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Bangladesh: शेख हसीना के पिता की हत्या से कम वेतन-आरक्षण तक, बांग्लादेश ने कई बार झेली अस्थिरता, जानें सबकुछ

Tue, 06 Aug 2024 01:47 PM IST
शिवेंद्र तिवारी स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Tue, 06 Aug 2024 01:47 PM IST
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सार
Bangladesh Crisis: करीब 50 साल पहले बांग्लादेश ने पहली बार तख्तापलट का दौर देखा था। 1975 में बांग्लादेश के संस्थापक और शेख हसीना के पिता शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद पहली बार तख्तापलट हुआ। तब सेना ने देश की बागडोर संभाली थी। इसके बाद भी कई बार बांग्लादेश सियासी अस्थिरता के दौर से गुजरा है। 
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List of coups in Bangladesh from sheikh hasina father killing to quota movement news in hindi
बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल की कहानी - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

बीते दिन बांग्लादेश की सियासत में बड़ी उथल-पुथल हुई। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कई सप्ताह तक चले हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद सोमवार को अपने इस्तीफे की घोषणा की। यह एलान सेना प्रमुख वकर-उज-जमान ने टेलीविजन पर किया। इस्तीफे के साथ ही शेख हसीना ने देश छोड़ दिया। वह फिलहाल भारत में रुकी हुई हैं और कहा जा रहा है कि यहां से लंदन जा सकती हैं। 


जून के अंत में शुरू हुआ आंदोलन सरकारी नौकरियों में स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों को मिलने वाले आरक्षण के खिलाफ था। विरोध के बीच जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने देश में अधिकतर आरक्षण को खत्म कर दिया। इन सबके बावजूद देश में हिंसा नहीं थमी और विरोध का असर यह हुआ कि प्रधानमंत्री शेख हसीना की कुर्सी चली गई। घटनाक्रम ने एक बार फिर देश के राजनीतिक उथल-पुथल के इतिहास को दोहराया है। आइए जानते हैं बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल की कहानी... 

 

बांग्लादेश में आरक्षण आंदोलन
बांग्लादेश में आरक्षण आंदोलन - फोटो : AMAR UJALA
1975: करीब 50 साल पहले बांग्लादेश ने पहली बार तख्तापलट का दौर देखा था। अगस्त 1975 में बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद पहली बार तख्तापलट हुआ। तब भी सेना ने देश की बागडोर संभाली। तख्तापलट में शेख हसीना के मां-पिता और तीन भाइयों की हत्या कर दी गई थी। इसके के बाद शेख हसीना करीब छह साल तक भारत में रहीं। वह 1981 में बांग्लादेश वापस लौटीं।

उधर तख्तापलट के बाद लंबे समय तक बांग्लादेश में सैन्य शासन चला। उसी साल दो और तख्तापलट हुए, जिसके बाद नवंबर में जनरल जियाउर रहमान ने सत्ता पर कब्जा कर लिया।
 

बांग्लादेश में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पहले और बाद में आरक्षण
बांग्लादेश में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पहले और बाद में आरक्षण - फोटो : AMAR UJALA
1981: बांग्लादेश ने 1981 में एक बार फिर तख्तापलट का दौर देखा। विद्रोहियों ने चटगांव शहर में एक सरकारी गेस्ट हाउस में घुसकर राष्ट्रपति जियाउर रहमान की हत्या कर दी थी। जियाउर रहमान इसी गेस्ट हाउस में रह रहे थे। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, यह हिंसा सेना के कुछ अधिकारियों के एक समूह की करतूत थी। हालांकि, सेना ने इस विद्रोह को दबा दिया।

sheikh hasina
sheikh hasina - फोटो : Amar Ujala
1982: देश में अगला तख्तापलट अगले ही साल यानी 1982 में हुआ। जियाउर रहमान के उत्तराधिकारी राष्ट्रपति अब्दुस सत्तार को एक सैन्य तख्तापलट में हटा दिया गया। यह तख्तापलट हुसैन मुहम्मद इरशाद के नेतृत्व में किया गया था। घटनाक्रम के बाद इरशाद ने मुख्य मार्शल-लॉ प्रशासक का पद संभाला और बाद में राष्ट्रपति भी बने।

2007: 1982 के बाद 2007 में तत्कालीन सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल मोईन यू. अहमद ने तख्तापलट किया। अहमद ने एक कार्यवाहक सरकार का समर्थन किया जिसने अगले दो वर्षों तक देश पर शासन किया। इसके बाद ही 2009 में शेख हसीना ने बांग्लादेश की सत्ता संभाली थी।

2009: अर्धसैनिक बलों ने राजधानी ढाका में 70 से अधिक लोगों की हत्या कर दी थी। हत्या करने वालों में से अधिकांश सेना के अधिकारी थे। ये अधिकारी अपने कम वेतन से नाखुश थे। इस घटनाक्रम को भी विद्रोह कहा गया था, जो लगभग एक दर्जन शहरों तक फैल गया था। हालांकि, छह दिनों के बाद यह विद्रोह खत्म हो गया, क्योंकि नाराज अर्धसैनिक बलों ने कई चर्चाओं के बाद आत्मसमर्पण कर दिया था।

2012: उस वक्त बांग्लादेश की सेना ने कहा कि उसने सेवानिवृत्त और कार्यरत अधिकारियों द्वारा किए गए तख्तापलट के प्रयास को विफल कर दिया है। सेना के अनुसार, यह प्रयास पूरे देश में शरिया या इस्लामी कानून लागू करने के अभियान से प्रेरित था।

बांग्लादेश में हिंसा
बांग्लादेश में हिंसा - फोटो : पीटीआई
2024: बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वकर-उज-जमान ने सोमवार को कहा कि हसीना ने हिंसक आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों के बाद इस्तीफा दे दिया है और देश का नेतृत्व करने के लिए एक अंतरिम सरकार का गठन किया जाएगा। दरअसल, सरकारी नौकरियों में स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों को मिलने वाले 30 फीसदी आरक्षण के मुद्दे शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन एक बार फिर उग्र हो गया। इस हिंसक आंदोलन के चलते 300 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। पिछले महीने यहां की सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण की अधिकांश व्यवस्था को खत्म कर दिया था। 21 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय ने उस फैसले को पलट दिया, जिसके तहत सभी सिविल सेवा नौकरियों के लिए दोबारा आरक्षण लागू कर दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा निर्णय में, यह निर्धारित किया गया कि अब केवल पांच फीसदी नौकरियां स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए आरक्षित होंगी। इसके अलावा दो फीसदी नौकरियां अल्पसंख्यकों या दिव्यांगों के लिए आरक्षित होंगी। वहीं बाकी बचे पदों के लिए अदालत ने कहा कि ये योग्यता के आधार पर उम्मीदवारों के लिए खुले होंगे। यानी 93 फीसदी भर्तियां अनारक्षित कोटे से होंगी। पहले अनारक्षित कोटा 44 फीसदी था। 

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शन खत्म हो जाएंगे, लेकिन एक बार फिर हिंसा की आग फैल गई। विरोध का असर यह हुआ कि शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद के साथ-साथ देश भी छोड़ना पड़ गया। 
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