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ग्लोबल मिनिमम टैक्स: जी-20 वित्त मंत्रियों की बैठक में चीन के रुख पर नजर, दे चुका है 'रजामंदी'

Thu, 08 Jul 2021 06:33 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वेनिस
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वेनिस Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 08 Jul 2021 06:33 PM IST
सार

चीन में कॉरपोरेट टैक्स की दर तकनीकी रूप से 25 फीसदी है। लेकिन कुछ हाई-टेक कंपनियों के लिए ये दर 15 फीसदी ही है। इस दर के बावजूद चीन अपने बड़े बाजार के कारण दुनियाभर के बड़े निवेशकों को आकर्षित करने में सफल रहा है।

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global minimum tax system will be The main agenda in the meeting of foreign ministers of the G-20 countries in Venice, Italy
जी-20 सम्मेलन - फोटो : Getty Images (file Photo)

विस्तार

इटली के शहर वेनिस में शुक्रवार और शनिवार को होने वाली जी-20 देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में मुख्य एजेंडा वैश्विक न्यूनतम कर (ग्लोबल मिनिमम टैक्स) की व्यवस्था को और अधिक ठोस रूप देना रहेगा। अब तक 131 देश इस योजना पर अपनी सहमति जता चुके हैं, लेकिन ये कर व्यवस्था वास्तव में कैसे लागू होगी, इस बारे में अभी ठोस खाका नहीं उभरा। भारत और चीन समेत जी-20 में शामिल लगभग सभी देश सैद्धांतिक तौर पर इस योजना पर सहमत हो चुके हैं। इसलिए वेनिस बैठक से ये उम्मीद की जा रही है कि इन देशों के वित्त मंत्री यहां इसका ब्लू प्रिंट (खाका) तैयार करने की कोशिश करेंगे। इटली के वित्त मंत्री डेनियेल फ्रांको ने बुधवार को उम्मीद जताई कि इस बैठक में 'अंतरराष्ट्रीय टैक्स ढांचे में बुनियादी बदलाव लाने' पर वित्त मंत्रियों के बीच राजनीतिक सहमति बन जाएगी।

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इस बैठक में सबसे ज्यादा निगाहें चीन के रुख पर रहेंगी। हालांकि चीन ने इस योजना को अपनी रजामंदी दे दी है, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि उसका व्यावहारिक रुख पश्चिमी देशों के साथ उसके संबंधों की भावी दिशा से तय होगा। उनके मुताबिक चीन ने इस योजना पर अपनी शुरुआती सहमति इसलिए दी है कि क्योंकि वह पश्चिमी देशों के साथ बेहतर रिश्ते चाहता है। साथ ही वह वैश्विक नेतृत्व में भूमिका निभाना चाहता है।
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ग्लोबल मिनिमम टैक्स सिस्टम के तहत ये व्यवस्था करने का इरादा है कि दुनिया की 100 सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने मुनाफे का कम से कम 15 फीसदी टैक्स देने के लिए मजबूर किया जाए। चीन के भीतर कॉरपोरेट टैक्स की दर तकनीकी रूप से 25 फीसदी है। लेकिन कुछ हाई-टेक कंपनियों के लिए ये दर 15 फीसदी ही है। इस दर के बावजूद चीन अपने बड़े बाजार के कारण दुनियाभर के बड़े निवेशकों को आकर्षित करने में सफल रहा है।
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दूसरी तरफ चीन की बड़ी कंपनियों का ज्यादातर कारोबार पश्चिमी देशों में ही है। यानी उन देशों में उनकी पहुंच कम है, जिन्हें टैक्स हैवेन कहा जाता है। बीजिंग स्थित सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ फाइनेंस एंड इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर और टैक्स विशेषज्ञ काई चांग ने हांगकांग के अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से कहा- ‘मेरी राय में चीन को ये कर व्यवस्था स्वीकार्य है, क्योंकि यहां प्रिफरेंशियल टैक्स रेट पहले से ही 15 फीसदी है। ऐसे में ग्लोबल मिनिमम टैक्स रेट तय होने से चीन को फायदा ही होगा।’

विश्लेषकों के मुताबिक चीन की असल आर्थिक ताकत उसकी मैनुफैक्चरिंग क्षमता और उसका बड़ा उपभोक्ता बाजार है। इसी वजह से न्यूनतम टैक्स दर 15 फीसदी रहने के बावजूद वहां कारोबार के लिए आने वाली बड़ी विदेशी कंपनियों की कमी नहीं रही है। चीनी कंपनियों का ज्यादातर निवेश इस समय चीन की बेल्ट एंड रोज इनिशिएटिव परियोजना में हो रहा है। इसमें पहले से ही टैक्स रेट टैक्स हैवेन देशों में लगने वाले कर से ज्यादा है। इसलिए चीन का आकलन यह है कि नई व्यवस्था से उसे कोई नुकसान नहीं होगा।


विश्लेषकों के मुताबिक इसके बावजूद चीन इस मामले में कूटनीतिक दांव चल सकता है। वह इस व्यवस्था को समर्थन देने के बदले पश्चिमी देशों से उसके प्रति रुख नरम करने की मांग कर सकता है। इसीलिए पर्यवेक्षकों की निगाहें वेनिस बैठक और वहां सामने आने वाले चीन के रुख पर टिकी रहेंगी।

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