{"_id":"67bc81727f2989ba3e016f3e","slug":"germany-election-chancellor-rule-cdu-friedrich-merz-emerges-afd-top-parties-spd-olaf-scholz-india-and-world-2025-02-24","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"Germany Election: 16 साल मर्केल राज, अब दो चुनाव में बदलीं दो सरकार; दुनिया के लिए नतीजों के क्या मायने? जानें","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
Germany Election: 16 साल मर्केल राज, अब दो चुनाव में बदलीं दो सरकार; दुनिया के लिए नतीजों के क्या मायने? जानें
Mon, 24 Feb 2025 08:00 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Mon, 24 Feb 2025 08:00 PM IST
सार
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर जर्मनी में चुनाव के नतीजे क्या रहे हैं? इन नतीजों के पीछे की क्या वजहें रहीं? इसके अलावा जर्मनी में राष्ट्राध्यक्ष को सबसे अलग शीर्षक- चांसलर क्यों मिला है? इसके अलावा जर्मनी के चुनावी नतीजों का भारत और दुनिया पर क्या असर पड़ने वाला है? आइये जानते हैं...
विज्ञापन
जर्मनी चुनाव और भारत पर प्रभाव।
- फोटो : अमर उजाला
Please wait...
विस्तार
जर्मनी में आम चुनावों के नतीजे आ चुके हैं। देश में एक बार फिर क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) और उसकी सहयोगी पार्टी क्रिश्चियन सोशल यूनियन (सीएसयू) की जीत हुई है। बता दें कि यह जर्मनी की पूर्व चांसलर एंजेला मर्केल की पार्टी है, जिसने जर्मनी पर 2005 से लेकर 2021 तक शासन किया था। हालांकि, पिछले दो चुनाव के नतीजों को देखा जाए तो जर्मनी में उथल-पुथल का दौर देखा गया है। 2021 और 2025 के लगातार दो चुनावों में जर्मनी में चुनावी परिदृश्य बदला है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर जर्मनी में चुनाव के नतीजे क्या रहे हैं? इन नतीजों के पीछे की क्या वजहें रहीं? इसके अलावा जर्मनी में राष्ट्राध्यक्ष को सबसे अलग शीर्षक- चांसलर क्यों मिला है? इसके अलावा जर्मनी के चुनावी नतीजों का भारत और दुनिया पर क्या असर पड़ने वाला है? आइये जानते हैं...
विज्ञापन
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर जर्मनी में चुनाव के नतीजे क्या रहे हैं? इन नतीजों के पीछे की क्या वजहें रहीं? इसके अलावा जर्मनी में राष्ट्राध्यक्ष को सबसे अलग शीर्षक- चांसलर क्यों मिला है? इसके अलावा जर्मनी के चुनावी नतीजों का भारत और दुनिया पर क्या असर पड़ने वाला है? आइये जानते हैं...
विज्ञापन
जर्मनी के चुनावों के क्या नतीजे रहे?
जर्मनी में वोटों की गिनती पूरी होने में कुछ दिन लग सकते हैं। हालांकि, अब तक जो नतीजे आए हैं, उसके मुताबिक,
जर्मनी में वोटों की गिनती पूरी होने में कुछ दिन लग सकते हैं। हालांकि, अब तक जो नतीजे आए हैं, उसके मुताबिक,
- दक्षिणपंथी- क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी (सीडीपी) और क्रिश्चयन सोशल यूनियन (सीएसयू) को निर्णायक बढ़त मिली है। सीडीयू के नेता फ्रेडरिक मेर्ज इस चुनाव में चांसलर पद के उम्मीदवार थे। इन दोनों पार्टियों को चुनाव में कुल 28.6 फीसदी वोट मिले हैं।
- वहीं, सत्तासीन सेंटर-लेफ्ट सोशल डेमोक्रेट्स पार्टी (एसपीडी) को महज 16.4 फीसदी वोट मिले हैं। यह पिछली बार के 25.7 फीसदी वोट के मुकाबले बड़ी गिरावट है। इस पार्टी के नेता ओलाफ शोल्ज जर्मनी के चांसलर थे।
- इन दोनों मुख्य पार्टियों के अलावा अति-दक्षिणपंथी पार्टी 'एएफडी' इस बार दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। उसे 20.8 फीसदी वोट हासिल हुए हैं, जो कि पिछली बार के मुकाबले दोगुने हैं।
- पिछले चुनाव में एसपीडी के साथ गठबंधन में शामिल रही फ्री डेमोक्रेटिक पार्टी (एफडीपी) और को भारी नुकसान हुआ है। पिछले चुनाव में उसे 11.4 फीसदी वोट मिले थे, जबकि इस बार उसे 4.3% वोट मिले हैं और संसद में उसे जगह नहीं मिलेगी।
जर्मनी में किस तरह की सरकार बन सकती है?
