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Nepal Politics: देउबा की राह में अड़चन बने उनकी पार्टी के ही नेता, आगे राह आसान नहीं

Fri, 23 Dec 2022 04:32 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 23 Dec 2022 04:32 PM IST
सार

Nepal Politics: शेखर कोइराला ने पिछले साल देउबा के खिलाफ नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा था। तब वे हार गए थे। तब से उन्होंने अपना ध्यान पार्टी संगठन पर केंद्रित कर रखा है...

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Nepal Politics: leaders of his own party becomes an obstacle in sher bahadur Deuba way
Nepal Politics: Sher Bahadur Deuba - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

नेपाली कांग्रेस पार्टी (Nepal Politics) के संसदीय दल का फिर से नेता चुन लिए जाने के बावजूद प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की आगे की राह आसान नहीं है। ऐसा संकेत उनकी पार्टी के अंदर चल रही गतिविधियों से मिला है। देउबा ने बुधवार को संसदीय दल के नेता पद के चुनाव में पार्टी के महासचिव गगन थापा को हराया था। अब खबर है कि देउबा और नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शेखर कोइराला ने पार्टी के देउबा गुट के खिलाफ मोर्चाबंदी कर ली है।

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थापा ने एलान कर दिया है कि वे अगली सरकार में शामिल नहीं होंगे, चाहे उसका नेतृत्व देउबा करें या फिर सत्ताधारी गठबंधन में शामिल किसी दूसरी पार्टी का नेता। उन्होंने कहा- ‘मैं पीढ़ी परिवर्तन के पक्ष में हूं।’ उनका इशारा 76 वर्षीय देउबा की उम्र की तरफ था। थापा 46 साल के हैं। पार्टी के एक अन्य महासचिव विश्व प्रकाश शर्मा ने भी एलान कर दिया है कि वे अगली सरकार में मंत्री नहीं बनेंगे। नेता पद के चुनाव में शर्मा ने थापा को अपना सक्रिय समर्थन दिया था।

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शेखर कोइराला ने पिछले साल देउबा के खिलाफ नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा था। तब वे हार गए थे। तब से उन्होंने अपना ध्यान पार्टी संगठन पर केंद्रित कर रखा है। उनके निजी सचिव दिनेश चंद्र थपालिया ने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘कोइराला की सरकार में शामिल होने में कोई दिलचस्पी नहीं है। वे अपना ज्यादा समय पार्टी को देना चाहते है। अगर अगली सरकार में सम्मानजनक मंत्रालय दिए गए, तो वे इनके लिए अन्य नेताओं के नाम प्रस्तावित करेंगे।’

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कोइराला, थापा और शर्मा तीनों नेपाली कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में हैं। विश्लेषकों के मुताबिक उनका सरकार से बाहर रहने का फैसला साफ तौर पर देउबा पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है। तीनों नेताओं की समझ है कि सरकार से बाहर रहते हुए वे यह काम बेहतर ढंग से कर पाएंगे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों में आम राय है कि तीनों नेताओं के इस रुख से देउबा की राह मुश्किल हो जाएगी।

राजनीतिक विश्लेषक अनिरुद्ध गौतम ने काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘हालांकि संसदीय दल के चुनाव में देउबा ने थापा को भारी बहुमत से हराया, लेकिन विरोधी गुट को नजरअंदाज कर पार्टी का नेतृत्व करना देउबा के लिए कठिन होगा।’ बुधवार को संसदीय दल का चुनाव हराने के बाद थापा ने देउबा को सीधी चेतावनी दी थी कि वे बिना पार्टी को भरोसे लिए राष्ट्रपति या कोई अन्य पद देने के बारे में दूसरे दलों से कोई वादा ना करेँ। थापा ने कहा- ‘अगर इन पदों के बारे में फैसले बंद कमरों के भीतर किए गए, तो उनका पालन करने के लिए पार्टी बाध्य नहीं होगी।’

इस बीच संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद से देउबा नई सरकार बनाने की गतिविधियों में जुटे हुए हैं। राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने 25 दिसंबर तक सरकार बनाने के लिए अपना दावा पेश करने की समयसीमा सभी दलों को दी है। विश्लेषकों के मुताबिक नेपाली कांग्रेस में उभरे विरोध का असर देउबा के रसूख पर पड़ सकता है। इससे साथी दलों के बीच उनकी सौदेबाजी की क्षमता घट सकती है।

 

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