अब कयासों का दौरः अलास्का के बाद किधर जाएंगे अमेरिका और चीन के रिश्ते?
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अमेरिका और चीन के बीच कड़वाहट के माहौल में अलास्का में हुई सीधी बातचीत में एकमात्र चमकती रेखा जलवायु परिवर्तन रोकने पर दोनों देशों में बनी सहमति रही। दोनों देश जलवायु परिवर्तन से मुकाबले के लिए एक साझा कार्यदल बनाने पर राजी हुए। लेकिन बातचीत के बाद दोनों पक्षों ने जो कहा, उससे यही संकेत मिला बातचीत में कुल मिला कर सहमति के बिंदुओं की कमी रही।
बचाव की मुद्रा में दिखा अमेरिका
वार्ता खत्म होने के बाद अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने दावा किया कि जब अमेरिकी पक्ष ने ‘टकराव वाले मुद्दे’ उठाए, तो उस पर चीन बचाव की मुद्रा में नजर आया। दूसरी तरफ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्य और वरिष्ठ राजनयिक यांग जिची ने कहा कि दोनों पक्षों में ‘सीधी, खुली और रचनात्मक बात हुई’, लेकिन साथ ही उन्होंने संकल्प जताया कि चीन ‘अपनी संप्रभुता की रक्षा’ करेगा।
इन बयानों के आधार पर विश्लेषकों ने अनुमान लगाया है कि दो दिन चली वार्ता में टकराव वाले मुद्दों पर दोनों पक्ष अपनी-अपनी जगह अड़े रहे। उनके मुताबिक इससे भविष्य के लिए कोई उम्मीद नहीं बंधती है।
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर चोंग जा यान ने हांगकांग के अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से कहा- ‘विवाद का पूर्व अनुमान था, लेकिन जिस तरह की आक्रामकता दिखी, उसकी अपेक्षा नहीं थी।
ये बैठक कुछ वैसी रही, जैसी शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ की शुरुआती बैठकें रही थीं।’ इस बावजूद चोंग के मुताबिक ये संभव नहीं है कि दोनों पक्ष अपने संबंध को पूरी तरह खत्म कर देंगे।
ऑस्ट्रेलिया में तस्मानिया यूनिवर्सिटी में एशियाई अध्ययन विषय के प्रोफेसर जेम्स चिन का अनुमान है कि दोनों पक्षों में निकट भविष्य में बातचीत की संभावना नहीं है और कुछ समय बाद ही वार्ता की मेज पर लौटेंगे। दोनों पक्षों का अपने रुख पर अडिग रहना आसियान (दक्षिण पूर्व एशिया के) देशों के लिए चिंता की बात है।
मुमकिन है कि इस बीच अमेरिका इस क्षेत्र में चीन से टकराव बढ़ाने वाले कदम उठाए। चिन की राय है कि अगर ये टकराव लंबा चला तो दुनिया के दो खेमों में बंट जाने का अंदेशा पैदा हो जाएगा। कुछ विश्लेषकों के मुताबिक दोनों पक्ष अपने घरेलू जनमत के लिए कुछ सख्त बातें कहेंगे, ये संभावना थी।
लेकिन जिस तरह की तू-तू मैं-मैं देखने को मिली, वह भविष्य के लिए खराब संकेत है। इसका परिणाम यह होगा कि चीन अपनी उस तरह की गतिविधियां और तेज कर देगा, जिन पर हाल के महीनों में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को एतराज रहा है। उधर, अमेरिका भी चीन विरोधी गठबंधन को मजबूत करने में अपनी ताकत झोंक देगा।
थाईलैंड की चुलालोंगकोर्ण यूनिवर्सिटी से जुड़े राजनीति शास्त्री थितिनान पोंगसुधीरक ने साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से कहा कि अलास्का बैठक में चीनी पक्ष कुछ लाभ की स्थिति में था। इसकी वजह उसके वार्ताकारों का अधिक अनुभवी होना है। गौरतलब है अमेरिकी अधिकारियों ने हाल में पद संभाला है।
जानकारों के मुताबिक इसका असर भी शायद उनके तेवर पर दिखा। शंघाई स्थित ईस्ट चाइना नॉर्मन यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर जोसेफ ग्रेगरी की राय है कि हालांकि बैठक में दोनों पक्षों का असंतोष तीखे ढंग से जाहिर हुआ, इसके बावजूद दोनों पक्षों की यह मजबूरी है कि वे विभिन्न मोर्चों पर अपने संबंधों को सुधारें।
चीन के अखबार ग्लोबल टाइम्स ने वार्ता के सकारात्मक पक्षों को रेखांकित किया है। अक्सर चीन सरकार की राय को जाहिर करने वाले इस अखबार ने एक रिपोर्ट में चीनी पक्ष के हवाले से कहा है कि टकराव भरी शुरुआत के बाद हुई बातचीत लाभदायक रही। मुख्य मुद्दों पर गहरे मतभेद कायम रहने के बावजूद इससे आपसी समझदारी बढ़ाने में मदद मिली है।
ग्लोबल टाइम्स ने एक दूसरी टिप्पणी में लिखा है कि कई लोगों ने कहा है कि ये टकराव (अलास्का में हुआ टकराव) चीन-अमेरिका संबंधों में एक ऐतिहासिक क्षण बन गया है। अब इस बात की कम संभावना है कि दोनों देश राजनीतिक या सुरक्षा संबंधी मसलों पर किसी सहमति पर पहुंच सकेंगे।
लेकिन कई लोगों ने इस तरफ भी ध्यान दिलाया है कि दोनों देशों के बीच 4.06 खरब युआन का आपसी सालाना व्यापार सबसे अहम है, जिसमें दोनों देश कुछ कामयाबी पा सकते हैं और टकराव के जोखिम को टाल सकते हैं। विश्लेषकों के मुताबिक टकरावों के बीच भी सहयोग की संभावनाएं तलाशने की कोशिश एक सकारात्मक बात है। लेकिन ऐसा सचमुच हो पाएगा, ये कहना अभी किसी के लिए मुमकिन नहीं है।