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...और अब एवरेस्ट की ऊंचाई मापने को लेकर करीब आए नेपाल और चीन
Tue, 08 Dec 2020 03:23 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Tue, 08 Dec 2020 03:23 PM IST
सार
- तीन साल में मतभेद हुए दूर, दोनों देशों ने मिलकर एवरेस्ट की ऊंचाई मापने पर जताई थी रजामंदी
- तमाम देशों के प्रस्ताव को ठुकरा कर नेपाल ने चीन के साथ मिलाया हाथ
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Mount Everest
- फोटो : RONB
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विस्तार
दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट की ऊंचाई के बारे में नेपाल और चीन के बीच बनी सहमति को दोनों देशों के बीच गहरा रहे रिश्तों की एक और मिसाल माना जा रहा है। 2017 में इस मामले में दोनों देशों के बीच गहरे मतभेद पैदा हो गए थे। तब नेपाल ने अपनी तरफ से एवरेस्ट की ऊंचाई नापने का काम शुरू किया था। लेकिन बाद में दोनों देशों के बीच संयुक्त रूप से ये काम करने पर रजामंदी हुई। आखिरकार इस साझा प्रयास के नतीजों का अब एलान किया जा रहा है।
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बताया जाता है कि कई दूसरे देशों ने भी इस काम में नेपाल की मदद करने की पेशकश की थी। लेकिन नेपाल ने इसे अस्वीकार कर दिया। जिन देशों ने पेशकश की उनमें भारत, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन भी शामिल हैं। इन सभी देशों के पास इस काम को संपन्न करने की पूरी क्षमता है। लेकिन आरोप है कि चीन ने नेपाल पर दबाव डाला कि वह इस काम में किसी और की मदद ना ले। आखिरकार वह अपनी बात मनवाने में सफल रहा।
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बताया जाता है कि पिछले साल जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग नेपाल यात्रा पर आए, तो एवरेस्ट की साझा माप पर सहमति बनाना उनका एक प्रमुख एजेंडा था। तब पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया था कि चीन अपनी तरफ से भी यह काम कर सकता था। उसने 2018 में इसकी शुरुआत भी कर दी थी।
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लेकिन चूंकि यह चोटी नेपाल में भी पड़ती है, इसलिए चीन की माप को विश्वसनीय नहीं माना जाता। नेपाल में इस चोटी को सागरमाथा कहा जाता है। इसीलिए इस काम में चीन ने नेपाल को साथ लेने की कोशिश की और इसमें कामयाब रहा।
एवरेस्ट की ऊंचाई सबसे पहले 1849 में ब्रिटिश विशेषज्ञों ने नापी थी। 1849 से 1855 तक भारत के देहरादून से इसकी निगरानी की जाती थी। लेकिन तब यह नहीं मालूम था कि हिमालय पर्वत पर मौजूद यह चोटी दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है। इसे नापने वाले ब्रिटिश दल का नेतृत्व भारत स्थित ब्रिटिश सर्वेयर जनरल सर जॉर्ज एवरेस्ट ने किया था। पहले इस चोटी को ‘पीक-एक्स वी’ कहा गया था, लेकिन बाद में जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर ही इसका नाम रख दिया गया। तब हुई माप में इस चोटी की ऊंचाई समुद्र तल से 29,002 फीट मापी गई।
भारत की आजादी के बाद बिहार की तरफ से इसे फिर से नापा गया। 1954 में हुए इस कार्य के बाद एवरेस्ट की ऊंचाई 29,028 फीट बताई गई। यही ऊंचाई आज तक मान्य है। लेकिन चीन के सर्वे ब्यूरो ने 2005 में अपनी तरफ से ऊंचाई मापी। उसने बताया कि एवरेस्ट की पठारीय ऊंचाई 8,844.43 मीटर है। लेकिन नेपाल इस निष्कर्ष से सहमत नहीं था।
कई भू-गर्भीय विशेषज्ञों का कहना है कि धीरे-धीरे एवरेस्ट की ऊंचाई में बदलाव आता गया। खासकर नेपाल में 2015 में आए भूकंप के बाद ऐसा होने का अनुमान लगाया जा रहा था। इसीलिए चीन और नेपाल ने साझा तौर पर इसकी माप करने का फैसला किया।
एवरेस्ट पर सबसे पहले नेपाली शेरपा तेनजिंग और न्यूजीलैंड के पर्वतारोही एडमंड हिलेरी चढ़ने में कामयाब रहे थे। उसके बाद से 6,507 पर्वतारोही इस पर चढ़ चुके हैं। इसके बावजूद एवरेस्ट को लेकर रोमांच और रहस्य कम नहीं हुआ है।