश्लेषकों का कहना है कि ये खुशी जल्द ही चिंता में बदल सकती है। उन्होंने ध्यान दिलाया है कि अफगान तालिबान की जीत पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने भी खुशी जताई है। इस गुट का मकसद पाकिस्तान में भी उसी तरह की इस्लामी व्यवस्था कायम करना है, जैसा 1996 से 2001 तक अफगान तालिबान ने कायम की थी...

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Now it is feared that the victory of the Afghan Taliban will boost the morale of Tehrik e taliban TTK pakistan and all Islamic fundamentalist organizations
तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला गनी बरादर का 2019 में इस्लामाबाद में स्वागत करते पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी। - फोटो : Pakistan Foreign Office

विस्तार

काबुल की सत्ता पर तालिबान के फिर से कब्जा जमा लेने पर पाकिस्तान में खुशी देखी गई। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने तो यहां तक कह दिया कि अफगानिस्तान ने ‘गुलामी की जंजीरों’ को तोड़ फेंका है। कई दूसरे नेताओं, मौलवियों और सैन्य अधिकारियों ने भी इस घटना पर खुशी जताई।
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लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि ये खुशी जल्द ही चिंता में बदल सकती है। उन्होंने ध्यान दिलाया है कि अफगान तालिबान की जीत पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (जिसे बोलचाल में पाकिस्तानी तालिबान कहा जाता है) ने भी खुशी जताई है। उसने अफगान तालिबान को बधाई भेजी है। ये आतंकवादी गुट लंबे समय से पाकिस्तान सरकार से लड़ रहा है। उसका मकसद पाकिस्तान में भी उसी तरह की इस्लामी व्यवस्था कायम करना है, जैसा 1996 से 2001 तक अफगान तालिबान ने कायम की थी।
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अब ये अंदेशा गहरा है कि अफगान तालिबान की जीत से तमाम इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों का मनोबल बढ़ेगा। लेखक और राजनीतिक विश्लेषक आयशा सिद्दिकी ने ब्रिटिश अखबार द गार्जियन से कहा- ‘तालिबान के कब्जे से पाकिस्तान में सभी चरमपंथी- धार्मिक तत्वों को ताकत मिलेगी। अफगानिस्तान में क्या होता है, अगले कुछ महीनों तक सबकी नजर उस पर रहेगी। इसलिए तब तक पाकिस्तान में शांति रहेगी। लेकिन अगर अफगान तालिबान अपनी सत्ता स्थिर करने में सफल हो गया, तो फिर पाकिस्तान में उग्रवाद बढ़ेगा।
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पाकिस्तानी तालिबान पर पाकिस्तान में प्रतिबंध लगा हुआ है। वह पाकिस्तान में कई भयंकर हमले करने के लिए जिम्मेदार रहा है। पाकिस्तानी तालिबान का जन्म भी अफगान तालिबान से ही हुआ है। वह अफगान तालिबान जैसी ही विचारधारा में यकीन करता है। विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि पिछले महीने अफगानिस्तान में अपना कब्जा बढ़ने पर जिन कैदियों की तालिबान ने सबसे पहले रिहाई की, उनमें पाकिस्तानी तालिबान का उप-प्रमुख फकीर मोहम्मद भी है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक हाल में पाकिस्तान सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने पाकिस्तानी सांसदों के सामने कहा था कि अफगान तालिबान और पाकिस्तानी तालिबान दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे का जिन लोगों ने समर्थन किया है, उनमें पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के पूर्व प्रमुख असद दुर्रानी भी हैं। उन्होंने द गार्जियन से कहा- ‘अफगानिस्तान की आम जनता तालिबान के कब्जे से खुश है। चिंतित सिर्फ सभ्रांत तबकों के लोग हैं, जिनकी लूट और गरीबों का शोषण करने की क्षमता पर अब रोक लग जाएगी।’ बताया जाता है कि 1990 के दशक में आईएसआई के प्रमुख के रूप में तालिबान को खड़ा करने में दुर्रानी ने अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा- ‘तालिबान पाकिस्तान में विचारधारा या राजनीति को प्रभावित करना नहीं चाहता। यह पूरी तरह हम पर है कि क्या हम उनके विजयी मॉडल को अपनाना चाहते हैं।’

लेकिन कई पाकिस्तानियों की राय है कि तालिबान को समर्थन देकर पाकिस्तान खतरनाक खेल खेल रहा है। ‘तालिबानः मिलिटैंट इस्लाम, ऑयल एंड फंडामेंटलिज्म इन सेंट्रल एशिया’ नाम की किताब के लेखक अहमद रशीद ने द गार्जियन से कहा- ‘पाकिस्तान ने तालिबान को अपनी जमीन पर सक्रिय रहने की इजाजत दी है। मेरी राय में इसके बहुत गंभीर नतीजे होंगे। पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर उग्रवाद और कट्टरपंथ फैलने जा रहा है।’

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