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India-Bangladesh Ties: जमात फैक्टर में उलझी बांग्लादेशी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा; तीस्ता कितना बड़ा मसला?

Wed, 19 Aug 2026 06:32 AM IST
Ashutosh Bhatia आशुतोष भाटिया
Updated Wed, 19 Aug 2026 06:32 AM IST
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India-Bangladesh Ties Prime Minister Rahman India visit and Jamaat factor Teesta River water and other Issues
भारत आएंगे बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान? - फोटो : Amar Ujala Graphics

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बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को सितंबर में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र के लिए आमंत्रित किया गया है। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से द्विपक्षीय यात्रा का निमंत्रण भी दिया गया है। लेकिन ढाका अब तक इस यात्रा का फैसला नहीं कर पाया है। बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय का कहना है कि यात्रा के लिए अनुकूल माहौल बनना जरूरी है और शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा भी उठाया जा रहा है। यह पूरा घटनाक्रम शेख हसीना के साथ ही जमात-ए-इस्लामी फैक्टर से जुड़ा हुआ है। रहमान की दुविधा केवल यह नहीं है कि भारत से उन्हें क्या हासिल करना है। उन्हें यह भी देखना है कि भारत के साथ किसी बड़े मेलमिलाप की घरेलू राजनीतिक कीमत कितनी होगी।

जमात एक बड़ी ताकत
बांग्लादेश के ताजा चुनाव में बीएनपी को स्पष्ट बहुमत मिला और तारिक रहमान पीएम बने, लेकिन जमात-ए-इस्लामी भी तेजी से उभरकर संसद की प्रमुख विपक्षी ताकत बन गई। उसके पास 68 सीटें हैं और उसके अमीर शफीकुर रहमान विपक्ष के नेता हैं। तारिक सरकार चलाने के लिए जमात पर निर्भर नहीं हैं, लेकिन इतनी मजबूत और संगठित इस्लामवादी ताकत को राजनीतिक रूप से नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है। विशेषकर तब, जब बांग्लादेश की राजनीति में भारत-विरोधी भावनाओं को पर्याप्त राजनीतिक वजन मिला है। बांग्लादेश में इस्लामवादी राजनीति का प्रभाव बढ़ गया है।

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जमात को भारत से क्या एतराज है?
जमात का रुख यह नहीं है कि वह भारत से संबंध तोड़ना चाहती है। पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में भारत के साथ पारस्परिक सम्मान और निष्पक्षता के आधार पर संबंधों की बात की थी। समस्या भारत के साथ संबंधों की शर्तों और पुराने राजनीतिक अविश्वास की है। जमात ने हाल के महीनों में भारत के खिलाफ कई मुद्दों पर आक्रामक रुख अपनाया है। इनमें सीमा पर बीएसएफ के साथ हुए विवाद और जल बंटवारा प्रमुख हैं। जून में जमात की अगुवाई वाले 11-दलीय विपक्षी गठबंधन ने बीएसएफ पर बांग्लादेशी नागरिकों की हत्या का आरोप लगाया था।

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तारिक रहमान की दुविधा
तारिक रहमान के सामने अब दो विकल्प हैं। पहला, भारत के साथ व्यावहारिक संबंध का रास्ता है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, व्यापार, सीमापार संपर्क और कनेक्टिविटी के लिए भारत को नजरअंदाज करना मुश्किल है। दूसरा घरेलू राष्ट्रवादी राजनीति का विकल्प है। शेख हसीना को भारत में शरण मिलने और उनके प्रत्यर्पण की मांग के कारण यह मुद्दा अब बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में बेहद संवेदनशील बन गया है। ढाका खुले तौर पर भारत से हसीना के प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है और इसे दोनों देशों के तनाव का प्रमुख कारण बता रहा है। यहीं जमात का दबाव काम कर रहा है। अगर तारिक हसीना पर किसी ठोस आश्वासन के बगैर दिल्ली आते हैं और पीएम मोदी के साथ गर्मजोशी से मिलते हैं, तो जमात के लिए यह आरोप लगाना आसान होगा कि बीएनपी सरकार झुक गई है। इससे जमात-ए-इस्लामी भारत-विरोधी भावनाओं का घरेलू राजनीति में प्रभावी इस्तेमाल कर पाएगी। इसके उलट यदि तारिक दिल्ली जाने से पहले हसीना के प्रत्यर्पण पर कड़ा रुख बनाए रखते हैं, तो वे विपक्ष की आलोचना के सामने अपनी राजनीति मजबूत कर सकते हैं। इसी मजबूरी के कारण ढाका की ओर से ‘अनुकूल माहौल’ बनाने की मांग सामने आ रही है।

भारत की चुनौती
भारत की चुनौती यह है कि बीएनपी सरकार घरेलू राजनीति और भारत के साथ अपने रणनीतिक हितों के बीच संतुलन कैसे बना सकती है। बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने भी तारिक की भारत यात्रा की उम्मीद जताई है। भारत की रणनीति तारिक को भारत के साथ संवाद की मेज पर लाना है। लेकिन तारिक रहमान को यह साबित करना होगा कि भारत से बेहतर संबंध बनाना स्वतंत्र विदेश नीति के कारण है, न कि किसी भारतीय दबाव का नतीजा है। यही वजह है कि ब्रिक्स का निमंत्रण अब साधारण कूटनीतिक निमंत्रण नहीं रह गया है, बल्कि तारिक सरकार की घरेलू राजनीति का बड़ा परीक्षण बन गया है।

तीस्ता मुद्दे पर भारत से संबंध नहीं बिगाड़ेंगे- बांग्लादेशी मंत्री
इधर बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी एनी ने कहा कि उनका देश लंबे समय से लंबित तीस्ता जल बंटवारा समझौते को लेकर भारत के साथ अपने मैत्रीपूर्ण संबंधों में गिरावट नहीं चाहता। उन्होंने नई दिल्ली से अपील की कि अपने हितों के साथ-साथ ढाका के हितों को भी ध्यान में रखा जाए। एनी ने ढाका में ‘सस्टेनेबल मैनेजमेंट ऑफ द तीस्ता रिवर’ विषय पर आयोजित एक संगोष्ठी में कहा कि दोनों पड़ोसी देशों के अपने-अपने हित हैं और एक मित्र देश को दूसरे के हितों का भी ख्याल रखना चाहिए। 

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