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एक्सप्लेनर: नेपाल में अभी नहीं टला है खतरा, चीन ने क्यों किया आगाह; क्या भारत भी संकट की जद में, अब आगे क्या?
Thu, 27 Aug 2026 08:05 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Thu, 27 Aug 2026 08:05 PM IST
सार
नेपाल में 10 घंटे के अंदर स्थितियां कैसे बिगड़ गईं? इस आपदा के बाद अभी भी नेपाल को सतर्क क्यों रखा गया है? चीन ने किस खतरे को लेकर क्या चेतावनी दी है? हिमालयी क्षेत्र क्यों इतना संवेदनशील है और नेपाल इससे सबसे ज्यादा खतरे में क्यों बना हुआ है? आइये जानते हैं...
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भोटेकोशी नदी में बाढ़।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
नेपाल में बुधवार (27 अगस्त) को भोटेकाशी नदी में आई भारी बाढ़ ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। दरअसल, हिमालयी क्षेत्र में आई किसी आपदा का असर नेपाल तक होगा, इसकी वैज्ञानिकों को आशंका तो थी, लेकिन तिब्बत में एक हिमस्खलन तबाही की विकरालता को इस कदर बढ़ा देगा, यह अनुमान लगाना भी मुश्किल था। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो अब तक 359 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 1000 लोग लापता हैं, जिनमें 288 भारतीय भी शामिल हैं। माना जा रहा है कि आपदा के बाद स्थितियां सामान्य होने के साथ ही इस आंकड़े में और स्पष्टता आएगी।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर नेपाल में 10 घंटे के अंदर स्थितियां कैसे बिगड़ गईं? इस आपदा के बाद अभी भी नेपाल को सतर्क क्यों रखा गया है? चीन ने किस खतरे को लेकर क्या चेतावनी दी है? हिमालयी क्षेत्र क्यों इतना संवेदनशील है और नेपाल इससे सबसे ज्यादा खतरे में क्यों बना हुआ है? आइये जानते हैं...
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर नेपाल में 10 घंटे के अंदर स्थितियां कैसे बिगड़ गईं? इस आपदा के बाद अभी भी नेपाल को सतर्क क्यों रखा गया है? चीन ने किस खतरे को लेकर क्या चेतावनी दी है? हिमालयी क्षेत्र क्यों इतना संवेदनशील है और नेपाल इससे सबसे ज्यादा खतरे में क्यों बना हुआ है? आइये जानते हैं...
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नेपाल में कैसे 10 घंटे के अंदर बिगड़ गई पूरी स्थिति?
नेपाल के रसुवा जिले में भोटकोशी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ के दौरान सुबह 8:37 बजे से शाम 6:30 बजे के बीच यानी लगभग 10 घंटे में स्थितियां बहुत तेजी से बिगड़ती चली गईं। बाढ़ का यह पानी भोटकोशी से होते हुए त्रिशूली, मलेखु और देवघाट तक पहुंच गया।सुबह 08:37 बजे: तिब्बत क्षेत्र में हिमस्खलन के चलते भूमिगत हलचल दर्ज की गई। बर्फ और चट्टान के इस मलबे ने नेपाल-चीन सीमा पर बहने वाली ल्हेन्दे नदी को अवरुद्ध कर दिया, जिससे वहां एक अस्थायी प्राकृतिक बांध बन गया।
सुबह 08:40 बजे: रसुवा के स्याफ्रुबेंसी में जल-स्तर की निगरानी करने वाले स्टेशन ने अपना अंतिम डेटा दर्ज किया, जिसमें नदी का स्तर 1.62 मीटर था।
