Macron Pushing French language: क्या कामयाब होगी फ्रेंच भाषा का पुराना गौरव लौटाने की मैक्रों की कोशिश?
Macron Pushing French language: 2017 में राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद इमैनुएल मैक्रों ने फ्रेंच को विश्व भाषा बनाने की मंशा जताई थी। बीती तीन सदियों में फ्रेंच एक अंतरराष्ट्रीय भाषा रही। अभी फ्रेंच बोलने वाले लोग 106 देशों में मौजूद हैं। 32 देशों की यह सरकारी कामकाज की भाषा है...
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फ्रेंच को विश्व भाषा बनाने के अभियान में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अपनी पूरी ताकत लगा रखी है। यहां एक सांस्कृतिक केंद्र बनाने के लिए मैक्रों सरकार ने साढ़े 18 करोड़ यूरो का बजट मंजूर किया है। इस केंद्र का मकसद फ्रेंच भाषा को दुनिया भर में लोकप्रिय बनाना होगा। केंद्र फ्रेंच को प्रगति और गतिशील भाषा के रूप में पेश करने की योजनाओं को लागू करेगा। मैक्रों ने उम्मीद जताई है कि साल 2050 तक फ्रेंच दुनिया में 75 करोड़ लोगों की पहली भाषा बन जाएगी। अभी फ्रेंच भाषी लोगों की संख्या 30 करोड़ है। फ्रेंच भाषी लोगों में 85 फीसदी अफ्रीकी देशों में हैं। ये वो देश हैं, जहां पहले फ्रांस का शासन था। बाकी 15 फीसदी फ्रेंच भाषी यूरोप और कनाडा में रहते हैं।
ऑस्ट्रेलियाई वेबसाइट द कन्वर्सेशन में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद इमैनुएल मैक्रों ने फ्रेंच को विश्व भाषा बनाने की मंशा जताई थी। विशेषज्ञों की राय है कि बीती तीन सदियों में फ्रेंच एक अंतरराष्ट्रीय भाषा रही। फ्रांस इसे अपनी एक प्रमुख थाती समझता रहा है। अभी फ्रेंच बोलने वाले लोग 106 देशों में मौजूद हैं। 32 देशों की यह सरकारी कामकाज की भाषा है। विशेषज्ञों के मुताबिक फ्रेंच भाषा पर “स्वामित्व” का फ्रांस को काफी फायदा मिला है। दुनिया के कई प्रभावशाली राजनीतिक, व्यापारिक, बौद्धिक और कला संबंधी विमर्श फ्रेंच में होते रहे हैं। लेकिन पिछली आधी सदी में ये धारणा बनी है कि फ्रेंच का प्रभाव कम हो रहा है। इसकी बड़ी वजह अंग्रेजी का प्रसार है। अंग्रेजी अब मोटे तौर पर विश्व की सबसे प्रमुख भाषा बन चुकी है।
फ्रेंच की हैसियत में गिरावट फ्रांस में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहा है। फ्रांस के कई हलकों से इस पर चिंता जताई गई है। इस सूरत के लिए फ्रांस के शासक वर्ग को जिम्मेदार ठहराया गया है। आरोप लगे हैं कि फ्रांस के शासक वर्ग के लोग खुद अंग्रेजीदां हो गए हैं। समझा जाता है कि मैक्रों ने फ्रांस में बनी इस भावना को समझा है। अब वे अपने को फ्रेंच के रक्षक के रूप में पेश कर रहे हैं। गुजरे वर्षों में उन्होंने अपने कई भाषणों में फ्रेंच को दुनिया के स्तर पर फिर लॉन्च करने की इच्छा जताई। अब उन्होंने इसके लिए बजट का प्रावधान कर ठोस पहल की है। उनके समर्थकों का कहना है कि एक समय दुनिया में फ्रेंच और अंग्रेजी का दर्जा समान था। फ्रेंच को भी कूटनीति, बौद्धिक सोच और व्यापारिक वार्ता की भाषा समझा जाता था। लेकिन पिछले खास कर तीन दशकों में जहां फ्रेंच की हैसियत गिरी, वहीं अंग्रेजी, अरबी, हिंदी, स्पेनिश और पुर्तगीज ने अपना महत्त्व बढ़ाया है।
जानकारों ने कहा है कि यूरोपियन यूनियन से ब्रिटेन के बाहर जाने (ब्रेग्जिट) को मैक्रों ने फ्रेंच के लिए एक बेहतर अवसर के रूप में देखा है। उनकी राय है कि अब फ्रेंच के लिए यूरोपियन यूनियन में अंग्रेजी की जगह ले लेने का बेहतर मौका है। इसके अलावा अफ्रीका में भी इसका इस्तेमाल बढ़ाने की काफी गुंजाइश है।