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एक्सप्लेनर: एक जैसे दिखने वाले अणुओं में फर्क बता सुलझाई पुरानी गुत्थी, क्यों खास है रसायन का नोबेल वाली खोज?

Thu, 08 Oct 2026 06:21 AM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Thu, 08 Oct 2026 06:21 AM IST
सार

आखिर कागान और सोआई ने ऐसा क्या किया कि मॉलिक्यूल्स की एक पुरानी और बेहद पेचीदा गुत्थी सुलझाने के लिए उन्हें रसायन विज्ञान का नोबेल दिया गया? उनकी खोज के पीछे छिपी कहानी दवाओं, जीवन की केमिस्ट्री और 99.99% तक पहुंचने वाले एक बेहद छोटे अंतर से जुड़ी है। आखिर वह छोटा सा अंतर इतना बड़ा कैसे बन गया? आइए जानते हैं।

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Explainer: How a Nobel-winning discovery solved the mystery of identical-looking molecules
नोबे पुरस्कार 2026 - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

इस साल रसायन विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल हेनरी बी कागान और केन्सो सोआई को दिया गया है। रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने दोनों वैज्ञानिकों को असिमेट्रिक ऑर्गेनिक सिंथेसिस में नॉन-लीनियर इफेक्ट्स और ऑटोकैटेलिसिस से जुड़े उनके काम के लिए सम्मानित किया है।

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नाम और तकनीकी शब्द सुनकर यह विषय मुश्किल लग सकता है, लेकिन इसे समझने के लिए बाएं और दाएं हाथ का उदाहरण काफी आसान है। दोनों हाथ देखने में एक जैसे होते हैं, लेकिन एक को दूसरे के ऊपर रखने पर वे पूरी तरह नहीं मिलते। केमिस्ट्री में कुछ मॉलिक्यूल्स भी बिल्कुल ऐसे ही होते हैं। इनकी यही खासियत दवाओं से लेकर जीवन की शुरुआत तक कई अहम सवालों से जुड़ी है।

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पहले समझिए, ये मिरर इमेज मॉलिक्यूल क्या हैं?

कुछ मॉलिक्यूल्स के दो रूप ऐसे होते हैं, जो एक-दूसरे की आईने में दिखने वाली तस्वीर जैसे होते हैं। देखने में दोनों लगभग एक जैसे लगते हैं, लेकिन उनकी बनावट अलग होती है। ऐसे मॉलिक्यूल्स को काइरल मॉलिक्यूल कहा जाता है। इनके दो मिरर इमेज रूपों को एनैंटियोमर्स कहते हैं।

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दवाओं में यह फर्क क्यों जरूरी है?

यह अंतर सिर्फ बनावट तक सीमित नहीं रहता। हमारा शरीर इन दोनों रूपों को अलग-अलग तरीके से पहचान सकता है। कई दवाओं में एक ही मॉलिक्यूल के दो मिरर इमेज रूप हो सकते हैं। इनमें से एक शरीर में जरूरी असर पैदा कर सकता है, जबकि दूसरा कम असरदार हो सकता है या कुछ मामलों में नुकसान भी पहुंचा सकता है। इसलिए वैज्ञानिकों के लिए यह जरूरी है कि दवा बनाते समय सही रूप ज्यादा मात्रा में मिले।

1980 के दशक में थैलिडोमाइड के मामले ने इस बात को और गंभीर बना दिया। इस दवा के इस्तेमाल से हजारों बच्चों में जन्मजात विकृतियां देखी गईं। इसके बाद वैज्ञानिकों का ध्यान इस बात पर और गया कि किसी मॉलिक्यूल के दो मिरर इमेज रूप शरीर पर अलग-अलग असर डाल सकते हैं।

जीवन में भी क्यों दिखता है यह फर्क?

यह सवाल सिर्फ दवाओं तक सीमित नहीं है। जीवन में मौजूद कई मॉलिक्यूल्स के भी दो मिरर इमेज रूप हो सकते हैं, लेकिन जीवित दुनिया में इनमें से सिर्फ एक रूप का इस्तेमाल होता है।

इसे होमोकाइरैलिटी कहा जाता है। आसान भाषा में इसका मतलब है कि किसी मॉलिक्यूल के दो संभावित मिरर इमेज रूपों में से जीवन ने सिर्फ एक रूप को चुना है। उदाहरण के लिए, प्रोटीन बनाने वाले अमीनो एसिड्स के दो रूप हो सकते हैं, लेकिन जीवित शरीर प्रोटीन बनाने के लिए इनमें से सिर्फ एक रूप का इस्तेमाल करता है। वैज्ञानिकों के सामने लंबे समय से सवाल था कि आखिर ऐसा हुआ कैसे।

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रसायन विज्ञान में नोबेल - फोटो : Amar Ujala

लुई पाश्चर ने कैसे पहचाने ये दो रूप?