जर्मनी में इस वक्त संसद में 630 सीटें हैं। इस लिहाज से बहुमत का आंकड़ा 316 है। हालांकि, इस बार आम चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला है। जहां सीडीयू/सीएसयू सबसे ज्यादा वोट हासिल करने के बावजूद 208 सीटें मिली हैं, वहीं दूसरे नंबर पर रही एएफडी को 152 सीटें मिली हैं। इसके अलावा बीते पांच साल जर्मनी पर शासन करने वाली एसपीडी 120 सीटों पर सिमट गई। ग्रीन पार्टी को 85 सीटें और लेफ्ट पार्टी को 64 सीटें हासिल हुई हैं।
जर्मनी में इस वक्त संसद में 630 सीटें हैं। इस लिहाज से बहुमत का आंकड़ा 316 है। हालांकि, इस बार आम चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला है। जहां सीडीयू/सीएसयू सबसे ज्यादा वोट हासिल करने के बावजूद 208 सीटें मिली हैं, वहीं दूसरे नंबर पर रही एएफडी को 152 सीटें मिली हैं। इसके अलावा बीते पांच साल जर्मनी पर शासन करने वाली एसपीडी 120 सीटों पर सिमट गई। ग्रीन पार्टी को 85 सीटें और लेफ्ट पार्टी को 64 सीटें हासिल हुई हैं।
जर्मनी में युवाओं को पसंद अतिवादी पार्टियां
जर्मन मीडिया के विश्लेषण के मुताबिक, इस बार देश में 18 से 24 साल के युवाओं ने मध्यमार्गीय पार्टियों की जगह अतिवादी राजनीतिक दलों को वोट दिया। खासकर अति-दक्षिणपंथी एएफडी को, जिसे युवाओं के 21 फीसदी वोट मिले। इसके अलावा अति-वामपंथी- लेफ्ट पार्टी को युवाओं के 25% वोट मिले। एसपीडी (12%) और सीडीयू (13%) को युवा वोटरों से उतना समर्थन नहीं मिला, जिसकी उन्होंने आशा की थी।
वहीं, 60 साल ऊपर के लोगों में एसपीडी और सीडीयू का समर्थन पारंपरिक तौर पर ज्यादा रहा, जबकि अतिवादी पार्टियों का समर्थन भी अच्छा-खासा देखा गया।
जर्मन मीडिया के विश्लेषण के मुताबिक, इस बार देश में 18 से 24 साल के युवाओं ने मध्यमार्गीय पार्टियों की जगह अतिवादी राजनीतिक दलों को वोट दिया। खासकर अति-दक्षिणपंथी एएफडी को, जिसे युवाओं के 21 फीसदी वोट मिले। इसके अलावा अति-वामपंथी- लेफ्ट पार्टी को युवाओं के 25% वोट मिले। एसपीडी (12%) और सीडीयू (13%) को युवा वोटरों से उतना समर्थन नहीं मिला, जिसकी उन्होंने आशा की थी।
वहीं, 60 साल ऊपर के लोगों में एसपीडी और सीडीयू का समर्थन पारंपरिक तौर पर ज्यादा रहा, जबकि अतिवादी पार्टियों का समर्थन भी अच्छा-खासा देखा गया।
चुनाव नतीजों के बाद जर्मनी में आगे क्या होगा?
जर्मनी में अब अलग-अलग पार्टियों के बीच गठबंधन बनाने पर चर्चा होगी। विशेषज्ञों के मुताबिक, जर्मनी की मुख्यधारा की दक्षिणपंथी पार्टी सीडीयू/सीएसयू ने एएफडी के साथ गठबंधन में न जाने का दावा किया है। हालांकि, एएफडी को मिले जबरदस्त वोटों की वजह से स्थिति जटिल हो गई है। सीडीयू/सीएसयू अगर एएफडी के साथ गठबंधन करती हैं तो गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिल जाएगा। हालांकि, मेर्ज इस गठबंधन को पार्टी के मूल विचार के खिलाफ करार दे चुके हैं।
दूसरी तरफ सीडीयू/सीएसयू अब विपक्षी एसपीडी से भी गठबंधन की राह तलाश सकते हैं। इतना ही नहीं इस गठबंधन में ग्रीन पार्टी भी जुड़ सकती है। हालांकि, यह गठबंधन विचारधारा के अलगाव की वजह से कम लोकप्रिय हो सकता है।
जर्मनी में अब अलग-अलग पार्टियों के बीच गठबंधन बनाने पर चर्चा होगी। विशेषज्ञों के मुताबिक, जर्मनी की मुख्यधारा की दक्षिणपंथी पार्टी सीडीयू/सीएसयू ने एएफडी के साथ गठबंधन में न जाने का दावा किया है। हालांकि, एएफडी को मिले जबरदस्त वोटों की वजह से स्थिति जटिल हो गई है। सीडीयू/सीएसयू अगर एएफडी के साथ गठबंधन करती हैं तो गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिल जाएगा। हालांकि, मेर्ज इस गठबंधन को पार्टी के मूल विचार के खिलाफ करार दे चुके हैं।
दूसरी तरफ सीडीयू/सीएसयू अब विपक्षी एसपीडी से भी गठबंधन की राह तलाश सकते हैं। इतना ही नहीं इस गठबंधन में ग्रीन पार्टी भी जुड़ सकती है। हालांकि, यह गठबंधन विचारधारा के अलगाव की वजह से कम लोकप्रिय हो सकता है।
दुनिया के लिए क्या हैं जर्मनी में सीडीयू/सीएसयू की जीत के मायने?