सुबह 08:50 बजे: हिमस्खलन के बाद हुई भूमिगत हलचल के ठीक 13 मिनट बाद स्याफ्रुबेंसी मॉनिटरिंग स्टेशन ने काम करना बंद कर दिया और डेटा ट्रांसमिशन रुक गया।
सुबह 09:05 बजे: अधिकारियों को सूचना मिली कि तिब्बत की तरफ से भोटकोशी नदी में एक बहुत बड़ी बाढ़ की लहर घुस चुकी है।
नेपाल में भोटेकोशी नदी में बाढ़ की पूरी टाइमलाइन।
- फोटो : अमर उजाला
सुबह 09:15- 09:16 बजे: खतरे को देखते हुए अधिकारियों ने त्वरित कार्रवाई की। रसुवा, नुवाकोट, धादिंग और चितवन के नदी तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को 6,00,000 से अधिक चेतावनी एसएमएस भेजे गए, ताकि वे सतर्क हो सकें।
सुबह 09:20 बजे: बेत्रावती जल-स्तर मॉनिटरिंग स्टेशन ने भी डेटा भेजना बंद कर दिया। इसका आखिरी दर्ज जल-स्तर 3.55 मीटर था।
सुबह 10:28 बजे: बाढ़ के धादिंग-गल्छी क्षेत्र में पहुंचने और कुछ ही घंटों में मुगलिन पार करने की आशंका जताई गई। इसके बाद पृथ्वी राजमार्ग, मुगलिन-नारायणघाट सड़क पर यात्रा करने वालों तथा त्रिशूली नदी किनारे बसे लोगों के लिए अतिरिक्त चेतावनियां जारी की गईं।
सुबह 11:26-11.50 बजे: फुर्के (मलेखु) मॉनिटरिंग स्टेशन पर पानी का स्तर खतरे के निशान से ऊपर चला गया। बाढ़ के प्रचंड वेग ने फुर्के नदी के पक्के पुल और अन्य संरचनाओं को बहा दिया। इसी दौरान बाढ़ का पानी मलेखु क्षेत्र में प्रवेश कर गया।
सुबह 09:20 बजे: बेत्रावती जल-स्तर मॉनिटरिंग स्टेशन ने भी डेटा भेजना बंद कर दिया। इसका आखिरी दर्ज जल-स्तर 3.55 मीटर था।
सुबह 10:28 बजे: बाढ़ के धादिंग-गल्छी क्षेत्र में पहुंचने और कुछ ही घंटों में मुगलिन पार करने की आशंका जताई गई। इसके बाद पृथ्वी राजमार्ग, मुगलिन-नारायणघाट सड़क पर यात्रा करने वालों तथा त्रिशूली नदी किनारे बसे लोगों के लिए अतिरिक्त चेतावनियां जारी की गईं।
सुबह 11:26-11.50 बजे: फुर्के (मलेखु) मॉनिटरिंग स्टेशन पर पानी का स्तर खतरे के निशान से ऊपर चला गया। बाढ़ के प्रचंड वेग ने फुर्के नदी के पक्के पुल और अन्य संरचनाओं को बहा दिया। इसी दौरान बाढ़ का पानी मलेखु क्षेत्र में प्रवेश कर गया।
दोपहर 01:00 बजे: अधिकारियों को पुष्टि मिली कि बाढ़ मुगलिन को पार कर चुकी है। देवघाट तक के निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की गई। देवघाट में नदी का स्तर 4.76 मीटर तक पहुंच गया।
दोपहर 02:14 बजे: कालीखोला मॉनिटरिंग स्टेशन पर पानी का स्तर खतरे के निशान से ऊपर चला गया, जिसने 12.3 मीटर का उच्चतम स्तर छुआ।
दोपहर 03:20 बजे: बाढ़ का पानी नारायणी-देवघाट क्षेत्र तक पहुंच गया और जल-स्तर लगातार बढ़ता रहा।
शाम 04:00 बजे: देवघाट में पानी का स्तर 6.57 मीटर के अपने उच्चतम शिखर पर पहुंचा और इसके बाद पानी धीरे-धीरे कम होना शुरू हुआ।
शाम 06:30 बजे: देवघाट में जल-स्तर घटकर वापस 4 मीटर पर आ गया और स्थिति कुछ सामान्य हुई।
