एक्सप्लेनर: इस्राइल चुनाव में किसे मिल रही कितनी सीटें, बहुमत नहीं मिला तो क्या होगी सरकार बनाने की प्रक्रिया?
इस्राइल चुनाव में किसी भी गठबंधन को बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय नेसेट में 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। ऐसे में सरकार बनाने के लिए राजनीतिक दलों के बीच समर्थन जुटाने की चुनौती बढ़ गई है। आइए विस्तार से जानते हैं कि क्या स्थिति है?
विस्तार
इस्राइल में चुनाव के बाद वोटों की गिनती जारी है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और विपक्षी नेता गादी आइजेनकॉट का गठबंधन मुख्य मुकाबले में हैं। दोनों ही गठबंधन अगली सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं। हालांकि, शुरुआती नतीजों में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है।
ऐसे में सरकार बनाने के लिए राजनीतिक दलों के बीच समर्थन जुटाने की चुनौती बढ़ गई है। अब तक किस पार्टी को कितने वोट मिले? नेताओं का क्या कहना है? इस बार मतदान में क्या खास रहा? इस्राइल में सरकार बनाने की प्रक्रिया क्या है? अगर किसी पार्टी या गठबंधन को बहुमत नहीं मिला तो क्या होगा? आइए जानते हैं...
अब तक किस पार्टी को कितनी सीटें मिलीं?
इस्राइल की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। मंगलवार रात आए तीन प्रमुख एग्जिट पोल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को सबसे ज्यादा 27 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है। वहीं, नेतन्याहू के गठबंधन को करीब 54 सीटें मिल सकती हैं। लिकुड पार्टी गादी आइजेनकॉट की यशर पार्टी से पांच से छह सीटें आगे बताई गई है। आइजेनकॉट के गठबंधन को 47 सीटें मिलती दिख रही हैं।
बुधवार सुबह 10:58 बजे तक 76.8 प्रतिशत मतपेटियों की गिनती हो चुकी थी। केंद्रीय चुनाव समिति के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, नेतन्याहू के गठबंधन को 54 सीटें, आइजेनकॉट के नेतृत्व वाले गठबंधन को 47 और अरब पार्टियों को 19 सीटें मिलती दिखाई दे रही हैं।
इसके अलावा, तीन पार्टियां चुनाव में 3.25 प्रतिशत की न्यूनतम वोट सीमा से नीचे हैं। इनमें रिजर्विस्ट पार्टी को 2.64 प्रतिशत, पीपल ऑफ इस्राइल को 1.65 प्रतिशत और हरेदी पब्लिक को 0.21 प्रतिशत वोट मिले।
नतीजों पर नेतन्याहू और आइजेनकॉट ने क्या कहा?
नेतन्याहू ने बुधवार सुबह यरुशलम में कहा कि नतीजे अब भी यहूदी और जायोनिस्ट जनता के बीच उनके गठबंधन को निर्णायक समर्थन मिलने का संकेत देते हैं। उन्होंने अरब पार्टियों को जायोनिस्ट विरोधी बताया और उनके साथ मिलकर सरकार बनाने की संभावना खारिज कर दी। उन्होंने ईरान के साथ युद्ध में समर्थन देने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का धन्यवाद भी किया।
वहीं, पूर्व सैन्य प्रमुख और यशर पार्टी के नेता गादी आइजेनकॉट ने कहा कि इस्राइल की जनता ने बदलाव के लिए वोट दिया है। उन्होंने दावा किया कि जनता नेतन्याहू को दोबारा प्रधानमंत्री के रूप में नहीं देखना चाहती।
आइजेनकॉट ने नेतन्याहू से जनता के अविश्वास को स्वीकार कर राजनीति छोड़ने की अपील की। उन्होंने कहा कि वह सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाली जायोनिस्ट सरकार बनाने की पूरी कोशिश करेंगे। उनके मुताबिक, ऐसी सरकार में सभी के लिए सैन्य सेवा, हमास को खत्म करने और समाज के हर वर्ग का सम्मान करने जैसे मुद्दे अहम होंगे।
अरब पार्टियों की सीटें क्यों अहम हैं?
