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न्यूयॉर्क: ऑनलाइन चाइल्ड सेफ्टी बिल के खिलाफ मेटा-गूगल, विधेयकों को मतदान में हराने को नेताओं पर खर्चे 6 करोड़

Wed, 22 May 2024 05:46 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, न्यूयॉर्क
अमर उजाला नेटवर्क, न्यूयॉर्क Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Wed, 22 May 2024 05:46 AM IST
सार

विधानसभा में मार्च में स्टॉप एडिक्टिव फीड्स एक्सप्लॉइटेशन (सेफ) फॉर किड्स एक्ट और न्यूयॉर्क चाइल्ड डाटा प्रोटेक्शन एक्ट नाम से दो विधेयक पेश किए गए हैं। मेटा व गूगल इन्हें किसी भी कीमत पर पारित नहीं होने देना चाहते हैं। इससे बच्चों में रील्स-वीडियो देखने की लत पैदा करने वाली आदत कमजोर होगी। 

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Meta and Google against New York's online child safety bill
Google - फोटो : istock

विस्तार

मेटा व गूगल न्यूयॉर्क के दो विधेयकों से बेचैन हैं। इन पर जल्द मतदान होना है, जिन्हें  गूगल और मेटा मतदान में हराना चाहते हैं। इसके लिए टेक कंपनियां न्यूयॉर्क राज्य के विधायकों को लामबंद करने के लिए 6 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च कर चुके हैं। 

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विधानसभा में मार्च में स्टॉप एडिक्टिव फीड्स एक्सप्लॉइटेशन (सेफ) फॉर किड्स एक्ट और न्यूयॉर्क चाइल्ड डाटा प्रोटेक्शन एक्ट नाम से दो विधेयक पेश किए गए हैं। टेक दिग्गज इन्हें  किसी भी कीमत पर पारित नहीं होने देना चाहते हैं। इससे बच्चों में रील्स-वीडियो देखने की लत पैदा करने वाली आदत कमजोर होगी। 

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दांव पर अभिव्यक्ति की आजादी और गोपनीयता 
हालांकि, टेक कंपनियों की दलील है कि अपुष्ट आशंकाओं के आधार पर बच्चों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ऑनलाइन गोपनीयता को छीना जा रहा है। यह प्रवासियों और अन्य वंचित समुदायों के लिए इंटरनेट के प्रभाव को भी सीमित करेगा, जो एल्गोरिदम के जरिये हेट स्पीच जैसे मामलों में मदद पाते हैं। विधेयकों के सह-प्रायोजक राज्य के सीनेटर एंड्रयू गौनार्डेस कहते हैं कि विरोधियों ने इन विधेयकों के खिलाफ कानाफूसी अभियान चला रखा है, ताकि कानून बनने से रोका जा सके।  इन कंपनियों के पास असीमित संसाधन हैं, इनके पक्ष में पैरवी करने वालों की पूरी फौज अलबैनी में उतरी हुई है। 

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अलग-अलग कानून समाधान नहीं 
पूरे मामले पर मेटा के प्रवक्ता का कहना है कि कंपनी इस संबंध में उस संघीय कानून के अनुपालन को तैयार है, जिसके तहत 16 वर्ष से कम उम्र के सोशल मीडिय एप उपयोगकर्ताओं को अभिभावकों की अनुमति लेनी होगा। लेकिन, इस संबंध में अलग-अलग राज्यों में कानून बनाना समाधान नहीं है। 

किशोर कई प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों में भी आते-जाते रहते हैं। ऐसे में माता-पिता और किशोंरों के लिए भी अलग-अलग कानूनों का  पालन मुश्किल हो जाएगा। इस संबंध में फौरी समाधानों के बजाय ऐसे उपायों पर काम करने की जरूरत है, जो अभिभावकों का सशक्तिकरण करें और किशोंरों के लिए इंटरनेट उपयोग को हतोत्साहित न करें। 

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