इस कहानी में वैज्ञानिक लुई पाश्चर का काम भी अहम है। पाश्चर ने टार्टरिक एसिड नाम के पदार्थ का अध्ययन करते हुए ऐसे छोटे क्रिस्टल देखे, जो दो अलग-अलग रूपों में मौजूद थे। दोनों एक-दूसरे की मिरर इमेज थे।

उन्होंने दोनों रूपों को अलग किया और उनके घोल बनाए। जब इन घोलों से खास तरह की रोशनी गुजारी गई, तो दोनों ने रोशनी को अलग-अलग दिशा में मोड़ा। इससे यह समझने में मदद मिली कि एक ही पदार्थ के दो ऐसे रूप हो सकते हैं, जिनकी बनावट एक-दूसरे की मिरर इमेज जैसी हो।

पाश्चर को यहां एक और सुराग कैसे खोजा?

1857 में पाश्चर ने देखा कि बैक्टीरिया टार्टरिक एसिड के एक रूप को इस्तेमाल कर लेते थे, लेकिन उसके मिरर इमेज वाले रूप को नहीं छूते थे। इससे एक अहम बात सामने आई कि जीवित चीजें मॉलिक्यूल के इन दोनों रूपों में फर्क कर सकती हैं। यही सवाल आगे चलकर जीवन की केमिस्ट्री को समझने का एक बड़ा हिस्सा बना।

विली मार्कवाल्ड ने क्या दिखाया?

20वीं सदी की शुरुआत में वैज्ञानिक विली मार्कवाल्ड ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाया। उन्होंने ऐसी रासायनिक प्रक्रिया दिखाई, जिसमें किसी मॉलिक्यूल के दो मिरर इमेज रूप बराबर मात्रा में बनने के बजाय एक रूप ज्यादा बन सकता था।

इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए काइरल कैटेलिस्ट का इस्तेमाल किया गया। कैटेलिस्ट ऐसा पदार्थ होता है, जो किसी रासायनिक प्रक्रिया को तेज या आसान बनाने में मदद करता है, लेकिन खुद उस प्रक्रिया में खत्म नहीं होता। इससे यह समझने में मदद मिली कि किसी रिएक्शन में दोनों मिरर इमेज रूपों का बराबर मात्रा में बनना जरूरी नहीं है।

1953 में चार्ल्स फ्रैंक ने क्या समझाया?

इसके बाद वैज्ञानिक चार्ल्स फ्रैंक ने एक मॉडल दिया। उन्होंने समझाया कि अगर किसी रिएक्शन में एक मिरर इमेज को शुरुआत में थोड़ी सी बढ़त मिल जाए और वही प्रक्रिया उस बढ़त को आगे बढ़ाती रहे, तो छोटा अंतर समय के साथ काफी बड़ा हो सकता है।

इसी विचार को ऑटोकैटेलिसिस से समझा जा सकता है। आसान भाषा में कहें तो रिएक्शन से बनने वाला पदार्थ आगे उसी रिएक्शन को और तेजी से होने में मदद करने लगे। यानी शुरुआत में मिली छोटी बढ़त आगे खुद को बढ़ाती चली जाए।

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रसायन विज्ञान में नोबेल - फोटो : Amar Ujala

हेनरी कागान ने क्या खोजा?

यहीं से हेनरी कागान का काम महत्वपूर्ण हो जाता है। उस समय वैज्ञानिकों के सामने सवाल था कि अगर किसी रिएक्शन में एक मिरर इमेज को थोड़ी बढ़त मिले, तो अंतिम पदार्थ में इसका असर कितना बड़ा हो सकता है।

कागान ने दिखाया कि यह असर सीधा-सीधा नहीं होता। कैटेलिस्ट में छोटा सा बदलाव अंतिम पदार्थ में दोनों मिरर इमेज की मात्रा के बीच बहुत बड़ा अंतर पैदा कर सकता है। यानी शुरुआत में अंतर छोटा हो, लेकिन रिएक्शन के अंत में उसका असर काफी बड़ा दिखाई दे सकता है।

इसे नॉन-लीनियर इफेक्ट कहा जाता है। 1986 में कागान ने ऐसी तीन रासायनिक प्रक्रियाओं का वर्णन किया, जिनमें यह असर साफ दिखाई दिया।

केन्सो सोआई ने क्या आगे जोड़ा?

कागान के काम के बाद केन्सो सोआई ने इस सवाल को आगे बढ़ाया कि क्या रिएक्शन के दौरान बनने वाला पदार्थ खुद उसी रिएक्शन को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।

सोआई ने ऐसी रासायनिक प्रक्रिया पर काम किया, जिसमें बनने वाला पदार्थ आगे उसी प्रक्रिया को बढ़ाने में मदद करता था। यानी रिएक्शन में बना पदार्थ ही उस रिएक्शन को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाने लगा। यही ऑटोकैटेलिसिस का अहम उदाहरण है।

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रसायन विज्ञान - फोटो : Amar Ujala

1995 में 2% से 87% तक कैसे पहुंची बढ़त?