इस चुनाव में अरब पार्टियों के बेहतर प्रदर्शन ने सरकार बनाने का गणित बदल दिया है। जॉइंट लिस्ट और राअम पार्टी को मिलाकर 19 सीटें मिल रही हैं। यह इस्राइल में अरब प्रतिनिधित्व का अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा हो सकता है।
इस्राइल की आबादी में फलस्तीनी अरब नागरिकों की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत है। इस बार अरब समुदाय में मतदान बढ़ने को नेतन्याहू की दक्षिणपंथी सरकार के खिलाफ नाराजगी से जोड़कर देखा जा रहा है।
इस सरकार में बेजालेल स्मोट्रिच और इतामार बेन-ग्विर जैसे कट्टर दक्षिणपंथी नेताओं की अहम भूमिका रही है। बेन-ग्विर के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री रहने के दौरान अरब समुदायों में अपराध और हत्याओं की बढ़ती घटनाओं को लेकर सरकार की आलोचना हुई।
जॉइंट लिस्ट के प्रमुख यूसुफ जबरीन ने अपनी पार्टी के प्रदर्शन को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि अरब समुदाय एक ऐसी राजनीतिक ताकत बनकर उभरा है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। वहीं, राअम पार्टी के प्रमुख मंसूर अब्बास ने कहा कि अरब समुदाय की इस उपलब्धि के पीछे बेन-ग्विर, स्मोट्रिच और सरकार की उपेक्षा से जुड़ी नाराजगी है।
हालांकि, अरब पार्टियों का समर्थन हासिल करना विपक्ष के लिए आसान नहीं है। आइजेनकॉट ने संभावित सहयोगियों के सामने इस्राइल को यहूदी राष्ट्र के रूप में मान्यता देने और हमास को आतंकवादी संगठन मानकर उसे खत्म करने जैसी शर्तें रखी हैं। अरब पार्टियों के लिए इन शर्तों को स्वीकार करना मुश्किल हो सकता है।
इसके अलावा, विपक्षी खेमे में शामिल एविग्डोर लिबरमैन और नफ्ताली बेनेट भी अरब पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाने से इनकार कर चुके हैं।
इस बार मतदान में क्या खास रहा?
इस चुनाव में करीब 57 लाख लोगों ने मतदान किया। लगभग 73 लाख पात्र मतदाताओं में से 77.7 प्रतिशत ने वोट डाला, जबकि 2022 के चुनाव में 70.6% मतदाताओं ने वोट डाला था। केंद्रीय चुनाव समिति के मुताबिक, 1999 के बाद यह सबसे अधिक मतदान प्रतिशत है। अरब समुदाय में भी मतदान में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। अरब पार्टियों के अनुसार, उनके समुदाय में मतदान 75 प्रतिशत से ज्यादा रहा।
इस्राइल में सरकार बनाने की प्रक्रिया क्या है?
मतगणना पूरी होने और नतीजों को प्रमाणित किए जाने के बाद सरकार बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। वहीं, डबल एनवेलप वोटों की गिनती बाद में होती है, इसलिए अंतिम नतीजे आने में कई दिन लग सकते हैं।
इस्राइल में डबल लिफाफों में डाले गए करीब पांच लाख वोटों की गिनती आधी रात के आसपास शुरू होगी। केंद्रीय चुनाव आयोग के मुताबिक, इन वोटों की गिनती अगले दिन शाम तक पूरी होने की उम्मीद है।
इस्राइल में यह व्यवस्था उन मतदाताओं के लिए की जाती है, जो किसी वजह से अपने निर्धारित मतदान केंद्र पर जाकर वोट नहीं डाल सकते। इसके जरिए ऐसे लोगों को भी मतदान का मौका दिया जाता है।
किन लोगों के वोट डबल लिफाफे में डाले जाते हैं?
- सेना में तैनात सैनिक: खासकर वे सैनिक जो अपने सामान्य मतदान केंद्र से दूर तैनात हैं।
- अस्पताल में भर्ती मरीज और कुछ कर्मचारी: ऐसे लोग जो अस्पताल में होने की वजह से अपने निर्धारित मतदान केंद्र पर नहीं पहुंच सकते।
- जेल में बंद कैदी और हिरासत में रखे गए लोग: इनके लिए भी मतदान की अलग व्यवस्था होती है।
- विदेश में तैनात इस्राइली राजनयिक: जो अपनी ड्यूटी के कारण सामान्य मतदान केंद्र पर वोट नहीं डाल सकते।
- दिव्यांग मतदाता: ऐसे दिव्यांग मतदाता जिन्हें किसी दूसरे मतदान केंद्र पर वोट डालने की अनुमति है।
डबल लिफाफे में वोट डालने की प्रक्रिया क्या है?
