एक्सप्लेनर: कितना ताकतवर है रूस का यह युद्धपोत नखिमोव, इसे क्यों कहा जा रहा समुद्र में तैरता सबसे घातक किला?
करीब तीन दशक के लंबे आधुनिकीकरण के बाद रूस का एडमिरल नखिमोव फिर समुद्र में उतरने को तैयार है। परमाणु ऊर्जा से चलने वाला यह भारी युद्धपोत आधुनिक मिसाइलों, हवाई रक्षा और पनडुब्बी रोधी हथियारों से लैस है। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।
विस्तार
रूस के परमाणु ऊर्जा से चलने वाले भारी मिसाइल युद्धपोत एडमिरल नखिमोव का समुद्री परीक्षण पूरा होने की रिपोर्ट सामने आई है। करीब तीन दशक तक मरम्मत और आधुनिकीकरण के दौर से गुजरने के बाद यह युद्धपोत अब रूसी नौसेना में वापसी के करीब है। इसके इस साल के अंत तक औपचारिक रूप से सेवा में लौटने की संभावना जताई गई है।
ऐसे में आइए जानते हैं कि क्या है एडमिरल नखिमोव? इसे कब बनाया गया था? इसकी क्या खासियत है? यह दुश्मन का मुकाबला कैसे कर सकता है? यह कौन-कौन से मिसाइलों से लैस है? दुनिया के दूसरे युद्धपोतों की तुलना में यह कैसे अलग है? रूस के लिए यह कैसे महत्वपूर्ण है?
क्या है एडमिरल नखिमोव?
एडमिरल नखिमोव सोवियत दौर के प्रोजेक्ट 1144 यानी किरोव श्रेणी का भारी परमाणु ऊर्जा से चलने वाला मिसाइल युद्धपोत है। इसे समुद्र में बड़े लक्ष्यों को नष्ट करने, तटीय ठिकानों पर हमला करने और अपने नौसैनिक बेड़े को हवाई हमलों से सुरक्षा देने के लिए डिजाइन किया गया था।
इसकी लंबाई करीब 251 मीटर और पूरा भार करीब 28 हजार टन बताया गया है। इसमें करीब 728 लोगों का दल हो सकता है और यह कामोव केए-27 हेलीकॉप्टर या उसके दूसरे रूपों को ले जा सकता है।
इसे अक्सर बैटलक्रूजर यानी युद्धक्रूजर कहा जाता है। इसकी वजह इसका बहुत बड़ा आकार और भारी हथियार क्षमता है। यह सामान्य विध्वंसक या फ्रिगेट से काफी बड़ा है और इसका उद्देश्य केवल एक तरह के लक्ष्य से लड़ना नहीं, बल्कि समुद्र में लंबी दूरी की मार, हवाई रक्षा और पनडुब्बी रोधी अभियानों जैसी कई भूमिकाएं निभाना है।
नखिमोव को कब बनाया गया था?
नखिमोव को सोवियत संघ के दौर में बनाया गया था। इसे 1986 में पानी में उतारा गया और 1988 में नौसेना में शामिल किया गया। उस समय इसका नाम कलिनिन था। बाद में 1992 में इसका नाम बदलकर एडमिरल नखिमोव किया गया। रूसी समाचार एजेंसी तास के अनुसार, इसे 17 मई 1983 को बाल्टिक शिपयार्ड में बनाया जाना शुरू हुआ था, 25 अप्रैल 1986 को पानी में उतारा गया और 30 दिसंबर 1988 को सोवियत नौसेना में शामिल किया गया।
1990 के दशक के अंत में यह सक्रिय सेवा से बाहर हो गया। इसे 1999 से सेवमाश शिपयार्ड में मरम्मत और आधुनिकीकरण के लिए रखा गया। बड़े स्तर पर वास्तविक आधुनिकीकरण का काम 2013 के बाद शुरू हुआ।
रूस की सरकारी समाचार एजेंसी तास के मुताबिक, जहाज 1999 से सेवमाश में मरम्मत के दौर में था, जबकि वास्तविक काम 2013 से शुरू हुआ।
करीब 30 साल तक मरम्मत क्यों चली?
