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Hezbollah: कैसे लेबनान के गृहयुद्ध से बना हिजबुल्ला, इस्राइल से दुश्मनी क्यों हुई, नसरल्ला के बाद क्या?

Sun, 29 Sep 2024 06:40 AM IST
शिवेंद्र तिवारी स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Sun, 29 Sep 2024 06:40 AM IST
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सार
Hezbollah: हिजबुल्ला का गठन 1980 के दशक में लेबनान के लंबे गृहयुद्ध की अराजकता के दौरान हुआ था। कहा जाता है कि इसे ईरान की मदद से दक्षिणी लेबनान पर इस्राइल के कब्जे से लड़ने के लिए बनाया गया था। इस्राइल के हवाई हमले में हिजबुल्ला के प्रमुख हसन नसरल्ला की मौत हो गई है जिससे संगठन के भविष्य पर सवाल उठ खड़े हुए हैं।
 
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How Hezbollah formed from Lebanon civil war and what next news in hindi
दशकों में इस्राइल और हिजबुल्ला की दुश्मनी की कहानी - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

इन दिनों इस्राइल और हिजबुल्ला की जंग पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई है। इस्राइली सेना ने हिजबुल्ला के प्रमुख हसन नसरल्ला को मार गिराया है। लेबनान में हिजबुल्ला के मुख्यालय में किए हवाई हमले में नसरल्ला की मौत हुई है। इस्राइली मीडिया का दावा है कि इसी हमले में नसरल्ला की बेटी की भी मौत हुई है।


पिछले साल 7 अक्टूबर को इस्राइल-हमास युद्ध शुरू होने के बाद से ही हिजबुल्ला ने सीमा पर इस्राइली सैन्य चौकियों पर हमला करना शुरू कर दिया। हिजबुल्ला हमास के समर्थन में लगभग एक साल से उत्तरी इस्राइल में हवाई हमले कर रहा है। जवाबी कार्रवाई में इस्राइल ने हिजबुल्ला के मुखिया समेत कई कमांडरों को ढेर कर दिया है। 


आइये जानते हैं कि हिजबुल्ला क्या है? यह संगठन बना कैसे? इसकी शुरुआत किसने की? बाद में हिजबुल्ला का विस्तार कैसे हुआ? यह कितना ताकतवर है? इस्राइल से इसकी अदावत कितनी पुरानी है? संगठन के मुखिया की कैसे मौत हुई है? अब इसका आगे क्या होगा?

क्या है हिजबुल्ला? 
हिजबुल्ला लेबनान में मौजूद एक शिया मुस्लिम सशस्त्र समूह और यहां की संसद में एक राजनीतिक दल है। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और इस्राइल जैसे कई देशों ने हिजबुल्ला को एक आतंकवादी संगठन घोषित किया है। यूरोपीय संघ ने हिजबुल्ला की 'सैन्य शाखा' को आतंकवादी संगठन घोषित किया है। इसका मानना है कि सैन्य शाखा और संगठन की राजनीतिक शाखा के बीच अंतर है।



हिजबुल्ला का गठन 1980 के दशक में लेबनान के लंबे गृहयुद्ध के दौरान हुआ था। कहा जाता है कि इसे ईरान की मदद से दक्षिणी लेबनान पर इस्राइल के कब्जे से लड़ने के लिए बनाया गया था। हिजबुल्ला लेबनान में एक शक्तिशाली राजनीतिक और लड़ाकू शक्ति के रूप में उभरा है। इसके साथ ही समूह ने सीरिया, इराक, यमन और पश्चिम एशिया में अन्य जगहों पर अपने गुट का विस्तार किया है। लेबनान में इसके पास अपने समूह को ताकतवर बनाने के लिए एक व्यापक बुनियादी ढांचा है। इसमें सामाजिक सेवाओं, संचार और आंतरिक सुरक्षा के लिए बनाए गए दफ्तर शामिल हैं। हिजबुल्ला का लेबनान के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण है, जिसमें उत्तरी इस्राइल की सीमा पर मौजूद दक्षिणी लेबनान भी शामिल है।

