म्यांमार: सू ची से अब कहीं ज्यादा बड़ा हो गया है लोकतंत्र समर्थक आंदोलन, आम लोगों ने संभान कमान
विश्लेषकों का कहना है कि सू ची की आज भी म्यांमार में व्यापक लोकप्रियता है। उनकी राय देश में मायने रखती है। लेकिन दस महीने पहले जब सैनिक तख्तापलट हुआ, तो उसके खिलाफ तब से चले आंदोलन का नेतृत्व वे नहीं कर रही थीं। ये आंदोलन आम लोग अपनी पहल पर चला रहे हैं। इसलिए उन्हें सजा सुनाए जाने से सैनिक शासन के प्रतिरोध पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा...
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म्यांमार में लोकतंत्र की प्रतीक समझी जाने वाली नेता आंग सान सू ची को दो साल की कैद सुनाए जाने को लेकर म्यांमार के सैनिक शासकों की तीखी अंतरराष्ट्रीय आलोचना हुई है। इस बीच म्यांमार के सैनिक शासन विरोधी आंदोलनकारियों ने साफ किया है कि इस सजा से उनके इरादे पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। वे लोकतंत्र बहाली के लिए अपना संघर्ष जारी रखेंगे।
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकारों के लिए विशेष रैपोटियर टॉम एंड्र्यूज ने सू ची को खिलाफ दिए गए सैनिक अदालत के फैसले को बेतुका बताया है। उन्होंने सैनिक शासकों एक ‘आपराधिक गिरोह’ करार दिया है। उधर मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच ने आरोप लगाया है कि सैनिक शासक विपक्ष का सफाया करने के लिए फर्जी अदालती कार्यवाहियों का सहारा ले रहे हैं।
सू ची पर कोविड-19 प्रतिबंधों के उल्लंघन का आरोप
नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित सू ची को कोविड-19 संबंधी प्रतिबंधों का उल्लंघन करने के आरोप में सैनिक कोर्ट ने चार साल कैद की सजा सुनाई थी। लेकिन बाद में सैनिक शासकों ने इस सजा को घटा कर दो साल कैद कर दिया। इसके अलावा दस अन्य आरोपों में सू ची के खिलाफ सैनिक अदालत में मुकदमे चलाए जा रहे हैं। सू ची को इस साल एक फरवरी को गिरफ्तार कर लिया गया था, जिस दिन म्यांमार की सेना ने निर्वाचित सरकार के पद ग्रहण करने से कुछ घंटों पहले ही सत्ता पर कब्जा जमा लिया।
सजा सुनाए जाने के बाद सू ची को कहां रखा गया है, इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। उधर अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं का जवाब देते हुए सैनिक शासन के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि ‘हर व्यक्ति कानून के आगे बराबर है, कोई भी कानून के ऊपर नहीं है।’ विदेश मंत्रालय ने संयुक्त राष्ट्र पर आरोप लगाया कि उसने इस मामले में एकतरफा नजरिया अपनाते हुए अपनी राय बनाई है।
अब आम लोग चला रहे हैं आंदोलन
विश्लेषकों का कहना है कि सू ची की आज भी म्यांमार में व्यापक लोकप्रियता है। उनकी राय देश में मायने रखती है। लेकिन दस महीने पहले जब सैनिक तख्तापलट हुआ, तो उसके खिलाफ तब से चले आंदोलन का नेतृत्व वे नहीं कर रही थीं। ये आंदोलन आम लोग अपनी पहल पर चला रहे हैं। इसलिए उन्हें सजा सुनाए जाने से सैनिक शासन के प्रतिरोध पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आंदोलनकारियों ने भी ऐसी ही राय जताई है।
सैन्य शासन विरोधी आंदोलन से जुड़े संगठन रेजिस्टेंस अगेंस्ट मिलिट्री रूल के सह-संस्थापक मैट स्मिथ टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘अभी जो म्यांमार में हो रहा है, वह निश्चित रूप से आंग सान सू ची से कहीं बड़ा है। इसे लाखों लोग संचालित कर रहे हैं। ये वे लोग हैं, जो स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए अपनी इच्छा से प्रेरित हैं।’
पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि पिछले फरवरी के बाद से 1,300 से ज्यादा लोग मारे गए हैं, दसियों हजार लोगों को जेलों में रखा गया है, अनगिनत संख्या में लोग गायब हो गए हैं, और यहां तक कि महिलाओं और बच्चों की भी हत्या की गई है। इसके बावजूद आंदोलन खत्म नहीं हुआ है। स्मिथ ने कहा- ‘तख्तापलट के पहले ऐसे सैकड़ों प्रोफेशनल थे, जिन्होंने कभी एक्टिविस्ट बनने का नहीं सोचा था। लेकिन यही लोग आज आंदोलन को चला रहे हैं।’