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चीन में एशिया का सबसे बड़ा सैनिक बेस कैंप, यहां नकली जंग लड़ते हैं सैनिक

Wed, 24 Jun 2020 01:56 PM IST
Tanuja Yadav वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हांगकांग
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हांगकांग Published by: Tanuja Yadav Updated Wed, 24 Jun 2020 01:56 PM IST
सार

  • चीन का सबसे बड़ा सैनिक प्रशिक्षण कैंप का नाम जुरिहे कंबाइंड टैक्टिक्स ट्रेनिंग बेस
  • यहां चीनी सैनिकों को युद्ध जैसी स्थिति में लड़ने के लिए तैयार किया जाता है
  • इस इलाके का क्षेत्रफल 1,006 वर्ग किलोमीटर है, जो हांगकांग जितना बड़ा है

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facts about china biggest military training base equivalent the are of HongKong
chinese army - फोटो : chinese army

विस्तार

चीन की सेना के लिए कहा जाता है कि इसका प्रशिक्षण इतने खतरनाक तरीके से कराया जाता है कि ये किसी भी दूसरी मजबूत सेना से टक्कर ले सकती है। चीन अपने सैनिकों को सालों-साल चले प्रशिक्षण के दम पर तैयार करता है। पूरे एशिया में चीन का एक सबसे बड़ा प्रशिक्षण केंद्र है, इसे इनर मंगोलिया में बनाया गया है।
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एशिया के सबसे बड़े सैनिक प्रशिक्षण कैंप को जुरिहे कंबाइंड टैक्टिक्स ट्रेनिंग बेस के नाम से जाना जाता है। इस बेस कैंप में चीनी सैनिक अलग-अलग गुटों में बंटकर लड़ाई का अभ्यास करते हैं और सैनिक उतनी ही वास्तविकता से लड़ाई लड़ते हैं जितनी किसी युद्ध की जमीन पर लड़ रहे हों।
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ऐसा कहा जाता है कि चीन पिछले 60 सालों से ऐसा कर रहा है ताकि युद्ध के दौरान अपनी सेना को भारी संख्या में तैनात कर सके। यहां जानिए कि चीन के इस ट्रेनिंग बेस में कैसे काम होता है-
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उत्तरी चीन के सुदूर इलाके में बना जुरिहे कैंप पीपल्स लिबरेशन आर्मी यानि पीएलए का सबसे एडवांस ट्रेनिंग बेस है। ये कैंप चीन के अन्य सैनिक कैंप से अलग है। यहां सेना अपने सैनिकों को एक खास मकसद यानी कि युद्ध जैसे हालात से निपटने के लिए प्रशिक्षण देती है। 

चीन का ये प्रशिक्षण बेस लगभग 1,066 वर्ग किलोमीटर इलाके में फैला हुआ है। ये जगह इतनी बड़ी है कि इस पूरे इलाके मे अकेला हांगकांंग समा सकता है। यहां सैनिकों को घर जैसा माहौल देने के लिए अस्पताल, पार्क, थिएटर और दुकानें जैसी सुविधाएं दी हुई हैं। यही नहीं यहां दुश्मन देशों की तरह दिखने वाली कई इमारतें बनी हुई हैं ताकि लड़ाई जैसा माहौल बना रहे।

इस कैंप सबसे खास बात यह है कि यहां मैदानों जैसी ही नहीं बल्कि पहाड़ों और रेतीले इलाकों में भी लड़ाई जैसा अभ्यास किया जाता है। इसके पीछे चीन का केवल एक ही उद्देश्य है कि वो अपनी सेना को हर मुश्किल इलाके में लड़ाई करने और युद्ध जैसे हालातों से निपटने के लिए तैयार रखे।

चीन की सेना की ओर से किए जा रही नकली लड़ाई के कई हिस्से चीन के सेंट्रल टेलीविजन पर आते रहते हैं। इसी इलाके में एक ऐसा भवन बना है जो ताइवान के प्रेसिडेंट ऑफिस जैसा दिखाई पड़ता है। चीन के सामरिक मामलों के जानकारों का कहना है कि चीन का इस तरह से भवन बनाने के पीछे एक ही कारण है कि वो ताइवान को एक तरह से जंग की धमकी दे रहा है। 

चीन ने अपनी सेना को मॉक लड़ाई के लिए दो गुटों में बांटा है। एक लाल और दूसरी नीली टुकड़ी। पश्चिमी देशों में मॉक लड़ाई के लिए दुश्मन सेना को लाल रंग दिया जाता है लेकिन चीन कम्युनिस्ट देश है इसलिए चीन ने दुश्मन टोली के लिए नीला रंग और खुद के लिए लाल रंग का चयन किया है। 

चीन में नकली लड़ाई को स्ट्राइड कहा जाता है। इस नकली लड़ाई की एक और खास बात है और वो यह कि इसके जरिए चीन अपनी दुश्मन देशों की सैन्य रणनीति का अध्ययन कर लेता है। चीन के दुश्मन देशों की सूची में पश्चिमी देशों के साथ-साथ भारत भी शामिल है। 

इस नकली लड़ाई में भी चीन के सैनिकों के पास वो सारे हथियार होते हैं जो असली लड़ाई में इस्तेमाल किए जाते हैं, यही नहीं इन लड़ाइयों में चीनी सेना की ओर से नकली परमाणु युद्ध और जैविक हथियारों का भी अभ्यास किया जाता है। हालांकि पीएलए की ओर से कभी भी इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।


चीन के इस प्रशिक्षण बेस की तुलना अमेरिका के फॉर्ट इरविन से की जाती है। अमेरिका ने इस कैंप को साल 1979 में कैलीफोर्निया के मरूस्थल में बनाया था। ये बेस कैंप 2,600 स्क्वैयर किलोमीटर में फैला है और यहां भी चीन की तरह सैनिकों के बीच नकली लड़ाई लड़ी जाती है।  
 
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