सीपीसी के 100 साल: चीन के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का मकसद अमेरिका को जवाब देना?
चीन में ईरान के राजदूत मोहम्मद केशावार्ज-जादेह ने कहा कि सौ साल पहले चीन की हालत वैसी ही थी, जैसी आज ईरान की है। उस पर भी विदेशी हमले होते थे और विदेशी ताकतें उसे अपमानित करती थीं। लेकिन सीपीसी और चीन की जनता ने जबरदस्त प्रगति की है...
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अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने वादा किया था कि राष्ट्रपति बनने पर अपने कार्यकाल के पहले वर्ष में वे समिट ऑफ डेमोक्रेसीज (लोकतांत्रिक देशों के शिखर सम्मेलन) का आयोजन करेंगे। उनकी इस योजना का मकसद चीन को तानाशाही से चलने वाला देश बता कर दुनिया की निगाहों में उसकी साख खत्म करना समझा गया था। राष्ट्रपति बनने के बाद पहले छह महीनों में उनके इस इरादे की कोई खास चर्चा नहीं हुई है। इस बीच चीन ने पहल अपने हाथ में लेते हुए अपने वैश्विक प्रभाव को दिखाने की कोशिश की है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) ने मंगलवार को राजनीतिक पार्टियों का एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया। ये आयोजन सीपीसी की सौवीं सालगिरह के मौके पर चल रहे हफ्ते भर के समारोंहो के हिस्से के रूप में हुआ।
चीन ने दावा किया कि इस वर्चुअल सम्मेलन में 160 देशों की लगभग 500 पार्टियों या संगठनों ने भागीदारी की। उनमें 20 ऐसे नेता थे, जो अपने देशों की सरकारों के प्रमुख हैं। चीनी मीडिया के मुताबिक इस वर्चुअल सम्मेलन में 10 हजार लोगों ने हिस्सा लिया। सम्मेलन को संबोधित करते हुए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने दावा किया कि चीन ने शासन की पश्चिमी प्रणाली का एक उचित विकल्प पेश किया है। अब वह अपने अनुभवों को बाकी दुनिया के साथ साझा कर रहा है।
अमेरिका पर निशाना साधते हुए शी ने कहा कि कोई देश अन्य देशों पर लोकतंत्र थोप नहीं सकता। हर देश को अपने समाधान खुद ढूंढने का अधिकार है। शी ने कहा- ‘खुशी की तलाश के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं। दुनिया के अलग-अलग देशों की जनता को अपने विकास का सिस्टम और मॉडल खुद चुनना चाहिए।’ चीन ने इस सम्मेलन का नाम- ‘जन कल्याण के लिए राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी’ रखा।
सम्मेलन का डिजाइन इस ढंग से तैयार किया गया, जिससे चीन यह दिखा सके कि उन मसलों पर वह अलग-थलग नहीं पड़ा है, जिसे लेकर पश्चिमी देश उसे घेरने की कोशिश कर रहे हैँ। इसलिए इसमें मुस्लिम बहुल देशों के प्रतिनिधियों को खास अहमियत दी गई। गौरतलब है कि चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों के कथित दमन के मुद्दे को पश्चिमी देशों ने लगातार गरम किए रखा है।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने शिनजियांग में चीन की नीतियों का समर्थन किया। उन्होंने यहां तक कह डाला कि चीन का एक पार्टी सिस्टम चुनावी लोकतंत्र वाली प्रणालियों से बेहतर मॉडल है। इमरान खान ने गुजरे कुछ वर्षों के दौरान मुस्लिम समुदाय की आवाज बनने की कोशिश की है। खास यूरोपीय देशों से वे इस्लामोफोबिया के खिलाफ कदम उठाने की मांग करते रहे हैँ। उन्होंने कहा- ‘चीनी अधिकारियों के साथ हमारा जो संवाद होता है, उससे शिनजियांग की सूरत उससे बिल्कुल अलग उभरती है, जैसा हमें पश्चिमी मीडिया या पश्चिमी सरकारें बताती हैं।’
चीन में ईरान के राजदूत मोहम्मद केशावार्ज-जादेह ने कहा कि सौ साल पहले चीन की हालत वैसी ही थी, जैसी आज ईरान की है। उस पर भी विदेशी हमले होते थे और विदेशी ताकतें उसे अपमानित करती थीं। लेकिन सीपीसी और चीन की जनता ने जबरदस्त प्रगति की है। ऐसे अनुभवों को दुनिया भर की राजनीतिक पार्टियों के साथ साझा किया जाना चाहिए।
पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि इस सम्मेलन से ठीक एक दिन पहले शी ने जर्मनी की चांसलर अंगेला मैर्केल और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से शिखर वार्ता की। उस वार्ता के पीछे भी मकसद अमेरिका को संदेश देना था कि चीन को अलग-थलग करने में वह सफल नहीं हुआ है। राजनीतिक दलों के अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन से चीन ने इस संदेश को और पुख्ता बनाने की कोशिश की है।