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पानी कम पी रहे तो तनाव होगा ज्यादा: नई स्टडी में क्या हुआ खुलासा, जानें हर दिन कम से कम कितना पानी पीना जरूरी
Mon, 08 Sep 2025 07:33 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Mon, 08 Sep 2025 07:33 AM IST
सार
रिसर्च में हिस्सा लेने वाले जिन भी लोगों ने कम पानी पिया था, वे ज्यादा पानी पीने वालों के मुकाबले प्यासे होने का अनुभव नहीं कर रहे थे। हालांकि, उनका शरीर कुछ और ही कह रहा था। उनकी यूरिन का गाढ़ापन उनके शरीर में कम पानी का इशारा कर रहा था।
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पानी पीने के फायदे।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
दुनियाभर में ज्यादा से ज्यादा पानी पीने के फायदे बताए जाते रहे हैं। उल्टी तरह से कहें तो कम पानी पीने के कई नुकसान बताए जाते रहे हैं। खासकर किडनी और लिवर के स्वास्थ्य के लिए पानी पीना बेहद जरूरी कहा जाता रहा है। हालांकि, तनाव कम करने में भी पानी बेहद जरूरी है। यह सामने आया है एक हालिया रिसर्च में। इसमें बताया गया है कि हर दिन एक व्यक्ति के लिए कम से कम कितना पानी पीना जरूरी है और अगर शरीर की यह जरूरत पूरी नहीं होती तो तनाव किस तरह बढ़ सकता है।
क्या है स्टडी, हर दिन कितना पानी पीना अहम?
जर्नल ऑफ एप्लायड फिजियोलॉजी में छपी एक हालिया स्टडी में सामने आया है कि जो लोग एक दिन में 1.5 लीटर से कम पानी पीते हैं, तनाव से जुड़ी स्थितियों में उनके शरीर में कॉर्टिसोल नाम के हार्मोन की मात्रा बढ़ जाती है। यह शरीर में तनाव पैदा करने वाला प्रमुख हार्मोन है। रिसर्च के मुताबिक, शरीर में थोड़ा भी डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) आम व्यक्ति में तनाव वाले भाव बढ़ा देता है और उसकी प्रतिक्रियाएं भी बदलने लगती हैं।
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क्या है स्टडी, हर दिन कितना पानी पीना अहम?
जर्नल ऑफ एप्लायड फिजियोलॉजी में छपी एक हालिया स्टडी में सामने आया है कि जो लोग एक दिन में 1.5 लीटर से कम पानी पीते हैं, तनाव से जुड़ी स्थितियों में उनके शरीर में कॉर्टिसोल नाम के हार्मोन की मात्रा बढ़ जाती है। यह शरीर में तनाव पैदा करने वाला प्रमुख हार्मोन है। रिसर्च के मुताबिक, शरीर में थोड़ा भी डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) आम व्यक्ति में तनाव वाले भाव बढ़ा देता है और उसकी प्रतिक्रियाएं भी बदलने लगती हैं।
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कैसे हुई रिसर्च, क्या सामने आया?
- वैज्ञानिकों के एक समूह ने यह पूरी रिसर्च युवाओं पर की है। इसके तहत युवाओं को दो अलग-अलग समूहों में बांटा गया।
- एक समूह ने हर दिन 1.5 लीटर या इससे कम पानी पिया, जबकि दूसरे समूह ने मानक के हिसाब से पानी पीया।
- एक हफ्ते तक कायदों को मानने के बाद युवाओं की सार्वजनिक बोलने-सवाल हल करने की क्षमता का परीक्षण हुआ।
- रिसर्चर्स ने पाया कि दोनों ही समूह बराबर चिंतित थे और उनके दिल धड़कने की गति भी समान रूप से बढ़ी थी।
- हालांकि, जिस समूह के लोगों ने डेढ़ लीटर पानी वाले मानक को माना था, उसमें कॉर्टिसोल हार्मोन ज्यादा पाया गया।
- वैज्ञानिकों के मुताबिक, अगर लोगों में कॉर्टिसोल बढ़ा रहे तो इससे तनाव में बढ़ोतरी होती है।
- वहीं, अगर कॉर्टिसोल कई महीनों या वर्षों तक बढ़ा रहे तो इससे दिल की बीमारी, किडनी की समस्या या डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है।
चौंकाने वाली बात यह है कि रिसर्च में हिस्सा लेने वाले जिन भी लोगों ने कम पानी पिया था, वे ज्यादा पानी पीने वालों के मुकाबले प्यासे होने का अनुभव नहीं कर रहे थे। हालांकि, उनका शरीर कुछ और ही कह रहा था। उनकी यूरिन का गाढ़ापन उनके शरीर में कम पानी का इशारा कर रहा था। इससे सामने आया कि ज्यादा प्यास हमेशा शरीर में पानी की जरूरत का परिचायक नहीं होता।
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पानी की कमी क्यों बढ़ा देती है तनाव, क्या है विज्ञान?
