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Hindi News ›   World ›   Maldives: Why victory of Mohamed Nasheed party is good news for India and Bad for China

मालदीव में भारत समर्थक पार्टी की बड़ी जीत, अब चीन का खतरा ऐसे होगा कम 

Mon, 08 Apr 2019 11:05 AM IST
Shilpa Thakur Shilpa Thakur
Updated Mon, 08 Apr 2019 11:05 AM IST
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Maldives: Why victory of Mohamed Nasheed party is good news for India and Bad for China
पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद - फोटो : social media

मालदीव में भारत का समर्थन करने वाले पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद की पार्टी को 87 में से 60 सीटें मिली हैं। नशीद की पार्टी मालदिवियन डेमोक्रेटिक पार्टी (एमडीपी) ने राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद अब संसदीय चुनाव भी जीत लिया है। संसदीय चुनाव में नशीद की विरोधी प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव (पीपीएम) को केवल 7 सीटें मिली हैं। 


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मालदीव में भारत का समर्थन करने वाले पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद की पार्टी को 87 में से 60 सीटें मिली हैं। नशीद की पार्टी मालदिवियन डेमोक्रेटिक पार्टी (एमडीपी) ने राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद अब संसदीय चुनाव भी जीत लिया है। संसदीय चुनाव में नशीद की विरोधी प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव (पीपीएम) को केवल 7 सीटें मिली हैं। 

नशीद की पार्टी का संसदीय चुनाव जीतना भारत के लिए खुशी की बात है। ऐसा इसलिए क्योंकि चीन भारत को घेरने के लिए पड़ोसी देशों में पैठ जमाने की अपनी योजना पर काम कर रहा है। ऐसे में नशीद की पार्टी का संसद में अधिक सीटें जीतना भारत के लिए जरूरी था। चुनाव में अन्य निर्दलीय उम्मीदवार भी नशीद की पार्टी का समर्थन कर सकते हैं।

भारत के लिए क्यों जरूरी था नशीद का सत्ता में आना?

भारत के लिए यह अच्छी बात है कि बीते सात महीने में नशीद की पार्टी ने दूसरी बड़ी जीत हासिल कर ली है। वहीं नशीद भारत के लिए इसलिए जरूरी हैं क्योंकि उन्हें हमेशा से भारत का समर्थन करने वाला माना जाता है। जबकि यामीन हमेशा भारत के विरोधी चीन के पाले में खड़े दिखे। यामीन के राष्ट्रपति रहते मालदीव और भारत के रिश्तों में खटास आ गई थी। 

सबसे जरूरी बात कि मालदीव से लक्षद्वीप केवल 750 किमी की दूरी पर स्थित है और इस रास्ते पर चीन की नजर है। 1200 द्वीपों वाला शहर होने के नाते मालदीव को समुद्री जहाजों के लिए महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है।

भारत का ये मानना है कि अगर चीन मालदीव में निर्माण कार्य करता है तो यह उसके लिए अच्छा नहीं होगा। भारत नहीं चाहता कि चीन मालदीव के करीब पहुंचे। साल 2017 में चीनी नौसैनिक जहाज माले पहुंच गए थे। जिससे भारत की चिंता और अधिक बढ़ गई। जेल छोड़ने और फिर देश छोड़ने के बाद नशीद दोबारा सत्ता में वापस आए हैं।

राष्ट्रपति चुनाव क्यों नहीं लड़ पाए नशीद?

बीते साल मालवीद में हुए राष्ट्रपति चुनाव में नशीद की पार्टी के ही उम्मीदवार इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने तत्कालीन राष्ट्रपति और पीपीएम उम्मीदवार अब्दुल्ला यामीन के खिलाफ चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। 

अपनी पार्टी से नशीद इसलिए चुनाव नहीं लड़ पाए क्योंकि यामीन ने उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी। उन पर आरोप था कि 2012 में उन्होंने राष्ट्रपति पद पर रहते हुए एक जज को बंदी बनाया था। उन्हें 13 साल की सजा सुनाई गई। बाद में उन्हें इलाज के लिए ब्रिटेन जाने की अनुमति मिल गई और फिर वह वहीं से श्रीलंका चले गए। 

पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद
पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद - फोटो : social media

कैसा रहा है उनका सफर?