इस 10 घंटे के विनाशकारी बहाव में बाढ़ के पानी ने अपने साथ लगभग दो करोड़ घन मीटर अतिरिक्त पानी का बहाव लाया था। बाढ़ की चपेट में आने से नदी किनारे बसे कई महत्वपूर्ण जल-स्तर मॉनिटरिंग स्टेशन तबाह हो गए, जिससे डेटा संपर्क टूट गया। इसके अलावा रास्ते में आने वाले कई पक्के पुल, सड़कें और अहम पनबिजली परियोजनाएं पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं।
दोपहर 02:14 बजे: कालीखोला मॉनिटरिंग स्टेशन पर पानी का स्तर खतरे के निशान से ऊपर चला गया, जिसने 12.3 मीटर का उच्चतम स्तर छुआ।
दोपहर 03:20 बजे: बाढ़ का पानी नारायणी-देवघाट क्षेत्र तक पहुंच गया और जल-स्तर लगातार बढ़ता रहा।
शाम 04:00 बजे: देवघाट में पानी का स्तर 6.57 मीटर के अपने उच्चतम शिखर पर पहुंचा और इसके बाद पानी धीरे-धीरे कम होना शुरू हुआ।
शाम 06:30 बजे: देवघाट में जल-स्तर घटकर वापस 4 मीटर पर आ गया और स्थिति कुछ सामान्य हुई।
इस 10 घंटे के विनाशकारी बहाव में बाढ़ के पानी ने अपने साथ लगभग दो करोड़ घन मीटर अतिरिक्त पानी का बहाव लाया था। बाढ़ की चपेट में आने से नदी किनारे बसे कई महत्वपूर्ण जल-स्तर मॉनिटरिंग स्टेशन तबाह हो गए, जिससे डेटा संपर्क टूट गया। इसके अलावा रास्ते में आने वाले कई पक्के पुल, सड़कें और अहम पनबिजली परियोजनाएं पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं।
नेपाल में भोटेकोशी नदी में आई बाढ़।
- फोटो : अमर उजाला
आपदा के बाद अभी भी नेपाल को सतर्क क्यों रखा गया है?
भोटकोशी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ के थमने के बाद भी नेपाल में खतरा पूरी तरह टला नहीं है और देश को अभी भी अलर्ट पर रखा गया है। खुद चीन ने भी आने वाले समय में नेपाल में एक और जबरदस्त बाढ़ आने की संभावना जताई है।अस्थायी बैरियर लेक का गंभीर खतरा
नेपाल-चीन सीमा के पास छोचेन खोला और पुरेपू सांगपो नदियों के संगम पर भूस्खलन और मलबे के कारण एक विशाल बैरियर लेक यानी अस्थायी झील बन गई है। चीन की सरकार के मुताबिक, इस कृत्रिम झील में लगभग 20 लाख घन मीटर पानी जमा हो चुका है और यह ऊपर से बहने लगी है। अगले कुछ दिनों में इसमें 30 लाख घन मीटर अतिरिक्त पानी आने की आशंका है, जिससे इस कृत्रिम रूप से बने इस अस्थायी बांध के टूटने का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ गया है। अगर यह टूटता है, तो निचले इलाकों में अचानक फिर से विनाशकारी बाढ़ आ सकती है।
नदियों में जमा मलबे से 'लैंडस्लाइड डैम' बनने की आशंका
इस भीषण आपदा के दौरान भारी मात्रा में बहकर आए मलबे और चट्टानों ने नदियों के संकरे रास्तों को रोक कर दिया है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटिग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के वैज्ञानिकों को आशंका है कि त्रिशूली नदी के संकरे हिस्सों में इस मलबे के जमा होने से अस्थायी लैंडस्लाइड बांध बन रहे हैं। अगर ये प्राकृतिक अवरोध अचानक टूटते हैं, तो यह बाढ़ की एक और विनाशकारी दूसरी लहर को जन्म दे सकते हैं।
बाढ़ की दूसरी और तीसरी लहर की आशंका