शरीर में पानी की कमी का पूरा विज्ञान दिमाग से जुड़ा है। दरअसल, जब भी शरीर में पानी की कमी होती है तो दिमाग वैसोप्रेसिन (vasopressin) नाम के हार्मोन को छोड़ता है, जो कि किडनी को यह संदेश देता है कि पानी को बचाया जाए और खून का आयतन प्रबंधित रहे। हालांकि, वैसोप्रेसिन अकेले काम नहीं करता। इसके साथ दिमाग का चेतावनी देने वाला सिस्टम भी सक्रिय हो जाता है, जो कि कठिन समय में शरीर कॉर्टिसोल हार्मोन की मात्रा बढ़ा देता है। नतीजतन शरीर में कम तरल पदार्थों की मौजूदगी तनाव का स्तर काफी बढ़ा देता है।
यह स्थिति न सिर्फ लोगों की शारीरिक स्थिति को खराब करती है, बल्कि उनकी मानसिक स्थिति भी गड़बड़ होने लगती है। ऐसे में जब भी कोई व्यक्ति रोजाना के दबाव का सामना करता है या काम खत्म करने की डेडलाइन पर होता है या पारिवारिक जिम्मेदारियों और वित्तीय चिंताओं से जूझ रहा होता है तो उसकी मानसिक स्थिति तनावपूर्ण हो जाती है, जो कि कुल मिलाकर स्वास्थ्य के लिए ही घातक सिद्ध हो सकती है।
शरीर में पानी की कमी का पूरा विज्ञान दिमाग से जुड़ा है। दरअसल, जब भी शरीर में पानी की कमी होती है तो दिमाग वैसोप्रेसिन (vasopressin) नाम के हार्मोन को छोड़ता है, जो कि किडनी को यह संदेश देता है कि पानी को बचाया जाए और खून का आयतन प्रबंधित रहे। हालांकि, वैसोप्रेसिन अकेले काम नहीं करता। इसके साथ दिमाग का चेतावनी देने वाला सिस्टम भी सक्रिय हो जाता है, जो कि कठिन समय में शरीर कॉर्टिसोल हार्मोन की मात्रा बढ़ा देता है। नतीजतन शरीर में कम तरल पदार्थों की मौजूदगी तनाव का स्तर काफी बढ़ा देता है।
यह स्थिति न सिर्फ लोगों की शारीरिक स्थिति को खराब करती है, बल्कि उनकी मानसिक स्थिति भी गड़बड़ होने लगती है। ऐसे में जब भी कोई व्यक्ति रोजाना के दबाव का सामना करता है या काम खत्म करने की डेडलाइन पर होता है या पारिवारिक जिम्मेदारियों और वित्तीय चिंताओं से जूझ रहा होता है तो उसकी मानसिक स्थिति तनावपूर्ण हो जाती है, जो कि कुल मिलाकर स्वास्थ्य के लिए ही घातक सिद्ध हो सकती है।
...तो क्या ज्यादा पानी पीने से तनाव कम हो सकता है?
सही मात्रा से कम पानी पीने से तनाव बढ़ सकता है। हालांकि, इसका उल्टा यानी ज्यादा पानी पीने से तनाव कम हो सकता है, यह तय नहीं है। सीधे शब्दों में कहें तो कम पानी पीना घातक सिद्ध हो सकता है, लेकिन ज्यादा पानी पीने से शरीर में पहले से मौजूद कॉर्टिसोल पर फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि तनाव के लिए बाहरी दुनिया की स्थितियां काफी हद तक जिम्मेदार होता है।
सही मात्रा से कम पानी पीने से तनाव बढ़ सकता है। हालांकि, इसका उल्टा यानी ज्यादा पानी पीने से तनाव कम हो सकता है, यह तय नहीं है। सीधे शब्दों में कहें तो कम पानी पीना घातक सिद्ध हो सकता है, लेकिन ज्यादा पानी पीने से शरीर में पहले से मौजूद कॉर्टिसोल पर फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि तनाव के लिए बाहरी दुनिया की स्थितियां काफी हद तक जिम्मेदार होता है।
रिसर्च में एक और अहम तथ्य यह भी सामने आया कि इंसानी शरीर में तरल पदार्थों की जरूरत सिर्फ पानी से ही नहीं पूरी होती, बल्कि दिन भर में पीये जाने वाले चाय, कॉफी, दूध भी शरीर में तरलता की जरूरत को पूरा करते हैं। हालांकि, पानी का असर इन सभी पेय पदार्थों के मुकाबले जल्दी और तेजी से होता है।
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