1995 में सोआई ने एक ऐसी प्रक्रिया के बारे में बताया, जिसमें शुरुआत में एक मिरर इमेज को सिर्फ 2% की बढ़त मिली थी। लेकिन रिएक्शन आगे बढ़ने के साथ उसी रूप की मात्रा बढ़ती गई और आखिर में वह 87% तक पहुंच गई। यानी शुरुआत में अंतर बहुत छोटा था, लेकिन रिएक्शन ने उसी अंतर को लगातार बढ़ाया।

2003 में 99.99% तक कैसे पहुंचा एक रूप?

सोआई ने इसके बाद भी इस प्रक्रिया पर काम जारी रखा। 2003 में उन्होंने ऐसी प्रक्रिया दिखाई, जिसमें शुरुआत में किसी एक मिरर इमेज को बहुत छोटी बढ़त मिलने पर वही रूप आगे और ज्यादा बनने लगा।

हर चरण में बनने वाले नए मॉलिक्यूल्स ने उसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद की। इस तरह शुरुआत का छोटा अंतर लगातार बड़ा होता गया और आखिर में एक मिरर इमेज 99.99% तक प्रमुख रूप बन सकती थी। खास बात यह थी कि शुरुआत में किस रूप को थोड़ी बढ़त मिली, यह तय कर सकता था कि आखिर में कौन सा रूप ज्यादा मात्रा में बनेगा।

इससे जीवन की पहेली को समझने में क्या मदद मिली?

सोआई की यह प्रक्रिया प्रयोगशाला में बनाई गई रासायनिक प्रक्रिया है। यह सीधे तौर पर यह साबित नहीं करती कि जीवन की शुरुआत भी इसी तरह हुई थी।

लेकिन इससे वैज्ञानिकों को एक अहम सवाल समझने का तरीका मिला। अगर शुरुआत में दोनों मिरर इमेज रूप मौजूद हों, तो उनमें से सिर्फ एक रूप धीरे-धीरे कैसे हावी हो सकता है।

इसी वजह से यह काम उस पुरानी पहेली से जुड़ता है कि जीवन में अमीनो एसिड्स और शुगर के सिर्फ एक मिरर इमेज रूप का इस्तेमाल क्यों होता है।

कागान की खोज आज क्यों काम की है?

कागान के बताए नॉन-लीनियर इफेक्ट को समझने से वैज्ञानिकों को यह पता लगाने में मदद मिलती है कि किसी रासायनिक प्रक्रिया में एक खास मिरर इमेज को ज्यादा मात्रा में कैसे बनाया जा सकता है।

इसका महत्व दवाओं के निर्माण में खास तौर पर है। इसके अलावा फ्लेवर, खुशबू और खेती में इस्तेमाल होने वाले कुछ रसायनों को बनाने में भी ऐसी केमिस्ट्री उपयोगी हो सकती है।

यानी इस नोबेल की कहानी सिर्फ मॉलिक्यूल की बनावट समझने तक सीमित नहीं है। यह इस सवाल से भी जुड़ी है कि जब दो रूप लगभग एक जैसे दिखते हैं, तो वैज्ञानिक उनमें से जरूरत वाले रूप को ज्यादा मात्रा में कैसे बना सकते हैं।

पिछले साल रसायन विज्ञान में किसे मिला था नोबेल?

2025 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार सुसुमु कितागावा, रिचर्ड रॉबसन और ओमर एम. यागी को मिला था। तीनों वैज्ञानिकों को मेटल-ऑर्गेनिक फ्रेमवर्क्स विकसित करने के लिए सम्मानित किया गया था।

एमओएफएस ऐसी खास छिद्र वाली संरचनाएं हैं, जिनके अंदर बहुत छोटे-छोटे खाली स्थान होते हैं। इन जगहों में गैसों और दूसरे पदार्थों को पकड़कर रखा जा सकता है। आसान भाषा में कहें तो ये एक तरह के मॉलिक्यूलर स्पंज की तरह काम करते हैं। इनका इस्तेमाल हवा से पानी निकालने, कार्बन डाइऑक्साइड पकड़ने और जहरीली गैसों को स्टोर करने जैसी तकनीकों में किया जा सकता है।

इस साल अब तक किस-किस को मिला सम्मान?

चिकित्सा का नोबेल
कार्ल डाइसरॉथ, पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल को 2026 का फिजियोलॉजी या मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार दिया गया है। उन्हें ऑप्टोजेनेटिक्स और प्रकाश की मदद से तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधि को नियंत्रित करने से जुड़ी खोजों के लिए सम्मानित किया गया है।

भौतिकी का नोबेल
फ्रांसिस हाल्जेन को 2026 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला है। उन्हें आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी और ब्रह्मांड से आने वाले उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो के अध्ययन में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया है।

8 अक्तूबर को साहित्य, 9 अक्तूबर को शांति और 12 अक्तूबर को अर्थशास्त्र के नोबेल की घोषणा की जाएगी। इस साल नोबेल पुरस्कार की राशि 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर यानी करीब 12 लाख अमेरिकी डॉलर है।

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