नशीद नवंबर 2008 में मालदीव के राष्ट्रपति बने थे। उन्होंने 30 साल से राष्ट्रपति रहे मामून अब्दुल गयूम को हराया था। 

2012 में नशीद पर सेना को आदेश देकर जज को बंदी बनाने का आरोप लगा। जिसके बाद उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा।

नवंबर 2013 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में पीपीएम के अब्दुल्ल यामीन ने जीत हासिल की। वहीं नशीद के समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई की गई।

नशीद को फिर मार्च 2015 में 13 साल की सजा सुनाई गई। वह बीमार होने के चलते अनुमति लेकर इलाज के लिए ब्रिटेन चले गए। वहीं से वह श्रीलंका पहुंच गए।

क्योंकि नशीद पर चुनाव लड़ने के लिए पाबंदी लगी थी तो उन्हीं की पार्टी के उपप्रमुख सोलिह राष्ट्रपति चुनाव में उतरे और जीत हासिल की। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद से नशीद की देश वापसी का रास्ता खुल गया।

राष्ट्रपति चुनाव के बाद अक्तूबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नशीद के खिलाफ सबूत नहीं हैं। उन्हें कोर्ट ने आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट से राहत मिलने के बाद नशीद वापस देश लौटे। उन्होंने संसदीय चुनावों के लिए देशभर में रैलियां कीं।

अप्रैल 2019 में नशीद की पार्टी को संसदीय चुनावों में जीत मिली।

क्यों भारत से बढ़ी दूरी?

मालदीव की भारत से दूरी चीन के कारण बढ़ी थी। अपनी विकास के नाम पर पड़ोसी देशों को कर्ज के जाल में फंसाने की नीति के तहत चीन ने मालदीव को भी कर्ज के जाल में फंसा लिया। चीन का मालदीव पर नौ हजार करोड़ रुपये का कर्ज है। जिसके चलते उसकी भारत से दूरी बढ़ गई है। इस दूरी का एक अन्य कारण 2013 में यामीन का राष्ट्रपति बनना भी है। क्योंकि वह चीनी समर्थक हैं।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग - फोटो : File Photo

किन देशों को फंसा रहा है चीन?

श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह को तो चीन अपने हाथों में ले ही चुका है। चीन ने विकास कार्य के नाम पर श्रीलंका को भारी कर्ज के जाल में फंस दिया। वह जब इसे चुकाने की स्थिति में नहीं रहा तो चीन को दिसंबर, 2017 में 99 साल के लिए हंबनटोटा बंदरगाह लीज पर देना पड़ा। 

अब उसकी नजर बांग्लादेश के पायरा बंदरगाह पर भी है। दो चीनी कंपनियों ने इस बंदरगाह के मुख्य ढांचे के विकास और अन्य कार्यों के लिए 600 करोड़ डॉलर का समझौता किया है।

चीन की इस परियोजना को बेल्ट एंड रोड (बीआरआई) भी कहा जाता है। जिसका उद्देश्य एशिया के देशों को चीन द्वारा प्रायोजित परियोजना के माध्य से जोड़ना है। जिसे चीनी 21वीं सदी का 'सिल्क रूट' कहते हैं।
 

किन रास्तों पर है चीन की नजर?

चीन अपनी विकास के नाम पर कब्जे की रणनीति से दुनिया के लिए खतरा बनता जा रहा है। अगर पायरा बंदरगाह की बात करें तो यह बांग्लादेश के लिए रणनीतिक रूप से बेहद जरूरी है। जो पटुआखली में स्थित है। ये बंदरगाह बंगाल की खाड़ी के तट पर है। वह इसपर कब्जे से समुद्री जाल बिछाना चाहता है। 

पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के माध्यम से चीन अरब सागर तक पहुंचना चाहता है। वह श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह के माध्यम से हिंद महासागर में और बांग्लादेश के पायरा बंदरगाह के माध्यम से बंगाल की खाड़ी में पहुंचना चाहता है। वह संबंधित देश को विकास के नाम पर कर्ज में इस हद तक फंसा देता है कि उसे अपने उद्देश्य के पूरा होने को लेकर कोई संदेह ही नहीं रहता है। 

चीन का इन कार्यों के पीछे अपने नागरिकों को नौकरी देने का उद्देश्य भी शामिल है। वह इन विकास कार्यों का ठेका अपनी ही कंपनियों को देता है। इन विकास के नाम पर किए जा रहे कार्यों में काम भी चीनी मजदूर ही करते हैं।

यानी कर्ज भी खुद दे रहा है और कर्ज के पैसे जिस कंपनी और मजदूरों पर खर्च हो रहे हैं, वो भी चीन में ही आ रहे हैं। माना जाता है कि पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में चीन के 60 हजार नागरिक काम कर रहे हैं। जबकि जिन देशों में ये काम हो रहे हैं वहां के नागरिकों को इन कार्यों से दूर ही रखा जाता है। 
आपके लिए- चीन का पड़ोसी देशों में बढ़ता प्रभाव भारत की सुरक्षा के लिए खतरा है। वह भारत को चारों ओर से घेरना चाहता है। साथ ही सभी समुद्री मार्गों तक अपनी पहुंच बढ़ाना चाहता है। चीन की इस नीति से ना केवल भारत बल्कि अमेरिका भी चिंतित है। 
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