नखिमोव की मरम्मत को सामान्य मरम्मत समझना गलत होगा। आधुनिकीकरण के दौरान परियोजना का दायरा इतना बढ़ गया कि यह लगभग पूरी तरह से दोबारा तैयार करने जैसा काम बन गया। इसके कई पुराने युद्धक सिस्टम, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, केबल नेटवर्क और जहाज के अंदर की बड़ी मात्रा में मशीनरी बदली गई।
शुरुआत में इसे करीब 2018 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन काम लगातार आगे खिसकता गया और जहाज 2025-26 में जाकर समुद्री परीक्षणों तक पहुंचा। आधुनिकीकरण की लागत भी काफी बढ़ी। रूसी सरकारी स्रोतों में 2023 में इसकी लागत 200 अरब रूबल यानी करीब 2.3 अरब डॉलर से ज्यादा बताई गई थी।
इस आधुनिकीकरण का पैमाना समझने के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि तास ने सेवमाश के हवाले से बताया था कि जहाज में 5,000 से ज्यादा उपकरण, करीब 200 किलोमीटर पाइपलाइन और 1,800 किलोमीटर केबल लगाए जाने थे।
नखिमोव में क्या-क्या बदला गया?
सबसे बड़ा बदलाव इसके हथियार तंत्र में हुआ है। पहले नखिमोव में 20 पी-700 ग्रेनाइट एंटी-शिप मिसाइलें थीं। आधुनिकीकरण के दौरान इन्हें हटाकर 80 स्ट्राइक मिसाइल सेल्स लगाए गए हैं। इन प्रक्षेपण सेल से अलग-अलग तरह की मिसाइलें दागी जा सकती हैं। यही बदलाव नखिमोव को पुराने युद्धपोत की तुलना में कहीं ज्यादा बहुउद्देश्यीय बनाता है।
जहाज में 10 सार्वभौमिक प्रक्षेपण प्रणालियां बताई गई हैं और हर प्रणाली में आठ मिसाइलों की क्षमता है। इनसे मुख्य रूप से कैलिबर, ओनिक्स और जिरकॉन जैसी मिसाइलें दागी जा सकती हैं। इसमें 10 सार्वभौमिक प्रणालियां होंगी, जिनमें आठ-आठ कैलिबर-ओनिक्स मिसाइलें लगाई जा सकती हैं। बाद में जिरकॉन हाइपरसोनिक मिसाइलों को भी शामिल किया जाना है।
कैलिबर मिसाइल क्या करती है?
मिसाइलथ्रेट की रिपोर्ट के अनुसार, कैलिबर रूस की लंबी दूरी की समुद्र से दागी जाने वाली क्रूज मिसाइलों की श्रृंखला है। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से जमीन पर स्थित लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है और इसे युद्धपोतों और पनडुब्बियों से लॉन्च किया जा सकता है। इसके 3M-14 संस्करण की अनुमानित मारक क्षमता करीब 1,500 से 2,500 किलोमीटर और वारहेड करीब 450 किलोग्राम है।
हवाई हमलों से बचाव के लिए क्या है?
नखिमोव केवल हमला करने वाला युद्धपोत नहीं है। इसमें बड़े स्तर की हवाई रक्षा क्षमता भी जोड़ी गई है। इसमें लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों के लिए 96 एयर डिफेंस सेल्स हैं। इसके अलावा जहाज में छह पैंटसिर-एम प्रणालियां बताई गई हैं, जो नजदीकी और मध्यम दूरी के हवाई खतरों से मुकाबला करने के लिए हैं।
पनडुब्बियों का सामना कैसे कर सकता है यह युद्धपोत?
नखिमोव में पैकेट-एनके और ओटवेट जैसी पनडुब्बी रोधी और टॉरपीडो हथियार प्रणालियां भी बताई गई हैं। यानी यह युद्धपोत सिर्फ दुश्मन के जहाज या विमान को निशाना बनाने तक सीमित नहीं है। पानी के नीचे मौजूद पनडुब्बियों से भी मुकाबला करने के लिए इसमें हथियार मौजूद हैं।
इसकी तोप में भी हुए बदलाव
आधुनिकीकरण के दौरान जहाज की पुरानी 130 मिलीमीटर एके-130 दोहरे इस्तेमाल वाली नौसैनिक तोप को हटाकर आधुनिक 130 मिलीमीटर एके-192एम तोप लगाई गई है। इसका इस्तेमाल समुद्री और दूसरे सतही लक्ष्यों के खिलाफ किया जा सकता है।
दुनिया के दूसरे बड़े युद्धपोतों से तुलना
आकार के मामले में एडमिरल नखिमोव दुनिया के सबसे बड़े सतही युद्धपोतों में शामिल है। इसका पूरा भार करीब 28 हजार टन है, जबकि अमेरिकी आर्ले बर्क श्रेणी के विध्वंसकों का भार करीब 10 हजार टन है। यानी नखिमोव आर्ले बर्क श्रेणी के विध्वंसकों से करीब तीन गुना भारी है।
मिसाइल क्षमता की बात करें तो अमेरिका के टिकोंडेरोगा श्रेणी के युद्धपोत में 122 और आर्ले बर्क श्रेणी में 96 मिसाइल सेल्स हैं। वहीं दक्षिण कोरिया के सेजोंग द ग्रेट श्रेणी में 128 और चीन के टाइप-055 में 112 मिसाइल सेल्स हैं। इसके मुकाबले एडमिरल नखिमोव में 174 से 176 मिसाइल सेल्स हैं, जिससे मिसाइल प्रक्षेपण क्षमता के मामले में यह इन युद्धपोतों से आगे निकल जाता है।
नखिमोव परमाणु ऊर्जा से कैसे चलता है?