हसन नसरल्ला
हसन नसरल्ला - फोटो : AMAR UJALA
कैसे हुई थी हिजबुल्ला की शुरुआत?
हिजबुल्ला की जड़ें पश्चिमी एशिया में भूमध्य सागर के पूर्वी तट पर स्थित लेबनान में हैं। इसके उत्तर और पूर्व में सीरिया और दक्षिण में इस्राइल स्थित है। देश 1975 में विभिन्न धार्मिक समुदायों के एक भयंकर गृहयुद्ध से जकड़ गया और यहीं से शुरू होती है हिजबुल्ला के बनने की कहानी। लेबनान में गृहयुद्ध क्यों शुरू हुआ, इसके पीछे यहां का राजनीतिक समझौता था। 1943 में एक राजनीतिक समझौता हुआ था जिसके तहत लेबनान की सत्ता यहां के प्रमुख धार्मिक समूहों के बीच बांटी जाती है। इसमें एक सुन्नी मुस्लिम प्रधानमंत्री, एक मैरोनाइट ईसाई राष्ट्रपति और एक शिया मुस्लिम संसद अध्यक्ष बनता है। मैरोनाइट ईसाई पूर्वी भूमध्यसागरीय और पश्चिम एशिया के लेवंत क्षेत्र के मूल निवासी हैं, जिनके लोग पारंपरिक रूप से मैरोनाइट चर्च से जुड़े होते हैं। 

अमेरिकी थिंक टैंक काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (सीएफआर) ने एक लेख में बताया कि कई वजहें रहीं जिससे लेबनान में इन धार्मिक समूहों के बीच जातीय संतुलन बिगड़ गया। एक ओर जहां फलस्तीनी शरणार्थियों के आने से सुन्नी आबादी बढ़ गई तो वहीं शियाओं ने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ ईसाई अल्पसंख्यक ने उन्हें हाशिए पर रखा। लेबनान में बड़ी संख्या में सशस्त्र फलस्तीनियों की मौजूदगी को लेकर लंबे समय तक असंतोष चला जो 1975 में उबाल की स्थिति में पहुंच गया। 

अंदरूनी लड़ाई के बीच इस्राइली सेना ने 1978 में और फिर 1982 में दक्षिणी लेबनान पर हमला किया। इस्राइल ने यह हमला फलस्तीनी गुरिल्ला लड़ाकों को खदेड़ने के लिए किया था जो इस्राइल पर हमला करने के लिए इस क्षेत्र को बतौर आधार इस्तेमाल करते थे।

उसी समय ईरान में शिया सरकार सत्ता में आई। इसी सरकार से प्रभावित शियाओं के एक समूह ने इस्राइली कब्जे के खिलाफ लड़ाई शुरू कर दी। अरब देशों में अपने प्रभाव का विस्तार करने का अवसर देखकर ईरान और उसकी सेना इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने एक नए सशस्त्र गुट को धन और प्रशिक्षण प्रदान किया जिसका नाम पड़ा 'हिजबुल्ला'।

आगे चलकर हिजबुल्ला ने अमल आंदोलन जैसे विरोधी शिया समूहों और विदेशी ठिकानों पर हमले करने शुरू कर दिए। इसके हमलों के साथ-साथ 1983 में बेरूत में अमेरिकी और फ्रांसीसी सैनिकों के बैरकों पर आत्मघाती बम विस्फोट किए जिसमें तीन सौ से अधिक लोग मारे गए। सीएफआर के अनुसार, इन्हीं वर्षों में हिजबुल्ला ईरान के लिए एक अहम हथियार बन गया।

हिजबुल्ला की विचारधारा क्या है?
हिजबुल्ला खुद को शिया प्रतिरोध आंदोलन बताता है और इसने 1985 के घोषणापत्र में अपनी विचारधारा को शामिल किया था। इस घोषणापत्र में लेबनान से पश्चिमी शक्तियों को बाहर निकालने, इस्राइल को खत्म करने का आह्वान और ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रति निष्ठा जैसी बातें कही गई थीं।

हिजबुल्ला को चलाता कौन है?
अभी तक हिजबुल्लाह की कमान मौलवी हसन नसरल्ला के हाथों में थी। नसरल्ला ने 1992 में तत्कालीन मुखिया अब्बास अल-मुसावी की हत्या के बाद संगठन के महासचिव का पद संभाला था। इस्राइल ने समूह के सह-संस्थापक मुसावी को एक हेलीकॉप्टर हमले में मार गिराया था। नसरल्ला सात सदस्यीय शूरा परिषद और इसकी पांच उप-परिषदों की देखरेख करता था। अमेरिकी विदेश मंत्रालय का अनुमान है कि दुनिया भर में हिजबुल्ला के हजारों सदस्य और अन्य समर्थक हैं।

