{"_id":"6852ccc9e3fa8012f706dc2d","slug":"israel-iran-conflict-benjamin-netanyahu-vs-ayotollah-ali-khamenei-west-asia-rivalry-from-diplomacy-revolution-2025-06-18","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"Khamenei vs Netanyahu: पश्चिम एशिया की किस्मत बदलने की कोशिश में दो ताकतवर नेता, जानें दोनों की कहानी","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
Khamenei vs Netanyahu: पश्चिम एशिया की किस्मत बदलने की कोशिश में दो ताकतवर नेता, जानें दोनों की कहानी
Wed, 18 Jun 2025 07:57 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 18 Jun 2025 07:57 PM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
Please wait...
इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामनेई।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
इस्राइल और ईरान के बीच संघर्ष अब छठे दिन में पहुंच चुका है। जहां इस्राइल की तरफ से ईरान परमाणु ठिकानों के साथ कई सैन्य अफसरों और वैज्ञानिकों को निशाना बनाया जा चुका है, तो वहीं ईरान ने इस्राइल के प्रमुख शहरों- तेल अवीव और यरुशलम पर बैलिस्टिक मिसाइलों से जबरदस्त हमले किए हैं। इस पूरे घटनाक्रम के बीच अब अमेरिका के भी पश्चिम एशिया में जारी इस संकट में कूदने के आसार लगाए जा रहे हैं। अगर ऐसा होता है तो इस्राइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष के पूरी तरह युद्ध में बदलने का खतरा पैदा हो जाएगा।दोनों देशों के बीच हो रहे संघर्ष के रुकने के आसार फिलहाल नजर नहीं आ रहे। जहां इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस संघर्ष के जरिए ईरान की परमाणु बम बनाने की क्षमता और ईरान के सुप्रीम लीडर को ही जान से मारने की वकालत करते दिख रहे हैं तो वहीं अयातुल्ला खामनेई ने कहा है कि ईरान किसी भी हालत में सरेंडर नहीं करेगा और जवाबी कार्रवाई जारी रखेगा।
ऐसे में यह जानना अहम है कि पश्चिम एशिया में संघर्ष के पीछे खड़े दो देशों का नेतृत्व कर रहे ये नेता हैं कौन? इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामनेई का शुरुआती जीवन कैसा रहा है? दोनों की राजनीतिक विचारधारा और सफर कैसा रहा है? इस्राइल-ईरान का संघर्ष के दोनों नेताओं के लिए क्या मायने होंगे? आइये जानते हैं...
Israel-Iran Conflict: तेल की कीमत से व्यापार मार्ग तक, पश्चिम एशिया में संघर्ष का भारत पर क्या और कितना असर?
बेंजामिन नेतन्याहू: अपने राजनीतिक करियर के अंतिम संघर्ष की तरफ?
इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अपने देश का सबसे लंबे समय तक नेतृत्व करने वाले नेता बन चुके हैं। हालांकि, उनका सेना से राजनीति तक का सफर इतना भी आसान नहीं रहा है। इस सफर के दौरान नेतन्याहू ने भले ही करीब 17 साल सत्ता में रहते हुए बिताए हों, लेकिन उन्हें 8 साल विपक्ष में भी बैठना पड़ा है।
राजनीति में तेजी से बनाई स्थायी जगह
- नेतन्याहू की राजनीतिक समझ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने यूएन के बाद इस्राइल की घरेलू राजनीति में जगह बनाई और जल्द ही संसद पहुंच गए। वे 1993 में ही दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी के प्रमुख बने।
- 1996 में नेतन्याहू पहली बार इस्राइल के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने यह चुनाव महज 1 फीसदी ज्यादा वोट मिलने के बाद जीता था। यह वही दौर था, जब नेतन्याहू ने ईरान के परमाणु ताकत बनने को लेकर चिंता जताना शुरू किया था।
- नेतन्याहू 1996 से अब तक पांच बार इस्राइल के पीएम बन चुके हैं। उनका हालिया शपथग्रहण 2022 में हुआ था। तबसे वे लगातार इस्राइल का नेतृत्व कर रहे हैं। इसी दौरान फलस्तीन के गाजा, लेबनान, यमन और ईरान पर इस्राइल ने सीधे हमले बोले हैं।
क्यों ईरान से संघर्ष हो सकता है नेतन्याहू के राजनीतिक करियर?