गौरतलब है कि एंजेला मर्केल के समय से ही जर्मनी की यूरोप में अलग पहचान रही है। उनके नेतृत्व में जर्मनी ने फ्रांस के साथ मिलकर यूरोपीय संघ का नेतृत्व किया। हालांकि, पिछले चुनाव में सीडीयू की सरकार गिरने के बाद बीते चार वर्षों में पहले कोरोनावायरस महामारी और फिर रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से जर्मनी को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। बीते कुछ वर्षों में भी आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियों के चलते ओलाफ शोल्ज सरकार को मुश्किलें उठानी पड़ी हैं।
अब जर्मनी के लिए सत्ता परिवर्तन ऐसे समय में आया है, जब डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका लगातार यूरोप से अपनी दूरी बना रहा है। इतना ही नहीं रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भी ट्रंप ने यूरोप को किनारे करने का काम किया है। उन्होंने यूक्रेन की सुरक्षा की जिम्मेदारी यूरोप से लेने के लिए कहा है और नाटो में ज्यादा आर्थिक योगदान की भी मांग की है।
ऐसे में जर्मनी में सीडीयू/सीएसयू की जीत काफी मायने रखती है। इसे पश्चिमी देशों की मीडिया के जरिए समझते हैं...
गौरतलब है कि एंजेला मर्केल के समय से ही जर्मनी की यूरोप में अलग पहचान रही है। उनके नेतृत्व में जर्मनी ने फ्रांस के साथ मिलकर यूरोपीय संघ का नेतृत्व किया। हालांकि, पिछले चुनाव में सीडीयू की सरकार गिरने के बाद बीते चार वर्षों में पहले कोरोनावायरस महामारी और फिर रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से जर्मनी को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। बीते कुछ वर्षों में भी आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियों के चलते ओलाफ शोल्ज सरकार को मुश्किलें उठानी पड़ी हैं।
अब जर्मनी के लिए सत्ता परिवर्तन ऐसे समय में आया है, जब डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका लगातार यूरोप से अपनी दूरी बना रहा है। इतना ही नहीं रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भी ट्रंप ने यूरोप को किनारे करने का काम किया है। उन्होंने यूक्रेन की सुरक्षा की जिम्मेदारी यूरोप से लेने के लिए कहा है और नाटो में ज्यादा आर्थिक योगदान की भी मांग की है।
ऐसे में जर्मनी में सीडीयू/सीएसयू की जीत काफी मायने रखती है। इसे पश्चिमी देशों की मीडिया के जरिए समझते हैं...
भारत के लिए क्यों अहम हैं जर्मनी के चुनाव के नतीजे?