हिजबुल्ला लेबनान के शिया-बहुल क्षेत्रों पर नियंत्रण रखता है, जिसमें बेरूत, दक्षिणी लेबनान और पूर्वी बेका घाटी क्षेत्र के कुछ हिस्से शामिल हैं। भले ही हिजबुल्ला लेबनान में स्थित है, लेकिन इसकी जड़ें कई देशों में हैं। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अनुसार, ईरान हिजबुल्ला को प्रशिक्षण, हथियार और वित्तपोषण का अधिकांश हिस्सा प्रदान करता है। समूह को ईरान से हर साल करोड़ों डॉलर मिलते हैं। हिजबुल्ला को सीरिया में बशर अल-असद की सरकार से भी कुछ सहायता मिलती है। 

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज ने 2020 में अनुमान लगाया था कि हिजबुल्ला के पास 20 हजार सक्रिय लड़ाके और कुछ 20 हजार रिजर्व हैं, जिनके पास छोटे हथियार, टैंक, ड्रोन और कई लंबी दूरी के रॉकेट हैं। इस्राइल के इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज के विश्लेषक और ब्रिगेडियर जनरल (रिटा.) असफ ओरियन का कहना है कि हिजबुल्ला के पास अधिकांश देशों की तुलना में तोपों का एक बड़ा शस्त्रागार है। जून 2024 में विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया कि हिजबुल्ला के पास विभिन्न रेंज के 150,000-200,000 रॉकेट और मिसाइल हैं।

लेबनान की राजनीति में इसकी क्या भूमिका रही है?
हिजबुल्ला 1992 से लेबनानी सरकार का हिस्सा है। 1992 में इसके आठ सदस्य संसद के लिए चुने गए थे और इसकी राजनीतिक शाखा ने 2005 से कैबिनेट पदों पर कब्जा किया। पार्टी ने 2009 में एक अपडेटेड घोषणापत्र के साथ मुख्यधारा की राजनीति में आने की बात कही। सबसे हालिया राष्ट्रीय चुनाव, 2022 में हिजबुल्ला ने लेबनान की 128 सदस्यीय संसद में 13 सीटें जीतीं लेकिन उसके सहयोगियों ने अपना बहुमत खो दिया।

हिजबुल्ला और इस्राइल के संबंध कैसे रहे?
हिजबुल्ला इस्राइल को सबसे बड़ा दुश्मन मानता है, जिसकी शुरुआत 1978 में दक्षिणी लेबनान पर इस्राइल के 'कब्जे' से हुई थी। हिजबुल्ला को विदेशों में यहूदी और इस्राइली ठिकानों पर हमलों के लिए दोषी ठहराया गया है। अर्जेंटीना में एक यहूदी सामुदायिक केंद्र पर 1994 में कार बम विस्फोट में 85 लोग मारे गए थे। लंदन में इस्राइली दूतावास पर बमबारी का भी आरोप है। 2000 में दक्षिणी लेबनान से आधिकारिक रूप से हटने के बाद भी इस्राइल और हिजबुल्ला की लड़ाई होती रही है। हिजबुल्ला और इस्राइली सेना के बीच समय-समय पर होने वाला संघर्ष 2006 में एक महीने तक चलने वाले युद्ध में बदल गया। इस दौरान हिजबुल्ला ने इस्राइली क्षेत्र में हजारों रॉकेट दागे।

समूह ने 2009 के अपने घोषणापत्र में इस्राइली को खत्म करने की बात दोहराई। दिसंबर 2018 में इस्राइल ने लेबनान से उत्तरी इस्राइल में जाने वाली कई मील लंबी सुरंगों का खुलासा किया, जिसके बारे में उसका दावा था कि उन्हें हिजबुल्ला ने बनाया था। 2019 में हिजबुल्ला ने एक इस्राइली सेना के अड्डे पर हमला किया। चार साल से अधिक समय में पहली बार सीमा पार हमला था। अगस्त 2021 में हिजबुल्ला ने लेबनान में इस्राइली हवाई हमलों के जवाब में एक दर्जन से अधिक रॉकेट दागे। यह पहली बार था जब समूह ने 2006 के इस्राइल-हिजबुल्ला युद्ध के बाद से इस्राइल में दागे गए रॉकेटों की जिम्मेदारी ली।

