इराक संसदीय चुनाव: चुनावी नतीजों से ईरान को लगा धक्का, किसी गुट को नहीं मिला बहुमत
चुनाव नतीजों के मुताबिक सबसे ज्यादा कामयाबी शिया मौलवी मुकतदा अल-सदर के गुट को मिली है। उनके गुट को इराक के 18 प्रांतों में बढ़त मिली, जिनमें राजधानी बगदाद भी शामिल है। अल-सदर की खास पहचान 2003 में इराक पर अमेरिकी हमले के बाद अमेरिका के खिलाफ लगातार अभियान चलाने की वजह से बनी। उन्होंने कभी अमेरिका से समझौता नहीं किया...
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पश्चिमी मीडिया के विश्लेषणों के मुताबिक इराक में हुए चुनाव से ईरान को तगड़ा झटका लगा है। इराक में रविवार को हुए मतदान हुआ था। लेकिन पूरी चुनावी सूरत बुधवार तक आकर साफ हो पाई। शुरुआती विश्लेषकों के मुताबिक ईरान समर्थक उम्मीदवारों की करारी हार हुई है। इराक में बहुसंख्यक आबादी शिया है। इसलिए ईरान का मकसद इसे अपने प्रभाव क्षेत्र में लाने का रहा है। इसी कारण सद्दाम हुसैन के दौर में ईरान का इराक से टकराव था। 1980 के दशक में दोनों देशों के बीच छह साल तक युद्ध चला था। सद्दाम हुसैन सुन्नी थे।
चुनाव नतीजों के मुताबिक सबसे ज्यादा कामयाबी शिया मौलवी मुकतदा अल-सदर के गुट को मिली है। उनके गुट को इराक के 18 प्रांतों में बढ़त मिली, जिनमें राजधानी बगदाद भी शामिल है। अल-सदर की खास पहचान 2003 में इराक पर अमेरिकी हमले के बाद अमेरिका के खिलाफ लगातार अभियान चलाने की वजह से बनी। उन्होंने कभी अमेरिका से समझौता नहीं किया।
इराक की संसद के 329 सदस्यों के लिए चुनाव हुआ। मुकतदा अल-सदर के गुट को 70 से ज्यादा सीटें मिली हैं। 2018 के चुनाव में उसे सिर्फ 54 सीटें मिली थीं। चुनाव नतीजों से साफ है कि कोई एक गुट सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। विश्लेषकों का कहना है कि अलग-अलग गुटों के बीच सौदेबाजी का दौर लंबा खिंच सकता है। तब तक देश में अस्थिरता बनी रहेगी। 2003 के अमेरिकी हमले के दौरान सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटा दिया गया था। उसके बाद से इराक की राजनीति में शिया गुट ही हावी रहे हैं।
इराक में संसदीय चुनाव 2022 में होना था। लेकिन इस साल सरकार विरोधी बड़े जन प्रदर्शनों के कारण संसद समय से पहले भंग कर दी गई। लेकिन इस चुनाव के दौरान मतदान प्रतिशत बहुत कम रहा। चुनाव नतीजों के एलान के बाद अल-सदर ने एक टीवी प्रसारण में दावा किया कि उनके गुट को जनादेश मिला है और अब वे ऐसी सरकार बनाएंगे, जो विदेशी प्रभाव से मुक्त रहते हुए काम करेगी। अल-सदर के इस बयान को ईरान के खिलाफ समझा गया है। अल-सदर की छवि राष्ट्रवादी की है और वे इराक के मामलों में अमेरिका के साथ-साथ ईरान के हस्तक्षेप का भी विरोध करते रहे हैं। हालांकि यह भी सच है कि जब अल-सदर अमेरिकी फौज को इराक से निकालने की जंग लड़ रहे थे, तब उन्होंने बार-बार ईरान में पनाह ली थी।
चुनाव नतीजों के मुताबिक इस बार कई ऐसे उम्मीदवारों को सफलता मिली है, जिनका राजनीतिक करियर 2019 से देश में चले सरकार विरोधी प्रदर्शनों से ही शुरू हुआ है। उधर कुर्द समुदाय की पार्टियों को 61 सीटें मिली हैं। इनमें कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी को मिली 32 सीटें शामिल हैं। ये पार्टी इराक के कुर्द इलाकों की स्वायत्तता की समर्थक रही है।
ईरान समर्थक शिया गुटों को इस बार 2018 की तुलना में कम सीटें मिली हैँ। पिछली संसद के दौरान इन्हीं गुटों की सरकार थी। उधर सुन्नी गुटों को 38 सीटें मिली हैँ। विश्लेषकों के मुताबिक अनेक मजहबी पंथों और समुदायों में वाले इराक में 2003 के बाद से इसी तरह का बंटा हुआ जनादेश आता रहा है। इसलिए हर बार सरकार बनने में वक्त लगा है। इस बार के चुनाव की खास बात यह है कि मुकतदा अल-सदर सबसे प्रभावशाली नेता बन कर उभरे हैँ।