सैन फ्रैंसिस्को स्टेट यूनिवर्सिटी में यहूदी स्टडीज के प्रोफेसर एरन काप्लान के मुताबिक, नेतन्याहू का ईरान के खिलाफ ताजा अभियान उनके राजनीतिक जीवन का आखिरी भी हो सकता है। उन्होंने कहा कि नेतन्याहू का राजनीतिक भविष्य सकारात्मक नहीं दिख रहा। उन्होंने इस्राइल में जो गठबंधन बनाया था, वह भी टूटता दिख रहा है। अधिकतर सर्वे दिखा रहे हैं कि वे अगला चुनाव जीत नहीं पाएंगे। ऐसा लगता है कि नेतन्याहू को ये पता है कि उनके पास ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने का आखिरी मौका है, इसलिए वे अपने अभियान को पूरा करने की कोशिश में हैं।
सैन फ्रैंसिस्को स्टेट यूनिवर्सिटी में यहूदी स्टडीज के प्रोफेसर एरन काप्लान के मुताबिक, नेतन्याहू का ईरान के खिलाफ ताजा अभियान उनके राजनीतिक जीवन का आखिरी भी हो सकता है। उन्होंने कहा कि नेतन्याहू का राजनीतिक भविष्य सकारात्मक नहीं दिख रहा। उन्होंने इस्राइल में जो गठबंधन बनाया था, वह भी टूटता दिख रहा है। अधिकतर सर्वे दिखा रहे हैं कि वे अगला चुनाव जीत नहीं पाएंगे। ऐसा लगता है कि नेतन्याहू को ये पता है कि उनके पास ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने का आखिरी मौका है, इसलिए वे अपने अभियान को पूरा करने की कोशिश में हैं।
अयातुल्ला अली खामनेई: पहली पीढ़ी के आखिरी क्रांतिकारी नेताओं में से एक
1988-89 के दौरान 40 साल के बेंजामिन नेतन्याहू संयुक्त राष्ट्र में इस्राइल के राजदूत के तौर पर अपनी भूमिका समाप्त कर रहे थे। ठीक उसी दौरान 50 साल के अयातुल्ला अली खामनेई ईरान के सर्वोच्च नेता का पद अयातुल्ला रुहोल्ला खोमैनी से हासिल करने की तैयारी कर रहे थे। यानी जब नेतन्याहू की राजनीति में एंट्री होने वाली थी, तब तक खामनेई ईरान के नेता के तौर पर लंबा-चौड़ा अनुभव जुटा चुके थे। ईरान के राष्ट्रपति (1981 से 1989 तक) रहने के बाद खामनेई जब सर्वोच्च नेता बने तबसे यह पद उन्हीं के पास है। इस पद के साथ खामनेई न सिर्फ देश के धार्मिक नेता बने, बल्कि सबसे ताकतवर राजनीतिक प्रमुख भी।
सीधे राष्ट्रपति बनकर हुई सक्रिय राजनीति में एंट्री
Israel vs Iran: ईरान की भयानक मिसाइलों के आगे आयरन डोम क्यों नाकाम, कौन-सा डिफेंस सिस्टम बना इस्राइल की ढाल?