त्रिभुवन विश्वविद्यालय के आपदा अध्ययन केंद्र के निदेशक बसंत राज अधिकारी के मुताबिक, हालांकि अभी बारिश बहुत तेज नहीं है, फिर भी अस्थिर ढलानों के कारण और भूस्खलन होने की आशंका बनी हुई है। इस वजह से बाढ़ की दूसरी और तीसरी लहर आने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही नेपाल के गृह मंत्री सुदन गुरुंग के मुताबिक, ल्हेन्दे खोला अभी भी पूरी तरह से साफ नहीं हुआ है, जिससे पानी का बहाव कभी भी अचानक बाधित या तीव्र हो सकता है।
तापमान वृद्धि और ढलते पहाड़ों की अस्थिरता
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ता तापमान इस खतरे को लगातार बढ़ा रहा है। तापमान बढ़ने से ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में जमी हुई जमीन पिघल रही है, जिससे पहाड़ी ढलानों को आपस में बांधने वाली बर्फ कमजोर हो रही है और चट्टानें अस्थिर हो रही हैं। इससे नए हिमस्खलन और ग्लेशियर टूटने की संभावना लगातार बनी हुई है।
वास्तविक समय में चेतावनी देने वाली व्यवस्था की कमी
नेपाल और चीन के बीच सीमा पार वास्तविक समय में जल-स्तर या हिमनद गतिविधि का डेटा साझा करने के लिए कोई सक्रिय और सीधा डिजिटल पूर्व चेतावनी तंत्र नहीं है। नेपाली अधिकारियों को अक्सर आपदा की जानकारी पूर्वानुमान एजेंसियों के बजाय सीधे सीमा पर तैनात सुरक्षाकर्मियों के जरिए मिलती है, जिससे सुरक्षित स्थानों पर जाने के लिए बहुत कम समय बच पाता है। इस अनिश्चितता के कारण भी प्रशासन और नागरिकों को लगातार सतर्क रहने के लिए कहा गया है।
त्रिभुवन विश्वविद्यालय के आपदा अध्ययन केंद्र के निदेशक बसंत राज अधिकारी के मुताबिक, हालांकि अभी बारिश बहुत तेज नहीं है, फिर भी अस्थिर ढलानों के कारण और भूस्खलन होने की आशंका बनी हुई है। इस वजह से बाढ़ की दूसरी और तीसरी लहर आने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही नेपाल के गृह मंत्री सुदन गुरुंग के मुताबिक, ल्हेन्दे खोला अभी भी पूरी तरह से साफ नहीं हुआ है, जिससे पानी का बहाव कभी भी अचानक बाधित या तीव्र हो सकता है।
तापमान वृद्धि और ढलते पहाड़ों की अस्थिरता
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ता तापमान इस खतरे को लगातार बढ़ा रहा है। तापमान बढ़ने से ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में जमी हुई जमीन पिघल रही है, जिससे पहाड़ी ढलानों को आपस में बांधने वाली बर्फ कमजोर हो रही है और चट्टानें अस्थिर हो रही हैं। इससे नए हिमस्खलन और ग्लेशियर टूटने की संभावना लगातार बनी हुई है।
वास्तविक समय में चेतावनी देने वाली व्यवस्था की कमी
नेपाल और चीन के बीच सीमा पार वास्तविक समय में जल-स्तर या हिमनद गतिविधि का डेटा साझा करने के लिए कोई सक्रिय और सीधा डिजिटल पूर्व चेतावनी तंत्र नहीं है। नेपाली अधिकारियों को अक्सर आपदा की जानकारी पूर्वानुमान एजेंसियों के बजाय सीधे सीमा पर तैनात सुरक्षाकर्मियों के जरिए मिलती है, जिससे सुरक्षित स्थानों पर जाने के लिए बहुत कम समय बच पाता है। इस अनिश्चितता के कारण भी प्रशासन और नागरिकों को लगातार सतर्क रहने के लिए कहा गया है।
भोटेकोशी नदी का पूरा भूगोल।
- फोटो : अमर उजाला
हिमालयी क्षेत्र क्यों इतना संवेदनशील है?