इस्राइल-हमास युद्ध के बीच हिजबुल्ला क्यों कूदा?
फलस्तीनी समूह हमास ने 7 अक्तूबर 2023 को इस्राइल में हमले किए थे, जिसमें लगभग 1,200 लोग मारे गए थे और इसके बाद से ही गाजा में जंग छिड़ी हुई है। हिजबुल्ला ने हमास का समर्थन करने के लिए 8 अक्तूबर को इस्राइल पर रॉकेट दागना शुरू कर दिया। तब से इस्राइल और हिजबुल्ला के बीच गोलीबारी जारी है। इस्राइली सेना लगातार हमलों से हिजबुल्ला इस्राइल-लेबनान सीमा से और पीछे हटाना चाहती है। फिलहाल, ऐसा होता नहीं दिख रहा है। हिजबुल्ला ने कहा है कि वह तब तक अपने हमले जारी रखेगा जब तक कि इस्राइल और हमास के बीच गाजा में युद्ध विराम पर सहमति नहीं बन जाती।

2024 में इस्राइल-हिजबुल्ला के बीच टकराव और तनाव केवल तेज हुआ है। इस्राइल ने जुलाई के अंत में गोलान हाइट्स में मिसाइल हमले के लिए हिजबुल्ला को दोषी ठहराया जिसमें 12 बच्चे मारे गए। इस्राइल ने इसके तुरंत बाद बेरूत में हिजबुल्ला के एक वरिष्ठ कमांडर फुआद शुक्र को निशाना बनाकर जवाब दिया। सितंबर में इस्राइल ने लेबनान में हिजबुल्ला के सैन्य बुनियादी ढांचे पर हवाई हमले भी तेज कर दिए। इसी कड़ी में 27 सितंबर को इस्राइली सेना ने हिजबुल्ला के प्रमुख हसन नसरल्ला को मार गिराया। 

नसरल्ला के मारे जाने के बाद हिजबुल्ला का क्या होगा?
इस्राइल के हालिया हमलों में हिजबुल्ला के कई शीर्ष कमांडरों की मौत हो गई है जिससे इसकी आंतरिक सुरक्षा पर सवाल उठ खड़े हुए हैं। इसके बाद नसरल्ला की मौत हिजबुल्ला के लिए पिछले कई वर्षों की तुलना में कहीं अधिक बड़ी चुनौती बन गई है। बेरूत स्थित कार्नेगी मध्य पूर्व केंद्र के उप अनुसंधान निदेशक मोहनद हेज अली ने न्यूज एजेंसी रॉयटर्स से कहा कि पूरा परिदृश्य बड़े पैमाने पर बदल जाएगा। नसरल्ला एक बड़े संगठन को एक साथ जोड़े रखने वाला गोंद रहा है।

लंदन के चैथम हाउस पॉलिसी इंस्टीट्यूट की एसोसिएट फेलो लीना खातिब ने कहा कि नसरल्ला के मारे जाने से हिजबुल्ला का पतन नहीं होगा, लेकिन यह समूह के मनोबल के लिए एक बड़ा झटका होगा। दूसरी ओर यह इस्राइल की सुरक्षा और सैन्य श्रेष्ठता और पहुंच को भी बताता है। खातिब ने कहा कि इस्राइल इस दबाव को एक नई यथास्थिति में बदलना चाहेगा, जिसमें उसका उत्तरी हिस्सा सुरक्षित हो, लेकिन यह जल्दी नहीं होगा, भले ही नसरल्ला खत्म हो गया। हिजबुल्ला ने बेरूत हमले के बाद कुछ घंटों में इस्राइल पर कई रॉकेट हमले किए। विश्लेषकों का कहना है कि यह दिखाने का प्रयास था कि वह अभी भी ऐसे हमले कर सकता है।

विशेषज्ञ फिलिप स्मिथ ने अगले नेतृत्व के बारे में कहा कि किसी भी नए नेता को लेबनान में संगठन के भीतर और साथ ही ईरान में इसके समर्थकों के बीच भी स्वीकार्य होना होगा। 
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