इनिशिएटिव फॉर द रेजिलिएंट आइलैंड स्टेट्स: छोटे द्वीप देशों की मदद के लिए नई पहल, पीएम मोदी ने पेश की योजना
Initiative for the Resilient Island States : प्रधानमंत्री मोदी ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि पिछले कुछ दशकों ने साबित कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन के प्रकोप से कोई भी अछूता नहीं है। चाहे वे विकसित देश हों या प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर देश, यह सभी के लिए एक बड़ा खतरा है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को छोटे द्वीपीय देशों में आधारभूत ढांचे के विकास के लिए 'इनिशिएटिव फॉर द रेजिलिएंट आइलैंड स्टेट्स' (आईआरआईएस) योजना शुरू की। ग्लासगो सम्मेलन के दूसरे दिन इसकी शुरुआत के मौके पर पीएम ने कहा कि यह एक नई उम्मीद, एक नया विश्वास और सबसे कमजोर देशों के लिए कुछ करने का संतोष देता है।
ग्लासगो जलवायु शिखर सम्मेलन (COP26) में प्रधानमंत्री मोदी के साथ ब्रिटिश पीएम बोरिस जॉनसन भी शामिल हुए। इस नई योजना की शुरुआत के मौके पर ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतेरेस भी मौजूद थे।
जलवायु परिवर्तन बड़ा खतरा
प्रधानमंत्री मोदी ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि पिछले कुछ दशकों ने साबित कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन के प्रकोप से कोई भी अछूता नहीं है। चाहे वे विकसित देश हों या प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर देश, यह सभी के लिए एक बड़ा खतरा है।
छोटे विकासशील द्वीप देशों या एसआईडीएस को जलवायु परिवर्तन के सबसे बड़े खतरे का सामना करना पड़ता है। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो अपने उपग्रह के माध्यम से उनके लिए एक विशेष डेटा विंडो बनाएगी ताकि उन्हें चक्रवातों, कोरल-रीफ निगरानी, तटीय निगरानी आदि के बारे में समय पर जानकारी मिल सके। आईआरआईएस में भारत व ब्रिटेन साझेदार हैं।
इसरो छोटे देशों को देगा चक्रवात की जानकारी, डाटा विंडो बनाएगा
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो ) इन देशों के लिए एक विशेष डाटा विंडो बनाएगा। इसके जरिये इन देशों को चक्रवातों की समय से जानकारी मिल पाएगी। इसके अलावा मूंगे की चट्टानों की निगरानी और समुद्र तटों की निगरानी जैसे काम भी इसरो के उपग्रहों की मदद से किए जाएंगे।
पर्यटन पर प्रभाव
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, इन द्वीपों को पर्यावरण में बदलाव से सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ता है। इन की अर्थव्यवस्था पर्यटन पर निर्भर है, लेकिन लगातार आ रहे चक्रवातों से इस पर असर पड़ता है।
फायदे : तेजी से फंड आजीविका में सुधार
नई पहल के तहत छोटे द्वीपों को प्रौद्योगिकी का स्थानांतरण और जरूरी फंड तेजी से हासिल करना आसान हो जाएगा। गुणवत्तापूर्ण अवसंरचना का विकास होगा, जिससे नागरिकों के जीवन और आजीविका में सुधार होगा।
वैश्विक नेताओं ने जताई चिंता... प्रमुख देशों का वादा, उठाएंगे जलवायु पर असरदार कदम
- ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा कि हमने मौजूदा हालात ऐसे कर दिए हैं, जैसे पृथ्वी पर कोई बम बंधा हो। यह कभी भी फट सकता है। महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने कहा, अब बातों का समय खत्म हो चुका, एक्शन का समय है।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, 2070 तक भारत धरती पर ग्रीन हाउस गैसों को बढ़ाना बंद कर देगा। दुनिया इसे महत्वपूर्ण मान रही है क्योंकि विकासशील अर्थव्यवस्था और विशाल जनसंख्या के बावजूद भारत ने प्रतिबद्धता दर्शाई है।