नेपाल में आई इस भीषण बाढ़ और आगे भी खतरा बरकरार रहने की एक बड़ी वजह यह है कि हिमालयी क्षेत्र और उसके आसपास का इलाका दुनिया के सबसे संवेदनशील और आपदा-संभावित क्षेत्रों में से एक है। यह संवेदनशीलता किसी एक कारण से नहीं, बल्कि इसकी अनोखी भौगोलिक बनावट, जमीन के अंदर चल रही गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन के मिले-जुले प्रभावों का परिणाम है।1. बेहद संकीर्ण भौगोलिक बनावट
नेपाल की भौगोलिक बनावट बेहद अनोखी है। जहां नेपाल के दक्षिण में तराई के मैदानी इलाके समुद्र तल से लगभग 60 मीटर ऊपर हैं तो वहीं उत्तर में दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट समुद्र तल से 8,848.86 मीटर ऊपर है। इन दोनों क्षेत्रों की हवाई दूरी महज 150 से 250 किलोमीटर ही है। इस तीव्र ढलान की वजह से पानी, मलबे और विशालकाय चट्टानों का बहाव बहुत भयानक गति से नीचे की ओर होता है। इसके अलावा यहां बहने वाली 6,000 से ज्यादा नदियां और नाले मानसून (जून-सितंबर) के दौरान भारी बारिश से उफान पर आ जाते हैं।
2. लगातार टकराती टेक्टॉनिक प्लेटें और भूकंपीय गतिविधि
हिमालय का क्षेत्र भारतीय और यूरेशियाई टेक्टॉनिक (विवर्तनिक) प्लेट्स के मिलने वाले बिंदु पर स्थित है। ये प्लेट्स हर साल 20 से 21 मिलीमीटर की दर से आपस में टकरा रही हैं। इस लगातार हो रही टक्कर की वजह से हिमालय पर्वत श्रृंखला आज भी हर साल लगभग 5 मिलीमीटर की दर से ऊपर उठ रही है, जिससे इस क्षेत्र के पहाड़ों में बेहद तीखा खिंचाव और दबाव जमा होता रहता है।
यह भारी खिंचाव भूकंप के रूप में अक्सर बाहर आता है। वर्ष 2015 के विनाशकारी गोरखा भूकंप (7.8 तीव्रता) के बाद से इस पूरे क्षेत्र की पहाड़ी ढलानें बेहद कमजोर और अस्थिर हो चुकी हैं। अब छोटे-छोटे भूकंपीय झटके या पहाड़ी हलचलें भी ढलानों को आसानी से गिराकर नदियों का रास्ता रोक देती हैं।
3. जलवायु परिवर्तन और परमाफ्रॉस्ट का पिघलना
ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन ने इस पहाड़ी क्षेत्र को बेहद नाजुक बना दिया है। साल 2000 के बाद से पूरे हिंदूकुश हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने की दर दोगुनी हो गई है। 2023 की संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल के पहाड़ों ने पिछले 30 वर्षों में अपनी लगभग एक-तिहाई बर्फ खो दी है।
अब तापमान बढ़ने के कारण ऊंचे पहाड़ों में जमी हुई जमीन जिसे परमाफ्रॉस्ट कहा जाता है लगातार पिघल रही है। यह जमी हुई बर्फ असल में पहाड़ी चट्टानों को आपस में बांधकर रखने वाले प्राकृतिक सीमेंट का काम करती है। इसके पिघलने से पहाड़ों की संरचनात्मक स्थिरता कमजोर हो जाती है, जिससे हिमस्खलन और बड़ी चट्टानों के टूटने की घटनाएं बहुत ज्यादा बढ़ गई हैं।
हिमालय का क्षेत्र भारतीय और यूरेशियाई टेक्टॉनिक (विवर्तनिक) प्लेट्स के मिलने वाले बिंदु पर स्थित है। ये प्लेट्स हर साल 20 से 21 मिलीमीटर की दर से आपस में टकरा रही हैं। इस लगातार हो रही टक्कर की वजह से हिमालय पर्वत श्रृंखला आज भी हर साल लगभग 5 मिलीमीटर की दर से ऊपर उठ रही है, जिससे इस क्षेत्र के पहाड़ों में बेहद तीखा खिंचाव और दबाव जमा होता रहता है।
यह भारी खिंचाव भूकंप के रूप में अक्सर बाहर आता है। वर्ष 2015 के विनाशकारी गोरखा भूकंप (7.8 तीव्रता) के बाद से इस पूरे क्षेत्र की पहाड़ी ढलानें बेहद कमजोर और अस्थिर हो चुकी हैं। अब छोटे-छोटे भूकंपीय झटके या पहाड़ी हलचलें भी ढलानों को आसानी से गिराकर नदियों का रास्ता रोक देती हैं।
3. जलवायु परिवर्तन और परमाफ्रॉस्ट का पिघलना
ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन ने इस पहाड़ी क्षेत्र को बेहद नाजुक बना दिया है। साल 2000 के बाद से पूरे हिंदूकुश हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने की दर दोगुनी हो गई है। 2023 की संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल के पहाड़ों ने पिछले 30 वर्षों में अपनी लगभग एक-तिहाई बर्फ खो दी है।
अब तापमान बढ़ने के कारण ऊंचे पहाड़ों में जमी हुई जमीन जिसे परमाफ्रॉस्ट कहा जाता है लगातार पिघल रही है। यह जमी हुई बर्फ असल में पहाड़ी चट्टानों को आपस में बांधकर रखने वाले प्राकृतिक सीमेंट का काम करती है। इसके पिघलने से पहाड़ों की संरचनात्मक स्थिरता कमजोर हो जाती है, जिससे हिमस्खलन और बड़ी चट्टानों के टूटने की घटनाएं बहुत ज्यादा बढ़ गई हैं।
नेपाल में बाढ़ से त्रासदी
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
हिमालय से आने वाला खतरा जानलेवा क्यों बनता जा रहा?