नखिमोव की सबसे खास बातों में से एक इसका परमाणु ऊर्जा से चलने वाला इंजन तंत्र है। इसमें दो केएन-3 दबावयुक्त जल परमाणु रिएक्टर लगे हैं। ये रिएक्टर भाप टर्बाइनों को ऊर्जा देते हैं, जिससे करीब 1.40 लाख अश्वशक्ति की ताकत मिलती है।
इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे सामान्य ईंधन से चलने वाले जहाजों की तरह बार-बार ईंधन भरवाने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे यह लंबे समय तक और लंबी दूरी तक समुद्र में अभियान चला सकता है।
कितनी है रफ्तार?
नखिमोव की अधिकतम रफ्तार करीब 32 नॉट है। नॉट समुद्री जहाजों की गति मापने की इकाई है। 1 नॉट लगभग 1.85 किलोमीटर प्रति घंटा होता है, इसलिए 32 नॉट की रफ्तार करीब 59 किलोमीटर प्रति घंटा के बराबर है। इस रफ्तार का फायदा केवल तेजी से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने में नहीं है। युद्ध के दौरान तेज गति से जहाज अपनी स्थिति बदल सकता है, अलग-अलग समुद्री इलाकों में जल्दी पहुंच सकता है और दुश्मन के लिए लक्ष्य तय करना मुश्किल कर सकता है।
रूस के लिए यह युद्धपोत इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
रूस की नौसेना में बड़े सतही युद्धपोतों की संख्या सीमित है। ऐसे में नखिमोव की वापसी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसका इस्तेमाल रूसी नौसेना के बड़े समुद्री सैन्य समूहों के साथ किया जा सकता है। यह दूसरे युद्धपोतों को सुरक्षा देने के साथ-साथ दूर से लंबी दूरी के हमले करने में भी भूमिका निभा सकता है।
नाटो के खिलाफ इसकी क्या भूमिका हो सकती है?
नखिमोव को मूल रूप से बड़े नौसैनिक समूहों और दुश्मन के बड़े युद्धपोतों से मुकाबले के लिए डिजाइन किया गया था। आधुनिकीकरण के बाद इसकी लंबी दूरी की मिसाइलें इसे समुद्र में दूर मौजूद लक्ष्यों पर हमला करने की क्षमता देती हैं। साथ ही 96 वायु रक्षा प्रक्षेपण सेल बताए जाने के कारण यह अपने आसपास के समुद्री समूह को हवाई सुरक्षा भी दे सकता है। यही वजह है कि इसे नाटो के नौसैनिक समूहों के सामने रूस के लिए एक महत्वपूर्ण लंबी दूरी के हथियार मंच के तौर पर देखा जा रहा है।
क्या इतने बड़े युद्धपोत की कोई कमजोरी भी है?
इतनी बड़ी सैन्य क्षमता को एक ही युद्धपोत पर रखने का फायदा है, लेकिन जोखिम भी है। आधुनिक युद्ध में जहाजों को केवल दूसरे बड़े युद्धपोतों से ही खतरा नहीं होता। लंबी दूरी की एंटी-शिप मिसाइलें, ड्रोन और समुद्री ड्रोन जैसे अपेक्षाकृत कम लागत वाले हथियार भी बड़े जहाजों के लिए खतरा बन सकते हैं।
रूस के पास बड़े युद्धपोत कितने बचे हैं?
रूस के पास नखिमोव के अलावा मार्शल उस्तीनोव और वैर्याग जैसे बड़े क्रूजर भी हैं। ये स्लावा श्रेणी के युद्धपोत हैं और अपने सेवा के अंतिम दौर की ओर बढ़ रहे हैं। रूस ने अपने विमानवाहक पोत एडमिरल कुजनेत्सोव के आधुनिकीकरण और निर्माण से जुड़े काम को रोक दिया है। रूस अब बड़ी संख्या में नए क्रूजर या विध्वंसक बनाने की जगह आधुनिक फ्रिगेट, छोटे युद्धपोत और मिसाइल नौकाओं पर ज्यादा निर्भर हो रहा है।