- ऑस्ट्रेलियाई पीएम स्कॉट मॉरिसन तक 2050 में उनके देश से कार्बन उत्सर्जन शून्य करने का दावा किया, इसे 2005 के मुकाबले 2030 तक 35% घटाया जाएगा।
- रूस : बयान में कहा गया कि 2060 तक उनका देश कार्बन न्यूट्रिलिटी हासिल कर लेगा, यानी यहां से अतिरिक्त उत्सर्जन शून्य किया जाएगा।
- फ्रांस : राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने दुनिया के प्रमुख कार्बन उत्सर्जक देशों को इसका उत्सर्जन शून्य करने के लिए प्रतिबद्धता जताने की चुनौती दी।
- ब्राजील : पर्यावरण मंत्री जोएक्विम लीट ने 2005 के मुकाबले अपने देश से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 43 प्रतिशत घटाने का वादा किया। हालांकि विशेषज्ञों ने दावे पर शक जताया, क्योंकि यहां बीते तीन वर्षों से अमजेन जंगलों को व्यापक पैमाने पर नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
- संयुक्त राष्ट्र संघ : अध्यक्ष एंटोनियो गुटेरस ने कहा कि जितने देश जीवाश्म ईंधन का उपयोग कर रहे हैं, वे मनुष्यों के लिए कब्र खोद रहे हैं।
- अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पेरिस समझौते से बाहर होने पर माफी मांगी। जर्मन चांसलर एंजेला मार्केल ने कहा, कार्बन उत्सर्जन करने वाले देशों को विशेष टैक्स लगाकर इसे रोकना चाहिए।
- अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोस के बनाए 75 हजार करोड़ रुपए के बेजोस अर्थ फंड में से 15 हजार करोड़ रुपए जलवायु परिवर्तन रोकने, कृषि सुधारों और जंगलों को पुनर्जीवित करने के कामों में देने की घोषणा की गई।
वानिकी घोषणापत्र से भारत ने बनाई दूरी
भारत ने 2030 तक वनों की कटाई पर पूरी तरह रोक लगाने संबंधी अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने से दूरी बना ली है। कॉप26 सम्मेलन में दुनिया के 100 से अधिक देशों ने इस घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। इनमें चीन और ब्राजील जैसे बड़े विकासशील देश भी शामिल हैं। वन एवं भूमि से संबंधित ग्लासगो लीडर्स डिक्लेरेशन, सभी हस्ताक्षरकर्ता देशों को इस बात के लिए बाध्य करता है कि वनों की कटाई पर पूरी तरह रोक लगाएं, काटे गए पेड़ों की जगह नए पेड़ लगाएं और भूमि का क्षरण रोकें। इस कार्यक्रम के लिए 14 अरब पौंड की सार्वजनिक और निजी राशि खर्च होगी।
- भारत को इस घोषणा के अंतिम मसौदे में व्यापार के साथ इसे जोड़ने संबंधी कुछ बातों पर आपत्ति थी जिसके कारण उसने हस्ताक्षर नहीं किए। इस घोषणापत्र के अंतिम मसौदे में, टिकाऊ उत्पादन और खपत के परस्पर जुड़े क्षेत्रों में परिवर्तनकारी कार्रवाई; बुनियादी ढांचे का विकास; व्यापार; वित्त और निवेश; और छोटे भागीदारों तथा स्थानीय समुदायों के लिए समर्थन के मुद्दे शामिल हैं।
- मसौदे में कहा गया है, हम सतत विकास, सतत उत्पादन और खपत को बढ़ावा देने वाले अंतरराष्ट्रीय और घरेलू व्यापार और विकास नीतियों को आसान बनाने के अपने साझा प्रयासों को मजबूत करेंगे, जो देशों के साझा हित के लिए जरूरी है। व्यापार के संदर्भ में जोड़े गए इसी पाठ के कारण भारतीय पक्ष में चिंता होने की बात कही जा रही है।