इस प्रक्रिया में मतदाता अपनी पसंद की पार्टी का पर्चा एक छोटे लिफाफे में डालता है। इसके बाद इस लिफाफे को दूसरे लिफाफे में रखा जाता है, जिस पर मतदाता की पहचान से जुड़ी जानकारी होती है।
मतगणना के दौरान चुनाव अधिकारी पहले जांच करते हैं कि संबंधित मतदाता ने किसी दूसरे मतदान केंद्र पर पहले से वोट तो नहीं डाला है। जांच पूरी होने के बाद बाहरी लिफाफा हटा दिया जाता है।
इसके बाद अंदर के लिफाफे को मतदाता की पहचान से अलग करके खोला जाता है और वोट की गिनती की जाती है। इस तरह मतदाता की पहचान गोपनीय रहती है और उसके वोट की गोपनीयता बनी रहती है।
चुनाव के नतीजे आने के बाद क्या होगा?
- इस्राइल में 4 नवंबर तक चुनाव के नतीजे घोषित होने हैं। अगर किसी दल को बहुमत मिल जाता है तो राष्ट्रपति सीधा उसे सरकार बनाने का न्योता देंगे और शपथ की तारीख तय कर दी जाएगी।
- हालांकि, अगर बहुमत नहीं आता है तो नतीजे के सात दिन के अंदर राष्ट्रपति उस दल को सरकार बनाने का न्योता देंगे, जो उनके हिसाब से जल्द पार्टियों को साथ लाकर सरकार बना सकता है।
- -यानी जरूरी नहीं है कि राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग सबसे बड़े दल को न्योता दें या दूसरे सबसे बड़े दल को आमंत्रित करें, वे प्रभाव के हिसाब से किसी भी पार्टी को सरकार गठन का न्योता दे सकते हैं।
- जिस भी नेता और पार्टी को सरकार गठन का न्योता मिलता है, उसे 28 दिन के अंदर बहुमत हासिल करने लायक गठबंधन तैयार करना होता है। उन्हें इसके लिए अधिकतम 14 दिन और मिल सकते हैं।
अगर कोई नेता/पार्टी बहुमत न जुटा पाए तो?
- अगर पहला नेता/दल बहुमत लायक गठबंधन नहीं बना पाता तो राष्ट्रपति अगले उस नेता को बुलाते हैं, जिसे अलग-अलग पार्टियों को जुटाने के लिए उपयुक्त माना जाता है। उसे भी पहले नेता की तरह ही 28 दिन और इसके बाद 14 दिन का अधिकतम समय मिल सकता है।
- हालांकि, अगर कोई भी नेता बहुमत जुटा नहीं पाता या राष्ट्रपति को उनके दलों को न जुटा पाने का अंदाजा हो जाता है तो वे संसद को इत्तला कर देते हैं कि कोई भी सरकार नहीं बना सकता। ऐसी स्थिति में कोई भी 61 सांसद राष्ट्रपति को अपनी पसंद का उम्मीदवार प्रस्तावित कर सकते हैं।
- चूंकि 61 सांसद बहुमत का आंकड़ा है, इसलिए राष्ट्रपति ऐसे नेता को 14 दिन का समय देते हैं ताकि वे सरकार बनाने लायक गठबंधन स्थापित कर सकते हैं। यहां भी असफलता की स्थिति में राष्ट्रपति संसद भंग कर देते हैं और 90 दिन की चुनावी प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
सरकार गठन की प्रक्रिया के दौरान कौन-कैसे चलाता है इस्राइल?
चुनाव संपन्न होने के 14 दिन बाद सभी 120 सांसदों का शपथग्रहण होगा। इनके पास बिना किसी सरकार या प्रधानमंत्री के भी विधेयक लाने और उस पर बहस करने के साथ बहुमत के आधार पर कानून बनाने की शक्तियां होती हैं। हालांकि, संसद भंग होने के बाद इनकी शक्तियां खत्म हो जाती हैं और इस अंतरिम समय में पिछली सरकार में प्रधानमंत्री (इस चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू) सत्ता में रह सकते हैं और अंतरिम सरकार का नेतृत्व करते हैं।