- 1981 में तेहरान की एक मस्जिद पर जबरदस्त हमला हुआ था। बम विस्फोट की चपेट में खामनेई भी आए थे। इसमें उनका दाएं हाथ में लकवा मार गया।
- इसके कुछ महीने बाद ही ईरान के राष्ट्रपति की हत्या हो गई। तब अयातुल्ला खोमैनी ने खामनेई की सक्रिय राजनीति में एंट्री कराई। वह भी ईरान के तीसरे राष्ट्रपति के तौर पर।
- 1989 में जब खोमैनी कैंसर का इलाज करा रहे थे, तब उनका स्वास्थ्य लगातार खराब हो रहा था। इसी दौरान खोमैनी ने खामनेई को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।
- 3 जून 1989 को जब खोमैनी का निधन हुआ, उसके 24 घंटे के अंदर ही खामनेई को ईरान का नया सुप्रीम लीडर चुन लिया गया। तब इसका कुछ धार्मिक नेताओं ने विरोध भी किया था।
- तबसे लेकर अब तक ईरान के पश्चिमी देशों के साथ रिश्ते ठंडे ही रहे। 2015 में अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ ईरान के परमाणु समझौते से दरार के खत्म होने का रास्ता बना। लेकिन ट्रंप ने 2018 में राष्ट्रपति बनते ही परमाणु समझौता (JCPOA) रद्द कर दिया।
Israel vs Iran: ईरान की भयानक मिसाइलों के आगे आयरन डोम क्यों नाकाम, कौन-सा डिफेंस सिस्टम बना इस्राइल की ढाल?
बताया जाता है कि डोनाल्ड ट्रंप ने जब ईरान के परमाणु संवर्धन पर सीमा लगाने वाले समझौता को यह कहकर तोड़ा कि वह इसका पालन नहीं कर रहा है, तो खामनेई ने इसे एक बड़ी गलती करार दिया था और कहा था कि वे शुरुआत से ही अमेरिका पर भरोसा न करने की बात कहते रहे हैं।
क्यों कहे जाते हैं पहली पीढ़ी के क्रांतिकारियों में आखिरी नेता?
खामनेई के लेखों और किताबों का अध्ययन कर चुके लेखक करीम सज्जादपुर ने उन्हें ईरान के पहली पीढ़ी के क्रांतिकारियों का आखिरी बचा नेता करार दिया है। करीम के मुताबिक, खामनेई इस मामले में स्पष्ट हैं कि जब कभी पश्चिमी देश, खासकर अमेरिका और इस्राइली आप पर दबाव बनाने की कोशिश करें तो आपको झुकना नहीं है, क्योंकि अगर आप झुकेंगे तो इससे आपकी कमजोरी दिखेगी और आप खुद ज्यादा दबाव को न्योता देंगे।
दूसरी तरफ खामनेई इस्राइली सरकार की नीतियों के खिलाफ खासे मुखर रहे हैं। उन्होंने फलस्तीन के गाजा से लेकर, लेबनान, यमन और खुद ईरान के खिलाफ उसके हमले की निंदा की है। खामनेई ने यह भी कहा है कि इस्राइल के इन हमलों का बदला लिया जाएगा। उन्होंने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले को बड़ी गलती भी करार दिया।
खामनेई के लेखों और किताबों का अध्ययन कर चुके लेखक करीम सज्जादपुर ने उन्हें ईरान के पहली पीढ़ी के क्रांतिकारियों का आखिरी बचा नेता करार दिया है। करीम के मुताबिक, खामनेई इस मामले में स्पष्ट हैं कि जब कभी पश्चिमी देश, खासकर अमेरिका और इस्राइली आप पर दबाव बनाने की कोशिश करें तो आपको झुकना नहीं है, क्योंकि अगर आप झुकेंगे तो इससे आपकी कमजोरी दिखेगी और आप खुद ज्यादा दबाव को न्योता देंगे।
दूसरी तरफ खामनेई इस्राइली सरकार की नीतियों के खिलाफ खासे मुखर रहे हैं। उन्होंने फलस्तीन के गाजा से लेकर, लेबनान, यमन और खुद ईरान के खिलाफ उसके हमले की निंदा की है। खामनेई ने यह भी कहा है कि इस्राइल के इन हमलों का बदला लिया जाएगा। उन्होंने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले को बड़ी गलती भी करार दिया।