हिमालय में प्राकृतिक बदलावों का असर इससे जुड़े देशों पर भी लगातार देखा जा रहा है। इसकी कुछ अहम वजहें हैं...हिमनद झीलों का खतरा दूसरे देशों तक फैलने का संकट
ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से जैसे-जैसे ग्लेशियर पीछे खिसक रहे हैं, उनके पीछे चट्टानों और मलबे के प्राकृतिक अवरोधों की वजह से बड़ी-बड़ी हिमनद झीलें बन जाती हैं। अगर ये प्राकृतिक अवरोध अचानक टूटते हैं, तो हिमनद झील विस्फोट बाढ़ का रूप लेकर भारी तबाही मचाती हैं। यह अलग-अलग देशों को प्रभावित कर सकता है। जैसा कि चीन स्थित तिब्बत में हुआ और इसका असर नेपाल तक देखा गया।
एक वैज्ञानिक सूची के मुताबिक, नेपाल, भारत और चीन के तिब्बत में कुल 3,624 हिमनद झीलें हैं। इनमें से 47 झीलों को विस्फोट के जबरदस्त खतरे में होने की बात कही गई है। इसके अलावा, ग्लेशियरों की सतह पर बनने वाली अस्थायी झीलें भी कुछ ही सीजन में अचानक बनकर बिना चेतावनी के बह जाती हैं, जिससे अचानक भारी बाढ़ आ जाती है।
अव्यवस्थित बुनियादी ढांचा और विकास गतिविधियां
प्रकृति के इन खतरों को हिमालयी क्षेत्र में लगातार जारी मानवीय दखल और बुनियादी ढांचों की अव्यवस्था और अधिक विनाशकारी बना देती है। मैदानी क्षेत्रों की कमी की वजह से नेपाल में बस्तियां और सड़कें अक्सर नदियों के संकरे रास्तों और बेहद संवेदनशील पहाड़ी ढलानों को काटकर बनाई जा रही हैं।
यहां तक कि चीन-नेपाल व्यापार गलियारों के तहत शुष्क बंदरगाह (ड्राई पोर्ट्स), सीमा शुल्क चौकियां, जैसे- रसुवागढी के समीप तिमुरे चौकी और नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए अहम पनबिजली परियोजनाएं भी नदी के बहाव क्षेत्रों और संवेदनशील घाटियों में ही स्थित हैं। आपदा आने पर ये बुनियादी ढांचे भारी नुकसान का सामना करते हैं और मलबे को नदी में बढ़ाकर बाढ़ की तीव्रता को और खतरनाक बना देते हैं।
मजबूत सीमा पार चेतावनी प्रणाली की कमी भी बन रही खतरा
चूंकि इन नदियों और ग्लेशियरों का एक बड़ा हिस्सा तिब्बत (चीन) में स्थित है और वे बहकर नेपाल में आते हैं, इसलिए तात्कालिक पूर्व चेतावनी का तंत्र बेहद अहम है। हालांकि, नेपाल और चीन के बीच वास्तविक समय में मौसम और हिमनद गतिविधि का डेटा साझा करने के लिए कोई सक्रिय और सीधा डिजिटल पूर्व चेतावनी तंत्र उपलब्ध नहीं है। आपदा की शुरुआती जानकारी अक्सर सीमा सुरक्षाकर्मियों से बहुत देर से मिलती है, जिससे निचले इलाकों के लोगों को बचने का बहुत कम समय मिलता है। नेपाल के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। चीन पर निर्भर होने और उससे देरी से जानकारी मिलना भी नेपाल को मुश्किल में डाल गया।
प्रकृति के इन खतरों को हिमालयी क्षेत्र में लगातार जारी मानवीय दखल और बुनियादी ढांचों की अव्यवस्था और अधिक विनाशकारी बना देती है। मैदानी क्षेत्रों की कमी की वजह से नेपाल में बस्तियां और सड़कें अक्सर नदियों के संकरे रास्तों और बेहद संवेदनशील पहाड़ी ढलानों को काटकर बनाई जा रही हैं।
