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US: मच्छरों की आबादी घटाने के लिए गूगल ने निकाली गजब तरकीब, बीमारी वाली प्रजातियों के खात्मे की बनाई योजना
Sat, 13 Jun 2026 05:42 AM IST
Devesh Tripathi
अमर उजाला नेटवर्क, वॉशिंगटन।
अमर उजाला नेटवर्क, वॉशिंगटन।
Published by: Devesh Tripathi
Updated Sat, 13 Jun 2026 05:42 AM IST
सार
अमेरिका में मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए एक नई जैविक तकनीक पर विचार किया जा रहा है। इसके तहत विशेष बैक्टीरिया से संक्रमित नर मच्छरों को प्राकृतिक वातावरण में छोड़ा जाएगा। ये मच्छर इंसानों को नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन जंगली मादा मच्छरों के साथ प्रजनन के बाद उनकी संतानों का विकास रुक जाता है, जिससे समय के साथ मच्छरों की संख्या घट सकती है।
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बीमारी फैलाने वाले मच्छरों के खात्मे के लिए गूगल ने बनाई योजना
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/ANI
विस्तार
मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों पर नियंत्रण के लिए अमेरिका में एक अनोखी योजना सामने आई है। तकनीकी कंपनी गूगल ने अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) से फ्लोरिडा और कैलिफोर्निया में करोड़ों नर मच्छरों को छोड़ने की अनुमति मांगी है। इन मच्छरों को इस तरह तैयार किया गया है कि वे जंगली मादा मच्छरों के साथ प्रजनन तो करें, लेकिन उनकी संतानों का विकास न हो सके।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे समय के साथ स्थानीय मच्छर आबादी में बड़ी गिरावट आ सकती है। अमेरिकी फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित आवेदन और उससे जुड़ी जानकारी के अनुसार यह प्रस्तावित परीक्षण अमेरिका में मच्छर नियंत्रण के लिए एक नई जैविक रणनीति की व्यवहारिकता को परखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
फ्लोरिडा और कैलिफोर्निया जैसे राज्यों में गर्म मौसम और स्थिर जल स्रोत मच्छरों के प्रजनन के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करते हैं। गूगल जिन नर मच्छरों को छोड़ना चाहता है, उनमें वोल्बाकिया नामक बैक्टीरिया मौजूद है। यह सूक्ष्मजीव पृथ्वी पर पाई जाने वाली लगभग आधी कीट प्रजातियों में स्वाभाविक रूप से पाया जाता है और मनुष्यों या अन्य कशेरुकी (वर्टिब्रेट्स) जीवों को संक्रमित नहीं करता।
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प्रजनन के बावजूद नहीं हो पाएगा संतानों का विकास, लोगों को राहत
वैज्ञानिकों ने केवल नर मच्छरों को छोड़ने की योजना बनाई है क्योंकि नर मच्छर खून नहीं चूसते और इंसानों को नहीं काटते। वे पौधों के रस पर जीवित रहते हैं और उनका मुख्य उद्देश्य मादा मच्छरों के साथ प्रजनन करना होता है। जब वोल्बाकिया से संक्रमित नर मच्छर किसी ऐसी जंगली मादा के साथ प्रजनन करता है जिसमें वही बैक्टीरिया नहीं होता, तो अंडों का विकास नहीं हो पाता। वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को साइटोप्लाज्मिक इनकम्पैटिबिलिटी कहते हैं। सरल शब्दों में बैक्टीरिया की असंगति भ्रूण बनने की प्रक्रिया को रोक देती है।
दुनिया के अन्य देशों में मिले उत्साहजनक परिणाम
इस तकनीक का सबसे मजबूत प्रमाण सिंगापुर और चीन जैसे देशों में हुए परीक्षणों से मिला है। सिंगापुर में तीन वर्षों तक चले एक अध्ययन में डेंगू फैलाने वाले मच्छरों की स्थानीय आबादी में 90 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की गई। कई क्षेत्रों में डेंगू संक्रमण के मामलों में भी 70 से 90 प्रतिशत तक गिरावट देखी गई। चीन में इसी तकनीक से एशियाई टाइगर मच्छर की आबादी को लगभग समाप्त करने में सफलता हासिल की।
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वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे समय के साथ स्थानीय मच्छर आबादी में बड़ी गिरावट आ सकती है। अमेरिकी फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित आवेदन और उससे जुड़ी जानकारी के अनुसार यह प्रस्तावित परीक्षण अमेरिका में मच्छर नियंत्रण के लिए एक नई जैविक रणनीति की व्यवहारिकता को परखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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फ्लोरिडा और कैलिफोर्निया जैसे राज्यों में गर्म मौसम और स्थिर जल स्रोत मच्छरों के प्रजनन के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करते हैं। गूगल जिन नर मच्छरों को छोड़ना चाहता है, उनमें वोल्बाकिया नामक बैक्टीरिया मौजूद है। यह सूक्ष्मजीव पृथ्वी पर पाई जाने वाली लगभग आधी कीट प्रजातियों में स्वाभाविक रूप से पाया जाता है और मनुष्यों या अन्य कशेरुकी (वर्टिब्रेट्स) जीवों को संक्रमित नहीं करता।
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प्रजनन के बावजूद नहीं हो पाएगा संतानों का विकास, लोगों को राहत
वैज्ञानिकों ने केवल नर मच्छरों को छोड़ने की योजना बनाई है क्योंकि नर मच्छर खून नहीं चूसते और इंसानों को नहीं काटते। वे पौधों के रस पर जीवित रहते हैं और उनका मुख्य उद्देश्य मादा मच्छरों के साथ प्रजनन करना होता है। जब वोल्बाकिया से संक्रमित नर मच्छर किसी ऐसी जंगली मादा के साथ प्रजनन करता है जिसमें वही बैक्टीरिया नहीं होता, तो अंडों का विकास नहीं हो पाता। वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को साइटोप्लाज्मिक इनकम्पैटिबिलिटी कहते हैं। सरल शब्दों में बैक्टीरिया की असंगति भ्रूण बनने की प्रक्रिया को रोक देती है।
दुनिया के अन्य देशों में मिले उत्साहजनक परिणाम
इस तकनीक का सबसे मजबूत प्रमाण सिंगापुर और चीन जैसे देशों में हुए परीक्षणों से मिला है। सिंगापुर में तीन वर्षों तक चले एक अध्ययन में डेंगू फैलाने वाले मच्छरों की स्थानीय आबादी में 90 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की गई। कई क्षेत्रों में डेंगू संक्रमण के मामलों में भी 70 से 90 प्रतिशत तक गिरावट देखी गई। चीन में इसी तकनीक से एशियाई टाइगर मच्छर की आबादी को लगभग समाप्त करने में सफलता हासिल की।