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नेपालः ओली-दहल की जंग ने दी राजशाही समर्थकों को ताकत, बुद्धिजीवियों ने जताई चिंता
Wed, 02 Dec 2020 04:35 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Wed, 02 Dec 2020 04:35 PM IST
सार
- सचिवालय की बैठक में दोनों नेताओं में हुई तीखी तकरार, नौ में से सात सदस्यों ने जताया ओली के रवैये पर ऐतराज
- दोनों नेताओं ने अपनी अपनी रिपोर्ट में लगाए एक दूसरे पर गंभीर आरोप
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KP sharma OLI and Pushp Kamal Dahal
- फोटो : Nepal Mountain News (सांकेतिक)
विस्तार
क्या नेपाल की जनता और सियासी नेता सिर्फ दो नेताओं की आपसी लड़ाई में उलझे रहेंगे या कुछ देशहित की बात भी होगी? ये सवाल अब नेपाल के बुद्धिजीवी तबके में उठने लगा है। खासकर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की बैठकों के संदर्भ में और उसमें से बाहर आ रही खबरों को देखकर ये चिंता जताई जा रही है। बुद्धिजीवियों का मानना है कि पिछले कुछ समय से जिस तरह राजशाही के समर्थक एक बार फिर से सक्रिय हो गए हैं और काठमांडू समेत देश के तमाम हिस्सों में राजा की वापसी को लेकर आंदोलन हो रहे हैं, वह मौजूदा सरकार की नाकामी की ओर इशारा करता है।
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सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय सचिवालय की लगातार हो रही बैठकों में जिस तरह प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पार्टी के सह अध्यक्ष पुष्प कमल दहल प्रचंड के तकरार, तनाव और दुश्मनी की खबरें आ रही हैं, वह पार्टी के साथ साथ लोकतंत्र समर्थकों के लिए भी चिंता पैदा करने वाली हैं। प्रधानमंत्री पद न छोड़ने की जिद पर अड़े ओली अब दहल के खिलाफ ऐसा माहौल बनाने में लग गए हैं कि वह पार्टी के सहअध्यक्ष भी न रह पाएं। इसके लिए उन्होंने 38 पेज की जो अपनी रिपोर्ट सौंपी है और इस जिद पर अड़े हैं कि दहल अपनी 19 पेज की रिपोर्ट वापस लें, उससे पार्टी के तमाम नेता नाराज हैं।
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सचिवालय की बैठक अभी जारी है, लेकिन मंगलवार देर रात तक चली बैठक में केन्द्रीय सचिवालय के नौ में से सात सदस्य ओली के इस रवैये से दुखी और नाराज थे, कि वो दहल के सिरे से खारिज करने पर अड़े हैं। दहल ने 13 नवंबर को पार्टी को सौंपी अपनी रिपोर्ट में ओली पर मनमानी करने, अड़ियल रवैया अपनाने और खुद को सर्वशक्तिमान समझने के अलावा अन्य कई आरोप लगाए थे।
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इसके जवाब में ओली ने भी 28 नवंबर को दहल से दोगुनी बड़ी यानी 38 पेज की जवाबी रिपोर्ट बनाकर दहल पर भी आरोपों की झड़ी लगा दी। और पार्टी अध्यक्ष के साथ साथ देश के प्रधानमंत्री होने के नाते ये दबाव बनाने लगे कि उनकी ही रिपोर्ट को अंतिम माना जाए और दहल की रिपोर्ट को खारिज कर दिया जाए। वह उसपर चर्चा करने को भी राजी नहीं हो रहे थे।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक दहल ने ओली से गुस्से में कहा, आप अपने आपको समझते क्या हो, क्या आप ही अकेले देश और सरकार हो? उधर एनसीपी के प्रवक्ता नारायण काजी श्रेष्ठ ने बताया कि पार्टी की एकता को बनाए रखने के लिए अब तमाम नेता सक्रिय हैं और दोनों पक्षों की एक दूसरे को लेकर नाराज़गी की वजहों को समझ चुके हैं।
कोशिश है कि कोई रास्ता निकले। इसलिए पार्टी सचिवालय ने ओली के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है कि दहल की रिपोर्ट पर चर्चा ही न हो। दोनों ही नेताओं की रिपोर्ट और आरोपों पर चर्चा हो रही है और सुलह का रास्ता निकालने की कोशिश भी जारी है। ये भी माना जा रहा है कि सचिवालय दोनों नेताओं की रिपोर्ट के आधार पर एक साझा प्रस्ताव या रिपोर्ट तैयार करेगा जिसे पार्टी की स्थाई समिति को सौंपा जाएगा।
गौरतलब है कि दहल ने अपनी रिपोर्ट में ओली पर पार्टी के नियमों और मूल्यों को न मानने, पार्टी की किसी समिति या किसी सदस्य की बात को नजरअंदाज़ करने, संवैधानिक संस्थाओं में मनमाने तरीके से नियुक्तियां करने जैसे आरोप लगाए थे। इसके जवाब में ओली ने अपनी रिपोर्ट में दहल पर सत्तालोलुपता, दोहरे मापदंड अपनाने और पार्टी में गुटबाजी को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। पार्टी स्थाई समिति की एक सदस्य अस्त लक्ष्मी शाक्य का कहना है कि प्रधानमंत्री को ये हक तो है कि वह अपने विचार रखे, लेकिन बाकी दस्तावेजों और रिपोर्ट पर बहस या चर्चा को वह नहीं रोक सकता।
जाहिर है इन दोनों नेताओं की आपसी जंग और लगातार नेपाली मीडिया की सुर्खियां बने रहने से राजशाही समर्थक खेमा पिछले कुछ महीनों से बेहद सक्रिय हो गया है। काठमांडू की सड़कों के अलावा देश के कई हिस्सों में पिछले दिनों ‘राजा वापस आओ, नेपाल को बचाओ’ जैसे नारे के साथ प्रदर्शन हुए। वामपंथी बुद्धिजीवियों ने इसे चिंताजनक भी माना है और इसे नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के गंभीर भीतरी अंतर्विरोध का नतीजा भी।