यहां तक कि चीन-नेपाल व्यापार गलियारों के तहत शुष्क बंदरगाह (ड्राई पोर्ट्स), सीमा शुल्क चौकियां, जैसे- रसुवागढी के समीप तिमुरे चौकी और नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए अहम पनबिजली परियोजनाएं भी नदी के बहाव क्षेत्रों और संवेदनशील घाटियों में ही स्थित हैं। आपदा आने पर ये बुनियादी ढांचे भारी नुकसान का सामना करते हैं और मलबे को नदी में बढ़ाकर बाढ़ की तीव्रता को और खतरनाक बना देते हैं।
मजबूत सीमा पार चेतावनी प्रणाली की कमी भी बन रही खतरा
चूंकि इन नदियों और ग्लेशियरों का एक बड़ा हिस्सा तिब्बत (चीन) में स्थित है और वे बहकर नेपाल में आते हैं, इसलिए तात्कालिक पूर्व चेतावनी का तंत्र बेहद अहम है। हालांकि, नेपाल और चीन के बीच वास्तविक समय में मौसम और हिमनद गतिविधि का डेटा साझा करने के लिए कोई सक्रिय और सीधा डिजिटल पूर्व चेतावनी तंत्र उपलब्ध नहीं है। आपदा की शुरुआती जानकारी अक्सर सीमा सुरक्षाकर्मियों से बहुत देर से मिलती है, जिससे निचले इलाकों के लोगों को बचने का बहुत कम समय मिलता है। नेपाल के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। चीन पर निर्भर होने और उससे देरी से जानकारी मिलना भी नेपाल को मुश्किल में डाल गया।
नेपाल से भारत आने वाली नदियां।
- फोटो : अमर उजाला
क्या भविष्य में भारत पर भी आ सकता है ऐसा खतरा?
- भारत में बिहार की कई नदियों का सीधा नेपाल से आने वाली नदियों से जुड़ाव है। उदाहरण के लिए नेपाल की भोटेकोशी नदी आगे चलकर त्रिशूली और फिर देवघाट पर नारायणी नदी में मिल जाती है। यही नारायणी नदी जब नेपाल की सीमा पार कर भारत में प्रवेश करती है, तो इसे गंडक नदी के नाम से जाना जाता है।
- तिब्बत या नेपाल के ग्लेशियरों या अस्थायी झीलों (जैसे वर्तमान में बनी बैरियर लेक) में होने वाले किसी भी बड़े विस्फोट का पानी नेपाल में तबाही मचाने के बाद सीधे बिहार के मैदानी क्षेत्रों तक पहुंचता है। तिब्बत की किसी अनियंत्रित झील के टूटने का खामियाजा अंततः बिहार के मैदानी इलाकों को उठाना पड़ता है।
- संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और आईसीआईएमओडी के वर्ष 2020 के एक सर्वेक्षण के मुताबिक, कोशी-गंडकी-करनाली बेसिन में 3,624 हिमनद झीलों में 47 झीलों को विस्फोट के खतरे वाले वर्ग में रखा गया है। इनमें 25 तिब्बत में, 21 नेपाल में और एक खतरनाक झील सीधे भारत के अंदर स्थित है।
अतीत में भी भारत इस तरह की तबाही झेल चुका है। साल 2023 में भारत के पूर्वोत्तर राज्य सिक्किम में आई बाढ़ की वजह हिमनद झील विस्फोट ही था। वैज्ञानिक चेताते हैं कि तिब्बत (चीन), नेपाल और भारत के बीच आपस में जुड़ी नदी प्रणालियों के बावजूद, सीमा-पार वास्तविक समय में मौसम, हिमनद गतिविधि या नदियों के जल-स्तर का डेटा साझा करने के लिए कोई मजबूत और सीधा त्रिपक्षीय डिजिटल चेतावनी तंत्र कार्यरत नहीं है।