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Battle of Haifa: इस्राइल में तनाव के कारण आज नहीं मनेगा हाइफा दिवस; जानें इसका भारतीय जांबाजों से कनेक्शन

Mon, 23 Sep 2024 01:19 PM IST
काव्या मिश्रा वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, यरुशलम
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, यरुशलम Published by: काव्या मिश्रा Updated Mon, 23 Sep 2024 01:19 PM IST
सार

इस्राइल के हाइफा में हर साल 23 सितंबर को इन भारत के वीर सैनिकों की याद में हाइफा दिवस मनाया जाता है। तीन भारतीय कैवलरी रेजिमेंट मैसूर, हैदराबाद और जोधपुर लांसर, जो तब की 15 इंपीरियल सर्विस कैवलरी ब्रिगेड का हिस्सा था, उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है

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Event commemorating liberation of Haifa by Indian soldiers cancelled due to tensions in region news in hindi
हाइफा का भारतीय जांबाजों से कनेक्शन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उत्तरी इस्राइल के तटीय शहर हाइफा पर ऑटोमन साम्राज्य यानी जर्मनी, ऑस्ट्रिया और हंगरी का संयुक्त कब्जा था। इसी शहर को संयुक्त सेना के कब्जे से छुड़ाने के लिए भारतीय सेना के जवानों ने अपना पराक्रम दिखाया था। 23 सितंबर, 1918 यानी 106 साल पहले का यह संघर्ष तब से लेकर आज तक दुनिया को यह बताता रहा है कि भारतीय सेना के पराक्रम के आगे किसी की कुछ भी नहीं चलती चाहे दुश्मन कितना ही ताकतवर और हथियारों से लैस क्यों ना हो। ऐसे में इस साल प्राण न्योछावर करने वाले बहादुर भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक कार्यक्रम आयोजित करने का फैसला लिया था, जिसे अब रद्द कर दिया गया है। यह फैसला पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण लिया गया है। 

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इस्राइल और लेबनान समर्थक हिजबुल्ला एक दूसरे पर हमला करना जारी रखे हुए हैं। इससे तनाव बढ़ गया है। इस्राइल होम फ्रंट कमांड को नागरिकों को एहतियाती सलाह देने को कहा गया है। संरक्षित आश्रयों के पास 10 लोगों को बाहरी सभा करने और 100 लोगों को इनडोर समारोह करने की अनुमति है। एक अधिकारी ने बताया, 'वर्तमान हालातों को देखते हुए भारतीय दूतावास द्वारा हाइफा में 23 सितंबर को आयोजित किए जाने वाले हाइफा दिवस समारोह को रद्द किया जा रहा है।'
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हर साल 23 सितंबर को मनाया जाता हाइफा दिवस
गौरतलब है, इस्राइल के हाइफा शहर में हर साल 23 सितंबर को इन भारत के वीर सैनिकों की याद में हाइफा दिवस मनाया जाता है और तीन भारतीय कैवलरी रेजिमेंट मैसूर, हैदराबाद और जोधपुर लांसर, जो तब की 15 इंपीरियल सर्विस कैवलरी ब्रिगेड का हिस्सा था, उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। इस्राइल में इस दिवस की शुरुआत साल 2003 से शुरू हुई थी।
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सौ से अधिक साल पुराने युद्ध की कहानी 
अब आपको जिस युद्ध के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं उसको सुनकर आप भी भरोसा नहीं कर पाएंगे कि उत्तरी इस्राइल के एक शहर हाइफा के इस संघर्ष में भारत की सेना के पराक्रम की गाथा आखिर क्यों गाई जाती है। दरअसल प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान इस शहर पर ऑटोमन साम्राज्य यानी जर्मनी, ऑस्ट्रिया और हंगरी का संयुक्त कब्जा था। इसी शहर को संयुक्त सेना के कब्जे से छुड़ाने के लिए भारतीय सेना के जवानों ने अपना पराक्रम दिखाया था।

दरअसल, इस शहर की भूमिका इस दौरान इसलिए मित्र राष्ट्रों के लिए महत्वपूर्ण थी, क्योंकि उनकी सेनाओं के रसद पहुंचाने का समुद्री रास्ता इसी शहर से होकर जाता था। ऐसे में भारतीय सैनिक जो ब्रिटिश हुकूमत की तरफ से इस शहर पर कब्जे के लिए संघर्ष कर रहे थे। उनमें से 44 वीरों ने वीरगति को प्राप्त की, लेकिन इस शहर को जीतकर इसे संयुक्त सेना के कब्जे से आजाद जरूर करा दिया। यह लड़ाई पूरी दुनिया की अंतिम घुड़सवार सेना की सबसे बड़ी लड़ाई के तौर पर आज भी याद किया जाता है।

क्या है बहादूरी का किस्सा?
इस युद्ध के बारे में इतिहास के पन्नों में जो दर्ज है वह जानकर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है एक तरफ जहां संयुक्त सेना की तरफ से गोले और बारूद बरस रहे थे, वहीं दूसरी तरफ भारतीय कैवलरी फौज के पास तलवारें, डंडे और भाले थे, लेकिन इन वीर सैनिकों ने माउंट कैरमल की पथरीली पहाड़ों पर अपनी बहादुरी से इसका डटकर मुकाबला किया और संयुक्त सेना को खदेड़कर इस पर अपना अधिकार जमा लिया।

ये एक ऐसी लड़ाई थी, जहां युद्ध के मैदान तक चढ़ाई की वजह से ही जाना मुश्किल था। ऊपर से घोड़ों पर सवार भारतीय सेना के जवान ऐसे सैनिकों से लोहा ले रहे थे जो ऊपर बैठे थे और उनके पास गोला, बारूद, तोप और मशीन गन थे। इसके बाद भी भारतीय सूरमाओं का हौसला कहां टूटने वाला था वह आगे बढ़े और घोड़ों को लेकर युद्ध के मैदान तक पहुंच गए। फिर जमकर लड़ाई हुई और अंततः भारतीय जांबाजों ने हाइफा पर कब्जा जमा लिया।

इनकी बहादूरी आज भी मिसाल 
मेजर दलपत सिंह जिन्होंने इस सेना का नेतृत्व किया था, आज भी दुनिया उन्हें हीरो ऑफ हाइफा कहकर बुलाती है। आजाद भारत की किताबों में भले हाइफा के संग्राम को बच्चों ने कभी नहीं पढ़ा, लेकिनइस्राइल में कक्षा पांच तक की इतिहास की किताबों में हाइफा की आजादी की कहानी और भारतीय सैनिकों की वीर गाथा आज भी पढ़ाई जाती है।




मेजर दलपत सिंह इस जंग में अपनी सेना का विजय तो देख नहीं पाए और कैप्टन अमन सिंह बहादुर ने इस युद्ध में नेतृत्व करते हुए हाइफा पर भारतीय सैनिकों का कब्जा मुकर्रर किया। कैप्टन अमन सिंह बहादुर और दफादार जोर सिंह को इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट (आईओएम) से, जबकि कैप्टन अनूप सिंह और सेकेंड लेफ्टिनेंट सागत सिंह को युद्ध में उनकी बहादुरी के लिए मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया गया। वहीं, दलपत सिंह को भी उनकी बहादुरी के लिए मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया गया।

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