1. व्यापारिक रिश्ते
21वीं सदी में जिस तेजी से भारत की आर्थिक शक्तियां बढ़ी हैं, वैसे ही दूसरे देशों से व्यापार में भी बढ़ोतरी देखी गई है। अगर भारत और यूरोप के व्यापार की बात की जाए तो यह आंकड़ा करीब 122 अरब यूरो (2023-24) का रहा है। इनमें से 30 अरब यूरो से ज्यादा का व्यापार अकेले जर्मनी के साथ है।
इतना ही नहीं यूरोप भारत में सबसे अहम निवेशकों में है। 2022 में यूरोप की तरफ से 108.3 अरब डॉलर भारत में निवेश किए गए। यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सला वॉन डर लेयन यूरोप को व्यापार समझौतों के जरिए भारत के साथ साझेदारी बढ़ाने पर जोर देती रही हैं। अब जब डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका फर्स्ट नीति पर जोर दिया जा रहा है और यूरोप पर दबाव बनाया जा रहा है, तो ऐसे समय में जर्मनी मजबूती के साथ अपने विकल्पों को तलाशने की कोशिश भी करेगा।
1. व्यापारिक रिश्ते
21वीं सदी में जिस तेजी से भारत की आर्थिक शक्तियां बढ़ी हैं, वैसे ही दूसरे देशों से व्यापार में भी बढ़ोतरी देखी गई है। अगर भारत और यूरोप के व्यापार की बात की जाए तो यह आंकड़ा करीब 122 अरब यूरो (2023-24) का रहा है। इनमें से 30 अरब यूरो से ज्यादा का व्यापार अकेले जर्मनी के साथ है।
इतना ही नहीं यूरोप भारत में सबसे अहम निवेशकों में है। 2022 में यूरोप की तरफ से 108.3 अरब डॉलर भारत में निवेश किए गए। यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सला वॉन डर लेयन यूरोप को व्यापार समझौतों के जरिए भारत के साथ साझेदारी बढ़ाने पर जोर देती रही हैं। अब जब डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका फर्स्ट नीति पर जोर दिया जा रहा है और यूरोप पर दबाव बनाया जा रहा है, तो ऐसे समय में जर्मनी मजबूती के साथ अपने विकल्पों को तलाशने की कोशिश भी करेगा।
2. कूटनीति
जर्मनी की सरकार ने सितंबर 2020 में एंजेला मर्केल के नेतृत्व में ही हिंद-प्रशांत नीति अपनाई थी। इसके तहत जर्मनी ने उन देशों से अपनी कूटनीतिक साझेदारी बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, जो इस क्षेत्र में हैं। इतना ही नहीं इस क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित कर जर्मनी ने भारत के नजदीक आने का भी लक्ष्य रखा। माना जा रहा है कि जर्मनी आगे चीन पर निर्भरता घटाकर अपने हितों को बराबर साझा करना चाहता है।
जर्मनी की सरकार ने सितंबर 2020 में एंजेला मर्केल के नेतृत्व में ही हिंद-प्रशांत नीति अपनाई थी। इसके तहत जर्मनी ने उन देशों से अपनी कूटनीतिक साझेदारी बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, जो इस क्षेत्र में हैं। इतना ही नहीं इस क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित कर जर्मनी ने भारत के नजदीक आने का भी लक्ष्य रखा। माना जा रहा है कि जर्मनी आगे चीन पर निर्भरता घटाकर अपने हितों को बराबर साझा करना चाहता है।
3. एफटीए और वीजा नीति
बीते साल जब जर्मन चांसलर ओलाफ शोल्ज भारत आए, तो उन्होंने भारत के पीएम नरेंद्र मोदी के साथ बैठकों के बाद की समझौते किए। इनमें जर्मनी में भारतीयों के लिए आसान वीजा नीति के अलावा यूरोप-भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर भी चर्चा हुई थी।
गौरतलब है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच 2013 से ही बातचीत चल रही है। जर्मनी ऐसे समझौते का पक्षधर रहा है। दरअसल, 2021 में जर्मनी की करीब 1700 कंपनियां भारत में सक्रिय थीं और इसके जरिए वह लाखों नौकरियां पैदा कर रही थीं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की भी कई फर्म्स जर्मनी में कारोबार कर रही हैं। आईटी से लेकर ऑटो और फार्मा सेक्टर में दोनों देशों के बीच अरबों डॉलर का व्यापार है। ऐसे में दोनों देश एफटीए के जरिए संबंधों को और बेहतर बनाने पर जोर दे रहे हैं।
बीते साल जब जर्मन चांसलर ओलाफ शोल्ज भारत आए, तो उन्होंने भारत के पीएम नरेंद्र मोदी के साथ बैठकों के बाद की समझौते किए। इनमें जर्मनी में भारतीयों के लिए आसान वीजा नीति के अलावा यूरोप-भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर भी चर्चा हुई थी।
गौरतलब है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच 2013 से ही बातचीत चल रही है। जर्मनी ऐसे समझौते का पक्षधर रहा है। दरअसल, 2021 में जर्मनी की करीब 1700 कंपनियां भारत में सक्रिय थीं और इसके जरिए वह लाखों नौकरियां पैदा कर रही थीं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की भी कई फर्म्स जर्मनी में कारोबार कर रही हैं। आईटी से लेकर ऑटो और फार्मा सेक्टर में दोनों देशों के बीच अरबों डॉलर का व्यापार है। ऐसे में दोनों देश एफटीए के जरिए संबंधों को और बेहतर बनाने पर जोर दे रहे हैं।