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वैज्ञानिकों की सलाह: ज्यादातर लोगों को टीकों के बाद एंटीबॉडी टेस्ट की जरूरत नहीं
Sat, 26 Jun 2021 06:27 AM IST
Jeet Kumar
न्यूयॉर्क टाइम्स न्यूज सर्विस।
न्यूयॉर्क टाइम्स न्यूज सर्विस।
Published by: Jeet Kumar
Updated Sat, 26 Jun 2021 06:27 AM IST
सार
- टीके लगवाने के चंद दिनों में हुई जांच या गलत एंटीबॉडी टेस्ट, दोनों ही फायदेमंद नहीं हैं
- आमतौर पर टीके लगवा चुके व्यक्ति को अनावश्यक एंटीबॉडी जांच करानी ही नहीं चाहिए
- क्लीनिकल ट्रायल में अच्छी एंटीबॉडी बनना साबित हो चुका है
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Corona testing
- फोटो : PTI
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विस्तार
दुनियाभर में कोरोना के दोनों टीके लगवा चुके काफी लोगों में इन दिनों एंटीबॉडी को लेकर उत्सुकता बढ़ गई है। पूछा जा रहा है कि क्या अब वे खुद को कोरोना से सुरक्षित मानें या नहीं। साथ ही एंटीबॉडी का स्तर पता करने के लिए कौन-सा टेस्ट कराना सही रहेगा।
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इस पर वैज्ञानिकों का कहना है, दोनों टीके लगवा चुके अधिकांश लोग सुरक्षित हैं। लेकिन फिर भी सही समय पर सही जांच से ही एंटीबॉडी के बारे में भरोसेमंद जवाब मिल सकता है। टीके लगवाने के चंद दिनों में हुई जांच या गलत एंटीबॉडी टेस्ट, दोनों ही फायदेमंद नहीं हैं।
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टीकों के बाद एंटीबॉडी की चिंता छोड़ें
वैज्ञानिकों के मुताबिक, आमतौर पर टीके लगवा चुके व्यक्ति को अनावश्यक एंटीबॉडी जांच करानी ही नहीं चाहिए। उनका कहना है कि क्लीनिकल ट्रायलों में सभी प्रतिभागियों में टीकों से अच्छी एंटीबॉडी बनना साबित हो चुका है।
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येल यूनिवर्सिटी में प्रतिरक्षाविद अकिको इवासाकी के मुताबिक, अधिकांश लोगों को टीकों के बाद एंटीबॉडी की चिंता करनी ही नहीं चाहिए। हालांकि कमजोर प्रतिरक्षा तंत्र वालों के लिए यह जानना अहम हो सकता है।
‘एन’ प्रोटीन संबंधी एंटीबॉडी वाली जांच में न पड़ें
इवासाकी बताती हैं, अगर आपके लिए एंटीबॉडी जांच कराना जरूरी है या कराना चाहते हैं तो सही जांच अपनाएं। महामारी की शुरुआत में कोरोना वायरस के प्रोटीन न्युक्लियकैप्सिड (एन) संबंधी एंटीबॉडी को लेकर कई जांच प्रचलित हो गई थीं क्योंकि संक्रमण से उबरने पर रक्त में इन एंटीबॉडी की काफी मात्रा रहती है। लेकिन यह एंटीबॉडी उतनी क्षमतावान नहीं होती जितनी वायरस से बचाव के लिए जरूरी होती हैं। न ही यह दीर्घकालिक होती हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका जैसे देशों में अधिकृत टीकों से एन संबंधी एंटीबॉडी ही नहीं बनतीं। इसके बजाय ये टीके वायरस की सतह पर मौजूद स्पाइक प्रोटीन के लिए एंटीबॉडी पैदा करती हैं। ऐसे में कभी संक्त्रस्मित नहीं हुए लोग टीके लगवाने के बाद अगर एन प्रोटीन के लिए एंटीबॉडी जांच कराएंगे तो उन्हें झटका लग सकता है।
डॉक्टरों को भी ठीक से जानकारी नहीं
इवासाकी का कहना है, यहां तक कि कई डॉक्टर भी अलग-अलग एंटीबॉडी टेस्ट में अंतर से अवगत नहीं हैं। रैपिड टेस्ट से सामान्य हां या ना में जवाब मिलता है और इनसे एंटीबॉडी का कम स्तर पता नहीं चलता। वहीं, एलिसा जांच से स्पाइक प्रोटीन के बारे में अर्द्ध मात्रात्मक अनुमान मिल पाता है।
दो से चार हफ्तों के बाद कराए जांच
फाइजर या मॉडर्ना के टीके लगवाने वाले लोगों को एंटीबॉडी जांच के लिए कम से कम दो हफ्तों का इंतजार करना चाहिए। जॉनसन एंड जॉनसन का टीका लगवाने वालों को इसके लिए चार हफ्तों तक रुकेंगे तो बेहतर परिणाम मिल पाएगा।
प्रतिरक्षा का सिर्फ एक पहलू है एंटीबॉडी जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी में ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ डोरी सेगेव का कहना है, एंटीबॉडी प्रतिरक्षा का सिर्फ एक पहलू है। शरीर में प्रतिरक्षा को लेकर अंदरूनी तौर पर ऐसी कई प्रक्रियाएं हो रही होती हैं, जिन्हें एंटीबॉडी टेस्ट नहीं पकड़ पाता। टीकों के बाद शरीर में कोशिकीय प्रतिरक्षा भी बनती है, जो रोगाणुओं पर हमला करती है।
सेगेव का कहना है, प्रतिरक्षा में अक्षम लोगों के लिए एंटीबॉडी का पता लगना लाभदायक हो सकता है।